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चलती चाक्की
देख के |
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सत्तर
चूहे खाकर बिल्ली हज को चली |
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डा. सीतेश आलोक |
डायना को मरे हुए
बरसों बीत गए... पर उसे याद करने वाले आज भी याद किए
जा रहे हैं। कुछ लोग उसे इसलिए याद करते हैं कि वह
राजघराने की थी,
कुछ इसलिए कि वह सुन्दर थी,
कुछ इसलिए कि वह बेहद अमीर थी और
सुर्खियों में बने रहने का गुर जानती थी। बहरहाल
इंग्लैंड में उसकी बरसी पर उसे बड़ी करुणा के साथ याद
करने की रस्म निभाई गई। फिर आंख मूंद कर पश्चिम की
नकल करने वाले हमारे देसी पत्रकार भला पीछे क्यों
रहते! हमारे यहां भी पहली सितम्बर को अखबार डायना के
चित्रों और समाचारों से सजे रहे। कई नये-नये समाचार
सामने आए। मृत्यु समय डायना गर्भवती थी...
किन्तु गर्भ नये पति डोडी का
नहीं था...
वह कार दुर्घटना नहीं थी,
हत्या थी...
आदि। अब यह तो पत्रकार ही जानें कि ऐसे नये-नये
उद्धाटन एक दशक बाद कैसे होते हैं। संसार के
शोधाकर्ताओं के पास सोचने-चिन्ता करने के लिए कोई
विषय नहीं है जो एक बेकार की खोज किए जा रहे हैं।
खैर,
उनकी मर्जी। उनकी समझ पर भला कोई
कहां तक रोए!
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आतंकवादी गतिविधियां बेरोकटोक बढ़ रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार
1994 और 2005
के बारह वर्षों में,
47371 लोग आतंकवादी
(नक्सलवादी
हिंसा के अतिरिक्त)
घटनाओं में मारे गये। अर्थात, 3946
मौतें प्रतिवर्ष। जहां
अमेरिका में 9/11 2001
की वारदात के बाद कड़े
प्रबन्धों के परिणाम स्वरूप कोई बड़ी वारदात
दुबारा नहीं हुई। वहीं,
हमारे देश में ढुलमुल चुनाव
केन्द्रित नीतियों के कारण आतंकवाद और भी
आक्रामक होता जा रहा है। |
समाचार पत्रों पर कई दिनों तक मोनिका वेदी की
तस्वीरें भी छाईं... टी.वी. चैनलों ने भी उसके छूटने
के और फिर गुरुद्वारे में जाकर मत्था टेकने के
समाचार विस्तार से दिए। एक कहावत आपने भी सुनी होगी,
'सत्तर
चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।'
एक औरत... जो नकली पासपोर्ट बनवा
कर वसूली करने वालों के साथ जुड़ी रही और शायद अपने
धन-बल के बूते अदालत से बरी हो गई। देखिए कितनी
ख्याति मिल गई उसे! धन्य है,
यह न्याय व्यवस्था और धन्य है यह
मीडिया।
पाकिस्तान में मुल्लाओं द्वारा मुशर्रफ का विरोध
उग्र होता जा रहा है। सुना है,
मुल्लाओं ने एक गुरूद्वारे पर भी
कब्जा कर लिया। उधर अफगानिस्तान में निरन्तर सिमटते
हुए सिख समुदाया ने सरकार के आगे प्रदर्शन करके अपना
दुखड़ा सुनाया कि उन्हें अपने रीति-रिवाज पालन करने
में आम
(मुसलमान)
जनता का कड़ा विरोध सहना पड़ता है। यहां तक कि जब वे
अपने मृतक परिजनों का दाह संस्कार करते हैं,
तब भी उन पर पत्थर बरसाये जाते
हैं। और यहां, भारत में
कुछ अलगाववादी सिखों ने सिख समुदाय को मूल धारा से
अलग 'हाइजैक'
करके,
यह कहना सिखाया है कि हम हिन्दू नहीं हैं... सम्भवत:
समय ही उन्हें सिखा पाए कि अलग होना आसान है,
किन्तु अलग होकर अपनी
मान-मर्यादा, अपना सम्मान
बनाए रखना कितना कठिन होता है।
सरकार पर एटमी करार का मुद्दा आज भी गर्म है। लाल
तलवार सरकार के सिर पर लटक रही है... और
दिन-प्रतिदिन टूट पड़ने की धमकी दिए जा रही है... उस
पर सरकार ने अपने आपको रामसेतु पर हलफनामा देकर एक
और मुसीबत में फंसा लिया। खैर,
कानूनन तो वह हलफनामा वापस लेकर
सरकार बच गई, किन्तु उस
विवाद पर पार्टी में द्वंद्व जारी है। कुछ सरकार के
घटक तो खुलकर इस विवाद को हवा दे रहे हैं। वे राम के
अस्तित्व को चुनौती देने के साथ ही व्यक्तिगत आक्षेप
तक जा पहुंचे हैं। भगवान उन्हें सद्बुद्धि
दे। वैसे राम का ऐतिहासिक प्रमाण तो कुछ अंशों में
ही सही,
मिल जाएगा। किन्तु,
ऐसे धूर्त क्या कभी यह पूछने का
साहस करेंगे कि किसी कुंवारी के गर्भ से जन्म होने
का या खुदा द्वारा किसी देवदूत के माध्यम
से अपने आदेश भेजने का प्रमाण कौन देगा?
दशहरा पास है। जलता हुआ रावण शीघ्र ही देखने को
मिलेगा। धयान से देखिएगा,
उसके दस सिरों में कुछ
जाने-पहचाने मूर्खों एवं धूर्तों के चेहरे,
आपको आसानी से पहचान में आ
जाएंगे।
जहां,
एक ओर,
उच्चतम न्यायालय भी आरक्षण की
नीति पर संदेह व्यक्त कर चुका है,
वहीं दूसरी ओर,
आरक्षण की राजनीति जोर-शोर के
साथ गर्म है। क्या गुर्जर और क्या मीना,
क्या ईसाई और मुसलमान,
क्या विकलांग क्या आदिवासी,
क्या मुसलमान। सभी आरक्षण की
वैसाखी के सहारे सत्त
के गलियारे तक पहुंचने के लिए आंदोलन कर रहे हैं...
और जब सारी राजनीति दांव-पेंच पर ही आ टिकी है तो
फिर भाजपा ही क्यों पीछे रहे। उसने भी आगे बढ़कर
महिलाओं के आरक्षण का ऐलान कर दिया है। उच्चतम
न्यायालय के लिए इस विषय पर संदेह व्यक्त करना भर
पर्याप्त नहीं है- उसे दृढ़ता पूर्वक आरक्षण पर
प्रतिबंध लगाना चाहिए। किसी निर्बल वर्ग को सबल
बनाने के लिए सुपोषण,
सुसंस्कार एवं शिक्षा आवश्यक
होती है। उसे सत्त
सौंप देने से न उसका कोई भला होता है और न समाज का।
पिछले साठ वर्षों की आरक्षण नीति स्वयं ही इसका
प्रमाण है।
आतंकवादी गतिविधियां बेरोकटोक बढ़ रही हैं। आंकड़ों के
अनुसार
1994 और 2005
के बारह वर्षों में,
47371 लोग आतंकवादी
(नक्सलवादी
हिंसा के अतिरिक्त)
घटनाओं में मारे गये। अर्थात, 3946
मौतें प्रतिवर्ष। जहां अमेरिका
में 9/11 2001 की वारदात
के बाद कड़े प्रबन्धों के परिणाम स्वरूप कोई बड़ी
वारदात दुबारा नहीं हुई। वहीं,
हमारे देश में ढुलमुल चुनाव
केन्द्रित नीतियों के कारण आतंकवाद और भी आक्रामक
होता जा रहा है। वास्तव में हमारी सरकार ने आतंकवाद
की जड़ तक पहुंचने का कभी प्रयास ही नहीं किया। अपनी
शान्तिप्रियता का दंभ भरनेवाले मुसलमान बुद्धिजीवियों
(कोई
सुन रहा है?)
ने भी कभी यह समझने का प्रयास नहीं किया कि उनकी
मजहबी सोच में ऐसा क्या है जो हजारों मरने-मारने की
प्रवृत्ति
वाले लोग उत्पन्न करता रहता है।
ईमेल:
siteshalok@hotmail.com |