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मर्यादापुरुषोत्तम राम अगर कठिन,
अलंघ्य,
दुष्प्राप्य,
स्पृहणीय,
आदर्श और न जाने क्या-क्या नजर आते हैं तो उसका
मर्म वाल्मीकि रामायण में ढूंढ़ने की कोशिश
कीजिए। वाल्मीकि कठिन काम कर रहे थे। वे एक ऐसा
मनुष्य चाहते थे जिसे ईश्वर मानने का लोभ किसी
भी कवि या प्रशंसक को कभी भी घेर सकता है। घेर
ही तो लिया था जब अद्भुत रामायण,
अध्यात्म रामायण और रामचरित मानस के महाकवियों
ने राम को परब्रह्म बताकर उनके संघर्ष भरे जीवन
को लीला बना दिया था। जब आपने किसी को ईश्वर मान
लिया तो आप उसका विश्लेषण कैसे कर सकते हैं?
'ब्रह्म
अनामय अज भगवन्ता'
को आप तर्क की कसौटी पर कैसे कस सकते हैं?
जब उनके जीवन संघर्ष को जीवनलीला मान लिया तो
कैसे उनके विराट व्यक्तित्व की सूक्ष्मताओं,
गहराइयों और बुलंदियों का उनके कुल चरित्र का
आकलन कर सकते हैं?
तुलसी के युगानुरूप योगदान को प्रणाम करते हुए
भी वाल्मीकि को बार-बार पढ़ने को मन करता है।
क्योंकि तुलसी के राम प्रणम्य और उपास्य हैं,
जबकि वाल्मीकि के राम अनुकरणीय हैं। इसलिए अगर
राजा राम के मर्यादापुरुषोत्तम रूप को पढ़ना और
इस कारण उन्हें अपने जीवन में बार-बार मिले
मानसिक कष्टो
और आवेगों को जानना हो तो वाल्मीकि अपने सात
काण्डों वाले प्रबन्ध काव्य के करीब साढ़े छ: सौ
सर्गों के चौबीस हजार श्लोक आपके सामने पेश कर
देते हैं।
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कठोर निर्णय लेने वाले मर्यादा-स्थापक का
जीवन कितना करुण और अकेला हो सकता है,
इसका जीवन्त चित्रण दिड़्नाग
अपनी नाटिका
'कुन्दमाला'
और भवभूति अपने नाटक
'उत्तररामचरित'
में करते हैं। |
क्यों कहा जाता है राम को मर्यादापुरुषोत्तम?
क्यों नहीं उन्हें कृष्ण की
तरह योगेश्वर कहा जाता?
राम और कृष्ण को एक दूसरे से
बढ़कर मानने वालों का समाधान
तो दुनिया में कोई कर ही नहीं सकता,
खुद राम और कृष्ण भी नहीं तो
हम भला किस कतार में आते हैं?
कृष्ण का एक हंसता,
खिलता-खिलाता व्यक्तित्व है
जो किसी व्यक्ति,
वस्तु या घटना को खुद से बड़ा मानता ही नहीं।
कहीं भी खुद को नियमों-कायदों से बांधता ही
नहीं। उनका एक ही कथन है,
कर्म करो। उनका जीवन कहता है
कि जहां भी हो, वहां
खुद को व्यवहार से जोड़कर अपनी बात कहो,
इस ढंग से कहो,
करो कि सर्वातिशायी बन जाओ।
इसलिए कृष्ण सब जगह लिप्त और कर्मशील नजर आते
हुए भी निर्लिप्त और निष्काम बने रहे,
अग्रपूज्य योगेश्वर हो गए।
पर राम की एक भारी दुविधा है। वे नियम नहीं तोड़
सकते। मर्यादा नहीं लांघ सकते। इसलिए सब जगह
अपनी छाप छोड़ने वाले कृष्ण का व्यक्तित्व आकाश
के समान असीम है और मर्यादा की रेखा को कभी न
लांघने का संकल्प पूरा करने वाले राम का
व्यक्तित्व समुद्र के समान गहरा है। दोनों को
नापना कठिन है। दोनों को ही उनके परले छोर तक
देख पाना आसान नहीं।
पर आंक पाना इतना मुश्किल नहीं कि राम के जीवन
में ऐसा क्या हुआ कि वे
पुरुष
से
पुरुषोत्तम
हो गए। मर्यादा की रक्षा करने की समुद्र की
श्रद्धापूर्णिमा
की रात को नजर आती है,
जब लगता है कि उसके पानी का
यह उद्दाम उछाल पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले
लेगा। पर वह अपने पानी को किनारे की मर्यादा
नहीं लांघने देता और सारे ज्वार को अपने पेट में
समा लेता है। राम भी ऐसे ही हैं। उनके सामने जब
भी संकट आए तो उन्होंने अपने लाभ के बजाय
मर्यादा की रक्षा को ज्यादा महत्व दिया। उन्हें
हानि हुई, उन पर
आक्षेप लगे, वे कटु
आलोचना का पात्र भी बने। 'इतिहास
तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा'
ऐसे ताने उनके लिए थे। पर
उनके लिए पहला स्थान था मर्यादा का,
उसकी स्थापना का,
उसकी रक्षा का। अपने हित,
अपने सम्मान,
अपने यश का दांव खेलकर भी
राम ने मर्यादा की रक्षा की।
इसलिए अचरज नहीं कि राम के जीवन में अनेक संकट
आए। अगर राम ने तात्कालिक हितसाधन को,
सामान्य मनुष्यों की तरह,
महत्व दिया होता तो शायद
उनके जीवन में आए संकट,
संकट न बनकर घटना मात्र बन
कर रह गए होते। पर ऐसा हुआ क्या?
कुछ संकट तो आप हाथों हाथ
गिनवा सकते हैं। जब राज्याभिषेक होने को था तो
वन जाने की आज्ञा मिल गई। चित्रकूट में भरत के
अनुरोध को ठुकरा दिया। शूर्पणखा प्रसंग,
सोने के हिरण वाली घटना,
फिर जब वनवास खत्म होने में
महज छह-सात महीने रह गए थे तो सीता हरण। फिर
वाली वध, समुद्र पर
सेतु बांधना, लंका पर
चढ़ाई, लक्ष्मण मूर्छा,
सीता की अग्निपरीक्षा,
सीता निर्वासन,
शम्बूक वध,
सीता का पृथ्वी प्रवेश और
लक्ष्मण परित्याग!
ये सभी अवसर ऐसे थे कि राम ने जैसा किया,
उससे अलग आचरण वे कर सकते
थे। राज्याभिषेक के वक्त मिली वनगमन की आज्ञा को
वे अन्यायपूर्ण कहकर ठुकरा सकते थे। भरत द्वारा
वापस लौटने का आग्रह बदली परिस्थितियों में समय
की आवश्यकता कहकर मान सकते थे। हिरण सोने का हो
ही नहीं सकता, यह
कहकर वे सीता का अनुरोध टाल सकते थे। सुग्रीव के
बजाए वाली से मैत्री कर वे न केवल वाली वध की
तोहमत से बच सकते थे,
बल्कि रावण के विरुद्ध
एक अधिक शक्तिशाली सन्धि वे किष्किन्धा नरेश से
कर सकते थे। लक्ष्मण मूर्छा का इलाज दूसरों के
जिम्मे डाल खुद सीधे मेघनाद को मारने निकल सकते
थे। समुद्र पर सेतु कौन बांधे,
इस बहाने रावण के साथ युद्ध
को टाल सकते थे। सीता की अग्निपरीक्षा का मुद्दा
सिरे से नकार सकते थे। सीता को फिर से निर्वासित
करने के बजाय वे राज्यत्याग कर सकते थे। सीता के
पृथ्वी प्रवेश पर पृथ्वी विदीर्ण कर सकते थे।
लक्ष्मण की विवशता में हुई अनुशासन हीनता को वे
उनके पिछले रिकार्ड की दुहाई देकर माफ कर सकते
थे। पर अगर वे यह सब करते तो फिर राम कैसे
कहलाते?
जैसे कृष्ण खुद में कुछ नहीं,
बस निष्काम कर्मशीलता की एक
सतत गतिशील मूर्ति बन गए थे,
जिसने उन्हें योगेश्वर बना
दिया, वैसे ही राम भी
खुद में कुछ नहीं रह गए थे। उन्होंने खुद को
मर्यादा की रक्षा का जरिया या माध्यम
मात्र बना डाला,
जिसने उन्हें
पुरुषोत्तम
बना दिया।
तो क्या राम के पास भावनाएं नहीं थीं?
जड़ नियमों व मर्यादाओं का
पालन करते हुए वे भी पाषाण हो गए थे?
राम को पत्थर कह देने की
इच्छा इनके आलोचकों की हो सकती है,
विश्लेषकों की नहीं। राम के
पास हृदय था, जिसे
मसोसकर वे मर्यादा का पालन करते रहे,
बूझते हुए कि वे खुद को
समाप्त कर मर्यादाओं को निभा रहे हैं। जब उनका
राज्याभिषेक होने को था,
दशरथ के मंत्रिमंडल ने इसकी
अनुमति दे दी थी, सब
तैयारियां हो चुकी थीं,
राम और सीता के आनन्द की
सीमा नहीं थी, तभी
वनगमन के आदेश-वज्र का घात उन्होंने कैसे सहा
होगा? बेशक राम ने
कैकेई को आश्वासन दिया कि एक बार 'हां'
कह देने के बाद राम मुकरता
नहीं-'रामो
द्विर्नाभिभाषते।'
लक्ष्मण को उन्होंने समझाया कि पिता की आज्ञा का
पालन करना ही मेरा धर्म है। पर सीता के सामने
जाने पर राम अपने मन का दुख छिपा नहीं पाए। सीता
ने उनकी 'शोकसन्तप्त'
'चिन्ताव्याकुलितेन्द्रिय'
विवर्णवदन'
(वाल्मीकि
रामायण,
अयोध्याकांड,
सर्ग 26)
मुद्रा को देखकर भांप लिया कि कुछ भारी गड़बड़ हुई
है।
क्यों राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली?
यहां फिर राम के दो रूप हैं।
एक पति का और एक नायक का। सीता के अग्नि प्रवेश
करते ही राम की आंखें आंसुओं से भर गईं
(युद्धकांड,
सर्ग 117,
वाष्पव्याकुललोचन:)
और बाद में उन्होंने अग्नि से कहा कि मैं तो
सीता पर कोई सन्देह नहीं करता,
पर इस तरह की परीक्षा नहीं
लेता तो लोग मेरे बारे में कितना भला-बुरा कहते
(युद्धकाण्ड,
सर्ग 118,
श्लोक 13-15)
राम के लिए जीवन के भयानकतम संकट तब आए जब
उन्हें जनापवाद के कारण सीता का परित्याग करना
पड़ा। पर जब फिर से मिलने का क्षण आया तो सीता
पृथ्वी में प्रवेश कर गई। वाल्मीकि ने दोनों
घटनाओं के काव्यचित्रण में कमाल कर दिया। राम को
जनापवाद की जानकारी तब मिलती है,
जब वे सीता के साथ मुक्त और
प्रसन्न विहार कर चुके होते हैं और गर्भिणी सीता
की फिर से वनदर्शक की बेहद इच्छा को पूरा करने
का वचन दे चुके होते हैं
(उत्तरकाण्ड
सर्ग
42,43)।
पर बदले माहौल में उन्हें लक्ष्मण को सीता को
जंगल में छोड़ आने का आदेश देना पड़ता है। यह कहते
वक्त राम का मुंह सूख रहा होता है,
आंखें आंसुओं से भरी होती
हैं, हृदय शोक से
परिपूर्ण होता है वे और लम्बी सांस खींचते हुए
अपने आवास में प्रवेश कर जाते हैं
(उत्तरकाण्ड
सर्ग
45, श्लोक 24, 25)।
सीता के प्रति उनके व्यक्तिगत उद्गारों को राजा
की मर्यादा का बंधन कैसे जकड़ लेता है,
ये तमाम सर्ग उसका बेजोड़
नमूना पेश करते हैं।
पर जब सीता फिर से मिल जाने के बाद,
प्रजा की स्वीकृति भी मिल
जाने के बाद, पृथ्वी
में प्रवेश कर जाती है तो राम एकदम हिल जाते
हैं। वे खड़े तो क्या बैठ भी नहीं पाते और उन्हें
अपने सिंहासन के
पार्श्वदण्ड का सहारा लेना पड़ता है,
आंखें आंसुओं से भर जाती हैं,
सिर नीचे झुक जाता है,
मन ग्लानि से भर जाता है,
वे दु:ख से सराबोर हो जाते
हैं और बहुत देर तक रोते रहते
हैं-दण्डकाष्ठवमष्टभ्य वाष्पव्याकुलितेक्षण:।
अवाक्शिरा दीनमना रामो ह्यासीत् सुदु:खित। स
रुदित्वा चिंर कालं बहुशो वाष्पमुत्सृजन्।
(उत्तरकाण्ड,
सर्ग 96,
श्लोक 2, 3)।
आखिर क्यों राम ने अपने हृदय की भावनाओं को कुचल
कर हमेशा मर्यादा की रक्षा की?
इसलिए कि राम एक व्यक्ति भी
थे नायक भी थे। नायक का उनका व्यक्तित्व राजा के
रूप में व्यक्त हुआ है। राम एक सिध्दांत से
प्रभावित थे कि अगर नायक कहीं गड़बड़ी करता है तो
प्रजा उसे आदर्श मानकर वैसा बरतना शुरू कर देती
है- यथा कि कुरुते राजा प्रजा तमनुवर्तते
(उत्तरकाण्ड,
सर्ग 43,
श्लोक 19)।
सर्ग
45 के श्लोक 10
में वे साफ कहते हैं कि
अन्तरात्मा जानती है कि सीता शुद्ध
है-
'अन्तरात्मा च मे वेत्ति
सीतां शुद्धां
यशस्विनीम्'।
पर लोकापाद? नायक को
तो उसी के अनुसार मर्यादा तय करनी होगी
(श्लोक
11-15)।
इसलिए राम के पास हमेशा दो विकल्प थे- अपने
हितों और हकों को मनवाना,
या सार्वजनिक आदर्शों का
पालन करना। राम ने हमेश दूसरा विकल्प चुना,
क्योंकि दोनों के बीच
सामंजस्य स्थापित करना शायद एक नाटक मात्र होता।
ऐसा नहीं कि मर्यादापुरुषोत्तम
राम का व्यक्तिगत जीवन कोई
फूलों
की सेज था। ऐसा हो ही नहीं सकता था। कठोर निर्णय
लेने वाले मर्यादा-स्थापक का जीवन कितना करुण और
अकेला हो सकता है,
इसका जीवन्त चित्रण दिड़्नाग
अपनी नाटिका
'कुन्दमाला'
और भवभूति अपने नाटक
'उत्तररामचरित'
में करते हैं। भवभूति के राम
मर्यादा पालन के लिए व्यक्तित्व के बलिदान में
किस हद तक जा सकते हैं,
इसका नमूना राम का यह
वक्तव्य है कि लोक की आराधाना के लिए मुझे अपने
स्नेह, दया,
सौख्य और यहां तक कि जानकी
का परित्याग करने में भी कोई व्यथा नहीं होगी-
'स्नेहं दयां च
सौख्यं च यदि वा जनाकीमपि,
आराधानाय लोकस्य मुंचतो
नास्ति मे व्यथा।' पर
जानकी का परित्याग करने के बाद राम किस कदर टूट
गए थे और उन्हें सीता की छाया का अहसास भी कितना
सकून देता था, इसी का
नाम है भवभूति का उत्तरामचरित और खासकर उसका
तीसरा अंक। नाटक में राम का कहना है कि यह मैं
ही एक राम हूं जो सब सहे जा रहा हूं-रामोस्मि
सर्वं सहे।
राम की व्यथा से भवभूति इतने
विह्लल
हो गए कि उन्होंने अपने नाटक के अन्त में राम
सीता का मिलन करवा दिया। तुलसीदास तो राम
राज्याभिषेक के बाद के राम का सामना ही नहीं कर
पाए। राम जैसे महानायक को शब्द-संभाल दे पाना
वाल्मीकि जैसे विराट्,
शोक-परिचालित कवि-हृदय के ही बूते की बात थी। वे
राम का साथ कहीं नहीं छोड़ते और न ही उनके जीवन
में मीठी कल्पनाएं उड़ाने का भवभूमि-प्रयास करते
हैं,
क्योंकि वे तो राम के
समकालीन हैं। सीता विलय के बाद संतप्त राम के
साथ मानो बतियाते वाल्मीकि राम के सरयू प्रवेश
तक उनके साथ जाते हैं। सीता के पृथ्वी विलय के
उपरान्त लक्ष्मण का परित्याग कर देने के बाद राम
शोक का महासागर बन चुके थे। वाल्मीकि यहां भी
राम के साथ थे। राम ने हर संकट का समाधान
मर्यादा पालन में ढूंढा और खुद वे नितान्त अकेले
रह गए। राम का अपना जीवन इतना अकेला और कारुणिक
था कि उसका सादा,
प्रवाहपूर्ण पर भावना प्रबल वर्णन करने के कारण
वाल्मीकी की रामायण को करुण रस का अवतार मान
लिया गया। पर अगर राम ऐसा जीवन न चुनते तो
हजारों सालों से चला आ रहा एक ऐसा प्रकाशस्तम्भ
भी वे न बन पाते जिसने राजा राम के मर्यादापुरुषोत्तम
रूप से इस देश की जनता को हर संकट में सहारा भी
दिया है और दिशा भी बताई है।
सम्पर्क:
एन.डी.
23, विशाखा इंकलेव,
पीतमपुरा,
दिल्ली-110034 |