भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दीं मासिक पत्रिका

अक्टूबर, 2007

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बाजार बनते परिसर की चिंता

विजय कुमार मिश्र

गांव की मिट्टी की सोंधी महक और भूमंडलीकरण के कारण उत्पन्न महानगरीय चकाचौंध में यदि साम्य और वैषम्य के प्रामाणिक चिन्ह ढूंढना हो तो विश्वविद्यालय परिसर की ओर रुख करें। वैश्वीकरण के कारण जो बदलाव हुए हैं उसका साक्षी बनने का अनचाहा मौका इस पीढ़ी को मिला है। यह युग तकनीक, फैशन और तेज बदलाव का है। एक तकनीक अपना असर दिखाता नहीं है कि दूसरी उसे अपदस्थ कर देती है। एक फैशन लोकप्रिय हुआ नहीं कि दूसरा अपने पूर्ण प्रभाव और ग्लैमर के साथ अवतरित हो जाता है। तेज बदलाव के इस युग में लोगों की रुचियों, वृत्तियों, मूल्यों सबमें व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इन बदलावों ने खासकर युवाओं की तो जैसे दुनिया ही बदल दी है। उनके पहनावे, उनकी भाषा, व्यवहार और प्राथमिकताएं सभी में बदलाव आए हैं।

  उनकी फैशनपरस्ती का आलम यह है कि परिसर शिक्षा और ज्ञान के केन्द्र से अधिक एक अजीबो-गरीब जीवन-शैली के प्रदर्शन-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगे हैं।

बदलाव की इस बयार को यदि गहराई के साथ समझना हो तो दिल्ली विश्वविद्यालय या फिर ऐसे अन्य किसी भी महानगरीय विश्वविद्यालय के परिसर को आप अपने अनुसंधान के लिए चुन सकते हैं। क्योंकि, ये वैसे परिसर हैं जहां एक ओर तो भारत के सुदूर ग्रामीण इलाकों के मेधावी छात्र अपनी पढ़ाई के लिए कई सारे सपनों और मुश्किलों के साथ आते हैं तो दूसरी ओर शहरी धनाढय या नव धनाढय परिवार के बच्चे भी अपने शौक और शगल को पूरा करने के लिए मौजूद रहते हैं। उनकी फैशनपरस्ती का आलम यह है कि परिसर शिक्षा और ज्ञान के केन्द्र से अधिक एक अजीबो-गरीब  जीवन-शैली के प्रदर्शन-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगे हैं। मुंबइया हिन्दी और हिंगलिश का धमाल, नई-नई गाड़ियां और बाइकें, ब्रांडेड टी-शर्ट, कुर्ते, पटियाला शूट, नीरुलाज की भीड़-भाड़ और न जाने क्या-क्या। एक पल के लिए आप परिसर को बाजार समझ सकते हैं। और उसकी रौनक को किसी फैशन-शो की रौनक। शिक्षण संस्थानों में ड्रेसकोड की अवधारणा को तो पहले ही यह समाज और इस समाज के तथाकथित बुद्धिजीवी खारिज कर चुके हैं।

खैर, इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि ऐसे में उन ग्रामीण इलाकों से आनेवाले छात्रों के लिए परिसर का यह वातावरण कितना सहज और सहायक रहता है, जहां विकास पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है। वैसे भी भारत में विकास को गांवों तक पहुंचने में लम्बा वक्त लगता है। शहर और गांव की  सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। गांव के लोग, वहां की युवा पीढ़ी और वहां के छात्र महानगरीय चकाचौंध से पूरी तरह अपरिचित ही होते हैं। ऐसे में परिसर के बदलते माहौल और फैशनपरस्त बच्चों के बीच वे स्वयं को पिछड़ा और अयोग्य मान कुंठाओं और अवसादों में घिर जाते हैं। फिर शुरू होता है गर्त में धांसने का सिलसिला। सामान्य भाषा, सामान्य वेश-भूषा और सामान्य व्यवहार के आदी ये छात्र आकर्षणों में घिरकर, उसका शिकार बनते हैं और स्वयं को बर्बाद होने की प्रक्रिया में झोंक देते हैं। सिगरेट, सिनेमा और शराब उनकी जरूरतें बन जाती हैं। ब्रांडेड कपड़े और फैशन की दुनिया को पाने और पालने की ललक में वे कुछ भी करने को तैयार बैठे दिखाई देते हैं। वे ड्रग्स ले सकते हैं। अपना संस्कार गिरवी रख सकते हैं। यहां तक कि अपना शरीर भी बेच सकते हैं। और यह सब होता है परिसर में मौजूद चन्द बिगड़ैल और फैशनपरस्त बच्चों की फैशनपरस्ती को मिलनेवाली खुली छूट के कारण।

इन परिस्थितियों में ज्ञान और प्रतिभा के विकास के रूप में प्रतिष्ठित परिसर एक दायित्वहीन, अमर्यादित नागरिकों की पीढ़ी तैयार करने का केन्द्र मात्र बनकर रह जाता है। युवाओं की जो और जितनी ऊर्जा राष्ट्र और समाज के निर्माण में व्यय होनी चाहिए वह नकारात्मक कार्यों में खपत होने के लिए अभिशप्त हो जाती है। उनका दृष्टिकोण, उनकी जरूरतें और उनकी प्राथमिकताएं सब कुछ स्वकेन्द्रित और सुविधाकेन्द्रित हो जाती हैं। जो भी हो परिसर ज्ञान और व्यक्तित्व निर्माण का केन्द्र हैं और आगे भी रहेंगे। समय रहते इनकी मर्यादा को बचाने के लिए यदि कोई त्वरित और ठोस कदम नहीं उठाया गया तो परिसर का उद्देश्य ही पराजित हो जाएगा। फिर हमारी भावी पीढ़ी पथभ्रष्ट और मूल्यहीन संस्कारों के लिए जानी जायेगी और हमारी गिनती एक ऐसी मूकदर्शक और किर्कत्तव्यविमूढ़ पीढ़ी के रूप में होगी जो अपने भविष्य के प्रति सर्वथा दायित्वहीन अथवा उदासीन थी।

किन्तु इस सबका मतलब यह कतई नहीं है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी नए-नए अनुसंधान और तकनीक के साथ-साथ बाजार के उपयोग से स्वयं को अलग-थलग कर ले। परम्परा और मूल्य के चक्कर में यह वर्तमान युग से सामंजस्य बिठाने के बदले उससे टक्कर लेने लगे। अगर ऐसा हुआ तो वह युगीन चेतना और प्रवृत्तियों से सर्वथा अपरिचित और अनभिज्ञ ही रहेगी। आवश्यकता इस बात की है कि सभी विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए आवश्यक अत्याधुनिक तकनीकों और पद्धतियों का सहारा लें। विद्यार्थियों की मौलिकता और उनकी मौलिक प्रतिभा में पूरा विश्वास रखते हुए उसे अभिव्यक्त होने के अवसर प्रदान करने की विधि की तलाश करें और उसे लागू करें।

किसी भी देश अथवा समाज में सकारात्मक परिवर्तन का परिवेश निर्मित करने में वहां के लोगों की मौलिकता का महत्वपर्णू स्थान रहा है। छात्र किसी बनी-बनाई संरचना में स्वयं को ढालने की आदत से अलग मौलिक चिंतन, मौलिक दृष्टि और मौलिक अभिव्यक्ति को आत्मसात करने की क्षमता रखते हैं। अपने इन्हीं गुणों के कारण राष्ट्र और समाज को दिशा प्रदान करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। युवाओं की मौलिकता को प्रेरित और प्रोत्साहित करने का दायित्व विश्वविद्यालय परिसर को लेना ही होगा। यह तभी संभव है जब परिसर सभी विद्यार्थियों के लिए एक स्वस्थ और सहज माहौल मुहैया कराये जिसमें बहाव में बहने की जगह व्यक्ति के स्वयं का स्वभाव मुखरित हो सके। वह अपनी मौलिक संकल्पनाओं को साकार करने की परिस्थिति में स्वयं को सक्षम पा सके। इसके लिए पाठयक्रम से लेकर अनुसंधान तक और क्लास कल्चर से लेकर परिसर कल्चर तक की कायदे से समीक्षा की जरूरत है। तभी हम आवश्यक कदम उठा सकते हैं। बहस, विमर्श और अनुसंधान से लेकर शिक्षा संबंधी अनेक प्रक्रियाओं में मौलिकता के विकास की संभावनाओं को तलाशने की दिशा में बढ़ने से ही अन्य अनावश्यक और अनपेक्षित समस्यओं का समाधान हो सकेगा। इसलिए इस दिशा में सोचने और उसे कार्य रूप देने के लिए सभी को आगे आना चाहिए।

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