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अपनी बात |
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हमें क्या चाहिए,
ये हम तय करें। |
अगर यह कहें कि आज हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं,
उसकी जीवनी शक्ति विज्ञापन है तो
अतीशयोक्ति नहीं होगी। वह समय बीत गया जब लोग किसी
तथ्य को उसके वास्तविक गुण-दोष के आधार पर जान-समझ
सकते थे। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि जैसे-जैसे
मनुष्य विकसित होता गया,
उसके लिए सत्य को जानना और समझना मुश्किल होता गया।
सत्य और मनुष्य के बीच ऐसे कई तत्व विकसित हो गए
जिन्होंने सत्य को अपनी सुविधानुसार मनचाहा रूप देना
प्रारंभ कर दिया। धीरे-धीरे यह माहौल बनाया गया कि
बिना प्रचार-प्रसार के सत्य अपना अस्तित्व बचा नहीं
पाएगा, अपना प्रभाव
स्थापित नहीं कर पाएगा। इसी के साथ इस एहसास को भी
पैदा किया गया कि जो प्रचारित है,
वही सत्य है,
वही श्रेष्ठ है। जब प्रचार की
प्रभुता स्थापित हो गई तो स्वार्थसिद्धि
के लिए असत्य को सत्य बताने की भी कोशिशें शुरू हो
गईं। आज का हमारा विज्ञापन उद्योग इस प्रवृत्ति
का जीता जागता प्रमाण है।
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विज्ञापनों ने यह भूमिका स्वयं अपने हाथों में
ले ली है। वे ही तय करते हैं कि मनुष्य के लिए
क्या जरूरी है और क्या जरूरी नहीं है। इस
प्रक्रिया में उन्मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने के
लिए दिन-रात एक कर दिए गए हैं। |
विज्ञापन की अवधारणा काफी
पुरानी
है। लेकिन,
आज हम जिस विज्ञापन जगत को देख
रहे हैं, उसके बीज यूरोप
की औद्योगिक क्रांति में छिपे हैं। इस क्रांति के
कारण हुए मशीनीकरण ने उत्पादन में बेतहासा वृद्धि
कर दी। समाज की पारंपरिक आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन
होने के कारण सरप्लस
की समस्या उत्पन्न हो गई। इस
सरप्लस
को खपाने और इस प्रक्रिया में अंधाधुंध लाभ कमाने के
लिए विज्ञापन की नई विधा विकसित की गई। इस काम में
शुरुआती अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद
में टी.वी. के आ जाने से विज्ञापन की दुनिया को जैसे
पंख लग गए। धीरे-धीरे विज्ञापन के कई और माध्यम
भी खोज लिए गए। इन सबने मिलकर औद्योगिक क्रांति के
कारण हो रहे
सरप्लस
उत्पादन को बेहिसाब लाभ कमाने का जरिया बना दिया।
पहले जहां मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए
उत्पादन किया जाता था,
वहीं अब उत्पादन की मात्रा और
प्रकार के अनुसार मनुष्य की आवश्यकताएं गढ़ी जाने
लगीं।
विज्ञापन आज की दुनिया का सच है। जीवन का कोई भी
क्षेत्र इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। अब न केवल
आर्थिक बल्कि राजनैतिक,
सामाजिक एवं
धार्मिक
क्षेत्रों में भी विज्ञापन ने अपनी पैठ बना ली है।
इन सभी क्षेत्रों में विज्ञापन का प्रयोग अगर सही और
आवश्यक जानकारी देने के लिए किया जाए तो किसी को
शायद ही एतराज हो। लेकिन,
जिस प्रकार से और जिस उद्देश्य
से इसका प्रयोग किया जा रहा है,
वह निश्चित रूप से चिंता का विषय
है। विज्ञापनों में सच बोलने का तो जैसे चलन ही खत्म
हो गया। बड़ी सफाई से मनुष्य से यह अधिकार
छीन लिया गया कि वह अपनी जरूरतें तय कर सके।
विज्ञापनों ने यह भूमिका स्वयं अपने हाथों में ले ली
है। वे ही तय करते हैं कि मनुष्य के लिए क्या जरूरी
है और क्या जरूरी नहीं है। इस प्रक्रिया में
उन्मुक्त उपभोग को बढ़ावा देने के लिए दिन-रात एक कर
दिए गए हैं।
यदि हमें यह सुनिश्चित करना है कि मनुष्य अपनी
जरूरतें खुद तय करे तो हमें कुछ उपाय करने होंगे।
पहले तो हमें विज्ञापनों को झूठ का प्रचार करने और
अन्य अनैतिक हथकंडे अपनाने से रोकने के लिए कानून
बनाना होगा। यद्यपि यह जरूरी है,
लेकिन पर्याप्त नहीं। समस्या का
असली समाधान तो स्वयं प्रत्येक व्यक्ति के पास है।
और वह है व्यक्ति का विवेक। जरूरत है बस उसे
इस्तेमाल करने की। आगे जब कभी कोई विज्ञापन देखने के
बाद उसके प्रति मन में आकर्षण पैदा हो तो हम अपने से
दो सवाल पूछें। पहला कि क्या वाकई विज्ञापित वस्तु
की हमें जरूरत है? दूसरा
यह कि क्या विज्ञापन में कही बात वास्तव में सच है?
यदि हमने स्वयं से ये दो सवाल
पूछने शुरू कर दिए तो विज्ञापनों के दुष्प्रभाव को
हम काफी हद तक रोक सकेंगे।
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