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अक्टूबर, 2007

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विकास और विस्थापन का सवाल

एकता परिषद की जनादेश यात्रा ने हाल ही में दिल्ली में दस्तक दी। विस्थापितों के हक की लड़ाई को इस यात्रा ने दूर-दराज के इलाकों से लाकर दिल्ली पहुंचा दिया। जिन लोगों के हाथ में ताकत है, त्ता है, उन्होंने इस यात्रा को कितना महत्व दिया, अभी इसका स्पष्ट आकलन मुश्किल है। लेकिन, समाज के प्रबुध्द लोग इस मुद्दे को लेकर आंदोलित दिखे। इनमें से कुछ लोगों से हमारे प्रतिनिधि आशीष कुमार "अंशु" ने बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश।

विस्थापन वास्तव में विकास पर ही प्रश्न चिन्ह है। विमल भाई, सामाजिक कार्यकर्ता
 

आज विकास का मतलब क्या है और यह किसके लिए है ? यदि विस्थापन आम लोगों की सहमति से हो, खुली चर्चा के बाद हो तो बात समझ में आती है, लेकिन आज जो विस्थापन हो रहा है, उससे सिर्फ वही चन्द रसूख वाले लोग खुश हैं, जिनका इससे मतलब सध रहा है। आज जिन इलाकों में विस्थापन चल रहा है, आप देख कर आइए एक बार। वहां स्थितियां विस्थापन के अनुकूल नहीं हैं। फिर भी विस्थापन का तुगलकी फरमान जारी कर दिया गया है। पिछले 17 सालों में जब से नई आर्थिक नीति  आई है, देश में विस्थापन बढ़ा है। 2003 में पुनर्वास नीति की घोषणा हुई। लेकिन इन नीतियों का कोई फायदा नहीं हुआ। यह सिर्फ कागजी कार्यवाही में सिमट कर रह गई। आजादी के बाद अब तक लगभग 40 लाख हेक्टेयर जमीन को पानी में डूबो दिया गया है। पिछले 25 वर्षों में विस्थापन के आन्दोलन में नर्मदा, टिहरी से तेजी आई है। फिर भी विस्थापन रोकने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। भूमि अधिग्रहण का जो मूल कानून है वह सन् 1834 का है। अर्थात् अंग्रेजो के समय का, अंग्रेजों का कानून है। बाद में उसमें थोड़ा सुधार हुआ, पर वह भी सरकार के हित में अधिक जाता है, आम जनता के हित में कम। इस वर्ष इस संबंध में एक नीति और आ गई है। लेकिन कुछ सकारात्मक होता नहीं दिख रहा। कुल मिलाकर कहें तो विस्थापन वास्तव में विकास पर ही प्रश्न चिन्ह है, क्योंकि इसमें उसी को विस्थापित कर दिया जाता है जो पिछड़ा है, जिसे विकास की जरूरत है। मेरा मानना है कि पुनर्वास नीति की जगह एक ऐसी विकास नीति बननी चाहिए, जिसमें गांव देहात के व्यक्ति की भागीदारी होA

यह विस्थापन नहीं उजाड़ना है। लोकेन्द्र भारतीय, जनादेश यात्री
जिसे सरकारी भाषा में विस्थापन का नाम दिया जा रहा है, वह विस्थापन नहीं है। इसे उजाड़ना कहेंगे। विकास के नाम पर गांव के गांव उजाड़ दिये जाते हैं। यदि यह विस्थापन होता तो साथ ही साथ पुनर्वास भी तो होता। जनादेश में जो लोग आए हैं, वे विस्थापित नहीं हैं, उजाड़े गए लोग हैं। इनके घर छीन लिए गए हैं विकास के नाम पर। इसके बाद लोग जाएंगे कहां, इसकी चिन्ता किसी ने नहीं की। गांव के गांव बर्बाद हो गए। गांव वालों को मुआवजा तक नहीं मिला। कोई इनकी आवाज सुनने को तैयार नहीं है। क्या विकास की इस प्रक्रिया से आप सहमत हो सकते हैं ? वास्तव में यह विकास नहीं गरीबों का विनाश है
सेज का कानून खत्म किया जाए। भारत डोगरा, स्तम्भकार एवं चिन्तक
 

विस्थापन और विकास का जो प्रश्न है, उसमें मेरा मानना है कि विकास का ऐसा माडल होना चाहिए जिसमें विस्थापन न्यूनतम हो। लेकिन आज सरकार की नीतियां ऐसी हैं, जिनमें विस्थापन की बहुतायत है। मेरा अनुभव है कि विस्थापन के मामले में आमतौर पर पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हो पाता। अभी सरकार ने एसईजेड का जो कानून बनाया है, वह सबसे अधिक खतरनाक है। पहले कहने के लिए ही सही पर विस्थापन के साथ सार्वजनिक हित की बात जुड़ी होती थी। सेज के आने के बाद वह बात भी नहीं रह गई। हमारी मांग है कि सेज का कानून वापस लिया जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोधी कानून है। इसी के साथ उन स्थितियों को भी कम करने की जरूरत है, जिनसे विस्थापन की संभावना उत्पन्न होती है।

इस विकास का पेटेंट किसी और के पास है। अनिल चमड़िया, वरिष्ठ पत्रकार
किसी भी समाज के लिए विकास जरूरी है। पर यह विकास समाज की कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता। भूमंडलीकरण पूरे समाज को विस्थापित करने पर आमादा है। इसने हमारी मानसिक स्थिति ऐसी बना दी है कि हम सिर्फ जमीन से विस्थापन को बमुश्किल स्वीकारते हैं। समाज का कौन सा हिस्सा है जो रोजी-रोटी के लिए विस्थापित नहीं है। समाज को यह बात मन में बिठा लेनी चाहिए कि आज के दौर में पूरे समाज का  विस्थापन हो रहा है। यह सिर्फ एक आदमी का विस्थापन नहीं है। इस तरह के तमाम विस्थापन से सबसे बड़ी मार पड़ती है, समाज के सबसे कमजोर-पिछड़े तबके को। मसलन समाज की कमजोर जातियां, सभी जातियों की महिलाएं और बच्चे इससे अधिक प्रभावित होते हैं। देश में विकास के नाम पर जिस तरह का काम चल रहा है, वह ठीक नहीं है। समाज को विकास का पाठ पढ़ाने की चेष्टा करने वाले क्यों नहीं अपने विकास के माडल में समाज की सहभागिता सुनिश्चित करते। पहले हमने जितना विकास किया, वह समाज की भागीदारी से किया। आज का विकास समाज पर थोपा जा रहा है। इसका कापीराइट किसी और के पास है, इस विकास को पेटेन्ट किसी और ने करा रखा है। विकास का यह माडल समाज का अपना माडल नहीं है।
मुआवजे का क्या करें, उन्हें पता नहीं। प्रसून लतांत, वरिष्ठ पत्रकार, जनसत्ता
 

विकास के नाम पर गरीबों को विस्थापित करने की प्रक्रिया जोरों पर है। लोगों को सार्वजनिक हित के नाम पर हटा दिया जाता है, लेकिन जिन लोगों को हटाया जाता है, उन्हें अपने घर, रोजगार की कीमत पर मिलता क्या है? जिल्लत, भूखमरी, बेरोजगारी ही उनके हिस्से आती है। यदि विकास की कीमत यह है तो कौन चाहेगा विकास? जिनकी जमीन छिन गई उनको मुआवजा दिया जाता है। लेकिन वे उस रकम का क्या करेंगे, कैसे खर्च करेंगे उस रकम को, उन्हें खुद नहीं पता। इसलिए विस्थापन के साथ ही लोगों के रोजगार की पक्की व्यवस्था जरूरी है। यदि विस्थापन शहरी इलाके में है तो रकम ठीक-ठाक सी मिल जाती है। लेकिन, यदि विस्थापन जंगल से या गांव से हो तो रकम इतनी कम होती है कि उसका दिया जाना और न दिया जाना दोनों बराबर हो जाता है। असल में जितना कम विस्थापन हो, उतना अच्छा है। इस बात का विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए कि जिस जमीन से विस्थापन हुआ है, उसका सही इस्तेमाल भी हो। कहीं 'न माया मिली न राम' वाली स्थिति न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि लोगों को घर-द्वार भी छोड़ना पड़े और जमीन का सही तरीके से इस्तेमाल भी न हो।

विस्थापन पर समग्रता से विचार हो। सुभाष गताड़े, वरिष्ठ पत्रकार

जब भी विस्थापन की बात होती है, लोग समझते हैं कि किसी बांध परियोजना से विस्थापन की बात हो रही है। विस्थापन को देखने का यह बेहद संकुचित दृष्टिकोण है। आज के दौर में लाखों-करोड़ों लोग अपना घर छोड़कर पलायन कर गए हैं, एक जगह से दूसरी जगह जाकर उन्होंने अपना घर बना लिया है। इन सभी लोगों को विस्थापितों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। एक सवाल अब खुद से, हम भविष्य का कैसा नक्शा देखते हैं ? 16वीं शताब्दी वाला बिना रेल, बिना बिजली, बिना टेलीफोन का या 21वीं शताब्दी का। आज जंगल में जो आदिवासी रह रहे हैं, उनकी तस्वीर समाज के सामने रूमानी तौर पर पेश की जा रही है। गौरतलब है कि इस तरह की तस्वीर आदिवासी पेश नहीं करते, यह पेश करते हैं वे लोग जो उनके खुद ही खैरख्वाह बन बैठे हैं। आदिवासी वर्ग में जो पढ़ा लिखा तबका है, वह कहता है, यहां दवा नहीं, शिक्षा नहीं, रोजगार नहीं, भविष्य नहीं, फिर क्यों यहां रहना ? वह शहर की तरफ पलायन कर रहा है। आदिवासियों की नुमाइन्दगी करने वाले जो लोग हैं, क्या कभी उन्होंने उन आदिवासियों से पूछा कि उन्हें क्या पसंद है? किंतु मेरी बात से यह न समझा जाए कि मैं विस्थापन और सरकारी नीतियों का समर्थक हूं। मैं मानता हूं कि सबसे पहले विस्थापन की स्थिति से ही बचने का प्रयास होना चाहिए। यदि बहुत जरूरी हो तो न्यूनतम विस्थापन की बात सोची जानी चाहिए। जिनका विस्थापन हो, उनके लिए मुआवजे की समुचित व्यवस्था हो। विकास यदि किसी के विनाश का कारण बने तो उसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।

विस्थापन से केवल जमीन वाले ही प्रभावित नहीं होते।

रमणिका गुप्ता, संपादक, युद्धरत आम आदमी

 

विकास जरूरी है, लेकिन विस्थापितों के विनाश की कीमत पर यह किस काम का ? आज तक सरकार ने प्रभावी पुनर्वास समिति नहीं बनाई। जबकि इस देश में दिन-प्रतिदिन विस्थापितों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। यदि विस्थापितों की वास्तविक संख्या की बात करें तो यह करोड़ से ऊपर होगी। सिर्फ हजारीबाग में कोयला खदानों की वजह से 3 लाख लोग विस्थापित हुए थे। और नौकरी सिर्फ उस परिवार के लोगों को मिली, जिनके पास तीन एकड़ से अधिक जमीन थी। अब तो वह भी नहीं दी जा रही। जब किसी गांव से लोग विस्थापित होते हैं, उस समय सिर्फ जमीन वाले लोग ही प्रभावित नहीं होते, उनके साथ-साथ गांव में दूसरे छोटे-मोटे काम करने वाले भी विस्थापित होते हैं। जैसे मजदूर, बढ़ई, लोहार, परचून वाला, हज्जाम आदि। यह सब भी गांव में ही होते हैं। कितने दुख की बात है कि इनको विस्थापितों में गिना ही नहीं जाता। क्या इनके लिए सोचने का काम सरकार का नहीं है ?

पूरे देश में अनुसूची 06 लागू की जानी चाहिए चतुरानन मिश्र, पूर्व केन्द्रीय मंत्री
 

निश्चित तौर पर विकास बहुत जरूरी है। लेकिन विस्थापितों के शोषण की शर्त पर मिलने वाले विकास की वकालत नहीं की जा सकती। झारखंड के बोकारो, झरिया, हजारीबाग, छोटा नागपुर जैसे इलाकों में सबसे अधिक विस्थापन हुआ। लेकिन राहत मिली सिर्फ 14 में से एक को। शेष लोग दर-दर की ठोकर खाने को विवश हो गए। लेकिन इस संबंध में सारे अनुभव इतने कड़वे भी नहीं हैं। 70 के दशक में गोड्डा कोल माइन्स के लिए जमीन ली गई तो कंपनी ने सूची लेकर सभी विस्थापित परिवारों के लिए मकान बनाकर दिया और आदिवासी लड़कों को प्रशिक्षण दिया। उन आदिवासी लड़कों को रोजगार भी मिला। नगालैंड के आदिवासी बहुल इलाकों में अनुसूची 06 लागू है। मेरा मानना है, इसे भारत के प्रत्येक आदिवासी बहुल जिलों में लागू कर देना चाहिए। वर्तमान में नगालैंड को छोड़कर शेष भारत में अनुसूची 05 लागू है। अनुसूची 06 में इस बात का प्रावधाान है कि 30-32 लोगों की एक स्वतंत्र बाडी होगी, जो जिले के लिए नीतियां बनाने के लिए स्वतंत्र होगी। इस बाडी में स्थानीय आदिवासी समाज के लोग होंगे और कुछ लोग सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होंगे। लेकिन बहुमत स्थानीय लोगों का ही होगा। इस तरह समाज के विकास में समाज की भागीदारी सुनिश्चित होगी। यहां एक बात और बतानी जरूरी है। हम जमीन के विस्थापन को लेकर लगातार केन्द्र सरकार को कोसते हैं, यह गलत है। वास्तव में यह पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार का मामला है।

ईमेल: ashishkumaransu@gmail.com

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