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अक्टूबर, 2007

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स्वानन्द : अपना बाजार

राजीव दीक्षित

       भारत में वैश्वीकरण केनाम पर चल रही अंधाधुंध गुलामी की प्रक्रिया में हर व्यापार और उद्योग क्षेत्र को विदेशी कम्पनियों के लिये खोल दिया गया है। विश्व व्यापार संगठन समझौते की हांगकांग बैठक में भारत सरकार की ओर से खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के लिए अनुमति देने का वायदा कर दिया गया है। गत 4-5 वर्षों से भारत में देशी-विदेशी कम्पनियों के द्वारा कई स्थानों पर बड़े-बडे 'शापिंग माल' बनाये जा रहे हैं। अब भारत में छोटी-छोटी दुकानों के माधयम से जीवन चलाने वाले लगभग 80 लाख दुकानदार परिवारों के सामने एक गंभीर संकट पैदा होने जा रहा है।

 

हिन्द स्वराज अभियान की ओर से गांवों और शहरों के बेरोजगार युवक-युवतियों को दैनिक जीवन में काम आने वाली 100 से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करने का प्रशिक्षण दिया गया है। इनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री में अभियान की ओर से मदद की जाती है। इसके लिए 'स्वानन्द' के नाम से एक ब्रांड भी विकसित किया गया है।

भारत सरकार के ऊपर विदेशी कम्पनियों और विश्व व्यापार संगठन का बहुत अधिक दबाव पड़ रहा है। खुदरा व्यापार के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिए खोलना तय हो चुका है। भारत सरकार ने इस दबाव के सामने अपने को झुका दिया है। तेजी से भारत के खुदरा व्यापार के बाजार में देशी-विदेशी कम्पनियां आ रही हैं। भारत का खुदरा बाजार आज की स्थिति में लगभग 1,00,000 करोड़ रुपये का है। इससे लगभग 4 करोड़ लोगों की जीविका चलती है। इनमें से अधिकांश दुकानदार बहुत ही थोड़ी पूंजी से अपना काम करते हैं। यह पूरा बाजार भारत में बिना किसी विज्ञापनबाजी के चलता है। इस बाजार का स्वभाव एक स्तर तक अनौपचारिक अधिक है। अब इस बाजार में बड़ी कम्पनियों के आने के बाद बहुत बदलाव आएंगे। सबसे पहले तो विज्ञापनबाजी इसमें प्रवेश करेगी। फिर अधिक पूंजी का प्रयोग और उच्च तकनीक भी इस खुदरा बाजार में प्रवेश करेगी। इस क्रम में भारत के साधारण खुदरा व्यापारी मार खाएंगे और पिटते जाएंगे। अन्त में इस खुदरा बाजार से वे धीरे-धीरे बाहर हो जाएंगे। जो बड़े व्यापारी हैं, वे तो शायद इस नये बदलाव में भी टिके रहें। लेकिन, जो छोटे एवं साधारण दुकानदार हैं, उनके लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा! उन्हें धीरे-धीरे इस बाजार से बाहर जाना ही पड़ेगा। इससे और अधिक बेरोजगारी भारत में बढेग़ी। पहले से ही हमारे देश में लगभग 12 करोड़ लोग पूरी तरह से बेरोजगार हैं। साथ ही 20 करोड़ लोग अर्ध बेरोजगार हैं, अर्थात जिन्हें साल के कुछ दिन ही काम मिल पाता है।

खुदरा बाजार में जब विदेशी कम्पनियों का प्रवेश होगा तब सबसे अधिक नुकसान छोटे साधारण व्यापारियों को होगा। दूसरा नुकसान ग्राहकों को होगा। कारण यह है कि विदेशी कम्पनियां थोड़े से मुनाफे या कम मार्जिन पर काम नहीं करती हैं। उन कम्पनियों के मुनाफों का प्रतिशत सैकड़ों और हजारों में होता है। अधिक से अधिक लाभ कमाने के चक्कर में ही ये कम्पनियां कार्य करती हैं। इसी कारण से वस्तुओं को बहुत महंगा करके ही ये कम्पनियां अपना माल बेचती हैं। वस्तुओं के महंगे होने का दुष्परिणाम ग्राहकों को ही भुगतना पड़ता है। भारत सरकार 10-15 वर्षों से लगातार टैक्स बढ़ाती जा रही है। गत 15 वर्षों में सरकार द्वारा 300 प्रतिशत से अधिक टैक्स बढ़ाये गये हैं। टैक्स बढ़ने से भी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ने के दो प्रमुख  कारण हैं- पहला सरकार के द्वारा टैक्स का बढ़ाया जाना। दूसरा कम्पनियों के द्वारा मुनाफे का बढ़ाया जाना।

अब ऐसी स्थिति में विकल्प क्या है? भारत में स्वदेशी एवं भारतीयता के लिए चल रहे एक अभियान 'हिन्द स्वराज अभियान' ने इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश की है। समाधान यह है कि भारत के गांव-गांव या शहरों में बेरोजगार युवक-युवतियों को दैनिक जीवन में काम आने वाली 100 से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करने का प्रशिक्षण देना। उत्पादन के बाद इन वस्तुओं की बिक्री करने में मदद करना। साथ ही साथ भारत में अलग-अलग स्थानों पर बन रही अच्छी गुणवत्ता की स्वदेशी वस्तुओं को भी बाजार में सही कीमतों पर उपलब्ध कराना। लोगों के मन में स्वदेशी की भावना को गौरव के साथ पुन: स्थापित करना। इस कार्य को मूर्त रूप देने के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा, कोटा एवं राजसमन्द में तथा छत्तीसेगढ़ के भिलाई में, महाराष्ट्र के वर्धा में 'स्वानन्द' नाम से 5 केन्द्र खोले गये हैं। आने वाले 3 वर्षों में भारत के 12 राज्यों में ऐसे 400 केन्द्र खोलने की योजना पर काम चल रहा है। इन 'स्वानन्द' केन्द्रों की कई विशेषतायें हैं, जो वर्तमान उदारीकरण और गुलामीकरण से उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती हैं। सबसे पहली विशेषता यह है कि ये सभी स्वानन्द केन्द्र 'न लाभ न हानि' की नीति पर चलते हैं। इन केन्द्रों में मिलने वाले सामान बाजार में अन्य स्थानों पर नहीं मिलते हैं। वे इन स्वानन्द केन्द्रों पर उपलब्ध होते हैं। इन उपलब्ध सामानों में ऊंची गुणवत्ता और स्वास्थ्य रक्षा का पूरा धयान रखा जाता है।

स्वानन्द केन्द्रों में उपलब्ध सभी घरेलू सामान जानवरों की चर्बी व नुकसानदायक रसायनों से मुक्त हैं। यानि, जैन धर्म के अहिंसा सिध्दांत पर 100 प्रतिशत खरा उतरने वाले ये पूअनूठे भण्डार हैं। एक अदद् साबुन का ही उदाहरण लें तो प्रयोगशाला परीक्षणों ने साबित कर दिया है कि स्वानन्द साबुन एक ऐसा साबुन है जिसमें 100 प्रतिशत नारियल तेल है। इसमें सिर्फ वजन बढ़ाने वाले पदार्थ तो मिलाए ही नहीं गए हैं। यह अन्य साबुनों की तुलना में दोगुना चलता है तथा साथ ही इसका प्रयोग करने वालों को तेल व क्रीम अलग से नहीं लगाना पड़ता है।

इसी तरह कपड़े धोने के साबुन में 75 प्रतिशत तेल है। यह हाथ व कपड़े दोनों को फटने से बचाता है तथा यह खारे पानी में भी अच्छे परिणाम देता है। स्वानंद बाजार में उपलब्ध पंचगव्य के मिश्रण से तैयार किए गए शैम्पू को सीबा प्रयोगशाला ने भी प्रमाणित किया है कि यह बाजार के अन्य शैम्पुओं से बेहतर है। राठी गाय के 350 रुपए किलो के शुध्द घी से बनी रसायनमुक्त क्रीम तथा 22 जड़ी बूटियों से बना उबटन किसी भी गोरेपन की क्रीम से बेहतर है। यहां का आंवला केश तेल बालों को लम्बी उम्र तक गिरने से रोकने व सफेद बालों को काला करने में कारगर साबित हुआ है। अनाज सुरक्षा के लिए जहरीले सल्फास व पारे की गोली के हर्बल विकल्प तैयार किए गए हैं। जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग किए बिना स्वानंद की ओर से मच्छररोधी हर्बल क्वाइल बनाई गई है। पौधों, फल व फूलों से प्राप्त प्राकृतिक रंगों से बनी स्वानंद फैशनेबल खादी विविधता की दृष्टि से भी आधुनिक पसन्द की सभी जरूरतें पूरी करने वाली है।

स्वानंद बाजार में खाद्य वस्तुएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। इनके उत्पादन में जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाता है। कीटनाशकों एवं कृत्रिम रसायनों आदि का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता। इस कारण से स्वानंद बाजार में उपलब्ध गेहूं, चावल, दालें, मसालें, हाथ घट्टी का पिसा ज्यादा सात्विक रेशे वाला बेसन, जैविक गन्ने से बना व बिना हाइड्रो सल्फर के साफ किया हुआ गुड़ व शक्कर, जैविक तिल, मूंगफली व बैल घाणी के द्वारा निकाला गया सरसों का तेल, देशी गाय की दही को हाथ से बिलोकर बनाया गया कोलेस्ट्राल मुक्त शुध्द घी लोगों द्वारा खूब पसंद किया जाता है।

विज्ञान व पर्यावरण केन्द्र दिल्ली के वैज्ञानिक परीक्षणों के अनुसार आज औसतन हर भारतीय रोजाना भोजन के साथ स्वीकृत मात्रा से 7218 गुना तक अधिक मात्रा में कीटनाशकों का उपभोग करता है। हाल ही में पेप्सी, कोक जैसे शीतल पेयों में विश्व मानक से 196 गुना तक ज्यादा जहरीले कीटनाशकों की मौजूदगी का भंडाफोड तो जगजाहिर है ही। हालत यह है कि जहरीले रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों से पैदा किए गए अनाज, दालों, मसालों आदि में इनका अंश रहता है, जिन्हें पानी में उबालने पर भी हानिरहित बना पाना संभव नहीं है। यही वजह है कि तमाम चिकित्सकीय उपलब्धियों के बावजूद कम उम्र में हार्ट अटैक, वैंफसर, मधुमेह, रक्तचाप, माइग्रेन, पुंसकता, किडनी रोग, विभिन्न स्त्री रोग, चर्म रोग, दृष्टि रोग, गंजापन, रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी, अल्सर, मानसिक रोग एवं आनुवांशिक रोगों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। 'स्वानन्द-अपना बाजार' की ओर से इन्हीं खतरनाक स्थितियों को महसूस करते हुए स्वस्थ जीवनशैली का यह व्यावहारिक और प्रयोगात्मक अभियान शुरू किया गया है। स्वानन्द बाजार का संदेश है कि राष्ट्रधर्म की पहचान करते हुए वैदिक युग में वापसी। अर्थात मनुष्य मात्र के लिए प्रकृति के साथ समरस होकर चलने वाली स्वस्थ जीवन शैली और उदात्त सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्निर्माण, एक ऐसे समाज का निर्माण जहां हर तरफ सद्भाव का सागर लहराता हो और जहां मुनाफाखोर व्यवस्था की गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं हो।

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