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नवम्बर,  2007

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मकबूल पर फिदा जामिया मिलिया

अरुण देव

      भारत दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जहां बहुसंख्यक समाज की भावनाओं पर चोट करने वाले को सम्मानित किया जाता है, उन्हें सेकुलर कहा जाता है। यह भारत ही है जहां के शासक बहुसंख्यक हिन्दू समाज के आराध्य पर कीचड़ उछालकर भी शासन कर सकते हैं। उन्हें क्षमा मांगने की भी आवश्यकता महसूस नहीं होती। यह भारत में ही हो सकता है जहां जन-जन में समाए श्रीराम के अस्तित्व को नकारने वाले लोग भी रामलीला के मंचों पर धनुष बाण के साथ-साथ वाक्-तीर भी चलाते हैं।  और यह भारत ही है जहां का बहुसंख्यक समाज अपने ऊपर आघात पर आघात होने के बाद भी निश्चित बना रहता है। इसी का लाभ वर्तमान केन्द्र सरकार और कट्टरपंथी तत्व उठा रहे हैं।

 

यह देश का दुर्भाग्य ही है कि जिस व्यक्ति पर देशभर में 9 मुकद्मे चल रहे हों, जिस व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ हो, जिस व्यक्ति की तलाश देश की अनेक अदालतों को हो, उसके सम्मान की घोषणा की जाती है और उस सम्मान समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जैसे दिग्गज पहुंचते हैं।

मई, 2004 में बनी संप्रग सरकार की देखरेख में नवम्बर 2004 में ही शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को जेल भेजा गया। न्यायालय की लताड़ खाने के बाद भी आंध्रप्रदेश में मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया। सच्चर कमेटी के नाम से देश के सामने झूठ का एक पुलिंदा रखा गया। बैंकों को मुसलमानों को प्राथमिकता के आधार पर ऋण देने एवं मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में मुस्लिम अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति का निर्देश देने के बाद इस सरकार ने अपनी देखरेख में हिन्दुओं को ललकारने वाला एक और काम किया है। और वह काम है उस मकबूल फिदा

 

 हुसैन को सम्मानित करना जो अपनी गिरफ्तारी के डर से लन्दन में जा छिपा है। उल्लेखनीय है कि गत 30 अक्तूबर को नई दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करके चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन, फिल्मकार श्याम बेनेगल, स्वर्गवासी कहानीकार कुर्रेतुलेन हैदर और सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान को सम्मानित किया। गिरफ्तारी के डर से मकबूल फिदा हुसैन सम्मान लेने नहीं आया। समारोह में उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।

कहने को तो यह काम दिल्ली की जामिया मिलिया विश्वविद्यालय का है। लेकिन, यहां ध्यान देने वाली बात है कि जामिया मिलिया पूरी तरह सरकारी अनुदान से चलता है। अत: उसके निर्णयों से केन्द्रीय सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती है। अब प्रश्न उठता है कि जामिया मिलिया ने इस समय जबकि मकबूल फिदा हुसैन भारत आने से डरता है, उसे सम्मानित करने का निर्णय क्यों लिया ? भारत आने के बाद भी तो उसे सम्मानित किया जा सकता था। दूसरा सवाल है कि एक भगोड़े व्यक्ति के सम्मान समारोह में उपराष्ट्रपति क्यों पहुंचे ? क्या उन्हें मकबूल की करतूत की जानकारी नहीं है ? यह देश का दुर्भाग्य ही है कि जिस व्यक्ति पर देशभर में 9 मुकद्मे चल रहे हों, जिस व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ हो, जिस व्यक्ति की तलाश देश की अनेक अदालतों को हो, उसके सम्मान की घोषणा की जाती है और उस सम्मान समारोह में हामिद अंसारी जैसे दिग्गज पहुंचते हैं। क्या यह न्यायपालिका की अवमानना नहीं है ? चाहे ये लोग कुछ भी तर्क दें, पर इतना तय है कि हुसैन को सम्मानित सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि उसने हिन्दू देवी-देवताओं के अपमानजनक चित्र बनाकर हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुंचाई है। यदि ऐसा नहीं होता तो हुसैन को कम से कम इस समय तो सम्मानित नहीं किया जाता। वैसे इन दिनों लन्दन में रह रहे हुसैन को भारत में सम्मानित करने की होड़ लगी हुई है। पिछले दिनों केरल की वामपंथी सरकार ने हुसैन को राजा रवि वर्मा पुरस्कार देने की धोषणा की थी, किन्तु न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसे यह पुरस्कार नहीं दिया जा सका। और अब जामिया मिलिया ने न्यायालय के इन आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए मकबूल फिदा हुसैन को पीएच.डी. की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया है।

हुसैन के विरुद्ध सभी 9 मुकदमे हाल के वर्षों में ही दर्ज हुए हैं। उस पर आरोप है कि उसने देवी-देवताओं के अपमानजनक चित्र बनाकर हिन्दुओं की भावनाओं को चोट पहुंचाई है। किन्तु कांग्रेसी, वामपंथी और तथाकथित मानवाधिकारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उसका बचाव कर रहे हैं। यहां यह भी बताना आवश्यक है कि इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा सहिष्णु हिन्दुओं तक ही सीमित है। यदि किसी अन्य धर्मावलंबी की धार्मिक भावना को किसी भी कारण से ठेस पहुंची हो, तो इन्हें बहुत बुरा लगता है।

इस कांग्रेसी और वामपंथी गठजोड़ ने हुसैन के चित्रों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का फल मानकर उन्हें एन.सी.ई.आर.टी. के पाठयक्रम में भी शामिल करवाया है। बच्चों को हुसैन के बारे में पढ़ाया जाएगा कि वे 'बहुत बड़े चित्रकार' हैं। किन्तु जो शिक्षक पुस्तक देखकर हुसैन के बारे में बच्चों को पढ़ाएंगे उन्होंने ही इसका विरोध किया है। नारायणा ( दिल्ली ) में एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक वेद राजपूत ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर कहा है कि वे हुसैन के बारे में बच्चों को नहीं पढ़ा सकते, क्योंकि उन्होंने अपने चित्रों से हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। और उनके खिलाफ अनेक मामले चल रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश एम.के. शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ नवम्बर माह में इस याचिका पर सुनवाई करेगी।

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