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नवम्बर,  2007

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कोयला खदानों से स्याह हुई जिंदगी

झारखण्ड में गोड्डा जिले की ललमटिया कोलियरी के बारे में कहा जा रहा है कि यहां 150 साल तक कोयला प्राप्त होगा। यह कोलियरी लगभग 20 कि.मी. के क्षेत्रफल में पैफली हुई है। 70 के दशक में पहाड़ों के नीचे सुरंग बनाकर यहां कोयला निकालने का काम शुरू हुआ था। किन्तु अब मैदानी भागों से भी कोयला निकाला जा रहा है। इस कोलियरी से लगभग 35 गांव प्रभावित हैं। यहां जमीन के बदले लोगों को नौकरियां दी गई। सभी ग्रामीणों को दूसरी जगह बसने के लिए पैसा दिया गया, भूखण्ड दिए गए।गांव में जिनका जैसा मकान था, उस हिसाब से उन्हें उसकी कीमत दी गई।

किन्तु कई विस्थापित परिवार गांव छोड़ने को तैयार नहीं है। हिजुकिता, तेतरीया, निमाच, सिमड़ा, घोआटांड़ आदि गांवों के ग्रामीण अभी भी कोलियरी के आंगन में जमे हुए हैं। जब किसी क्षेत्र में उत्पादन बाधित होने लगता है तब कोलियरी प्रशासन उस क्षेत्र के गांवों को जबरन दूसरी जगह बसाता है। ऐसे हालात में गांव में जिनके पास लम्बा-चौड़ा मकान था, अब उन्हें छोटे मकान में रहना पड़ता है। उनकी खेती-बारी खत्म हो गई। अपने गांव में बने रहने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। दिन-भर कोलियरी की धूल उड़ती रहती है। वूफओं का पानी गायब है। हर जगह की तरह यहां भी विस्थापन का दंश गरीबों को ही झेलना पड़ रहा है। जिसके पास जमीन थी उसे नौकरी मिल गई, मकान का पैसा मिल गया। किन्तु जिसके पास न तो जमीन थी और न ही अच्छा मकान, वह तो उजड़ कर और गरीब हो गया। गांव में चाहे उसके पास पूफस का ही मकान था, पर था तो। खेत-खलिहान में काम करके वह अपना गुजारा कर लेता था। किन्तु अब गांव से बाहर घर बनाने की क्षमता उसके पास नहीं रही। गांव से उजाड़ने के बदले सरकार ने उसे पैसा तो दिया, पर पैसा किसके पास टिकता है? पैसे का निवेश करना तो उन्होंने कभी सीखा नहीं था। विस्थापन से बचपन का आंगन तो छूटा ही, आज उनके सामने रोजी-रोजगार की भी किल्लत है। -अरुण देव

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