भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

नवम्बर,  2007

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कहानी

पीली धातु

उर्मिला शिरीष

माजशास्त्र में एम.ए.करते हुए समाज के एक बड़े परिदृश्य तथा उसकी संरचना को लेकर उसका मन हमेशा विचार तथा द्वंद्व में फंसा रहता था। लघुशोध लिखते समय उसने इसीलिए समाज की उन पिछड़ी तथा लुप्तप्राय: होती जन-जातियों के बारे में अधययन किया, क्योंकि ये उसके लिए जिज्ञासा तथा कौतूहल के विषय थे। मगर वह जानती है कि वह शोध महज कागजी था। किताबी था। पारिवारिक सीमाओं के कारण वह उन स्थानों पर नहीं जा पाई थी जहां वास्तव में जाकर काम करना चाहिए था। वैसे भी यहां हर काम सतही तौर पर औपचारिकताओं को पूर्ण कर, फायदा उठाने की परंपरा से जुड़ा है। फल प्राप्ति की कामना प्रथम प्राथमिकता होती है। इस बात का मलाल उसके मन को सदैव रहता था। इसीलिए एक लोकल एन.जी.ओ. का विज्ञापन देखते ही उसने वहां ज्वाइन कर लिया था। हालांकि इस तरह की एजेंसी के साथ स्थायी रूप से जुड़ना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगता था। छोटी-छोटी जगहों पर जाकर अनपढ़... अज्ञानी महिलाओं को परिवार नियोजन, शिशु स्वास्थ्य एवं मातृत्व के बारे में समझाना।... घनी आबादी वाली बस्तियों के बीच काम करना वाकई गैर-मजेदार अनुभव ही था, मगर साथी लोगों की मौन निष्ठा और लगन देखकर उसका मन भी धीरे-धीरे इन कामों में लगने लगा था। आखिर इनका जीवन भी तो समाज का अभिन्न अंग है। सुनीता उसे अक्सर ही समझाती थी। वैसे तो उसके तमाम सपने थे... इस तरह के कामों को लेकर। सपनों से जिज्ञासाएं जुड़ी थीं और जिज्ञासाओं से शंका-कुशंकाओं का दिमागी बाजार गरम होने लगता था। जीवन लक्ष्य से ही तो सधता है, चाहे शुरुआत कहीं से भी क्यों न हो और इन सबके पीछे था सिल्विया का साथ... सिल्विया का वो प्रथम मौन परिचय... जहां उसकी आंखें ही बोला करती थीं... पता नहीं क्यों उसे लगता था कि सिल्विया... हर बात को गहराई से देख रही है...।

जब उसे फील्ड पर जाने का अवसर मिला तो वहां का नाम सुनते ही वह बेहद खुश तथा उत्तोजित हो उठी। घर से दूर मुक्त कुछ दिनों के लिए बाहर रहने तथा आउटिंग का सुनहरा मौका मिल रहा था। मां का विरोध भी नौकरी की अनिवार्यता की आड़ में दब गई थी। हां, मां को मनाने में कितनी ऊर्जा तथा तर्कशक्ति खर्च करनी पड़ी थी, क्योंकि वह वन्य क्षेत्रों और वहां के लोगों को पास से देखने का मौका किसी भी सूरत में नहीं छोड़ना चाहती थी। गांव... जंगलों को करीब से उनके पीछे खड़े होकर अनुभूत करने का आकर्षण मन में गहरे तक समाया हुआ था। वहां की बोलियां... वहां के लोकगीत... वहां की वेशभूषा... सब कुछ कल्पना से उतरकर यथार्थ में साकार होने जा रहा था। उसने कैमरा, तीन-चार रीलें, ढेर सारे कपड़े, खाने का सामान भर लिया।

''कितने दिन तक रुकना पड़ेगा।''

''सात-आठ दिन तक। जल्दी भी आ सकती हूं।''

''जंगल में अकेले मत घूमना। अभी भी खूंखार जानवर हैं। लंबे जूते ले जाना। सांप... बिच्छू रहते हैं।''

''मां, मैं कोई जंगल के भीतर नहीं जा रही हूं-वैसे वहां भी तो आखिर इंसान रहते हैं।''

''उनका क्या, वे तो यूं ही बने रहते हैं। कहीं भी। कैसे भी। आदत हो गई है उनकी, क्योंकि वह वहां पैदा हुए हैं।''

''आदत नहीं मां, मजबूरी कहो। जिंदा रहने की मजबूरी।''

''बस करो ! तुम्हारी बहस नहीं सुनना मुझे।''

मां तरह-तरह की बातों से डरा रही थी जैसे वह कोई नादान बच्ची हो।

''फोन कर लिया करना।''

''कहां से करूंगी फोन और मैं अकेली नहीं हूं मां।'' कहकर वह घर से निकल पड़ी। जाने से पहले उसे सिल्विया से मिलना जरूरी लगा, क्योंकि वह उसकी क्लास-फेलो थी और उसी इलाके से आई थी। कितने ही वर्षों तक होस्टल में पढ़ाई करके वह इन दिनों इसी शहर में नौकरी कर रही है।

''वहां अपने किसी व्यक्ति के लिए पत्र लिख दो ताकि हम लोगों को उन लोगों से मिलने-जुलने में परेशानी न आये और हमारा काम भी हो जाये।''

सिल्विया पहले तो उसका चेहरा देखती रही फिर हल्के से मुस्कराकर बोली, पत्र पढ़ेगा कौन   ? क्या फिर से तुमने अपना रिसर्च वर्क शुरू कर दिया है   ?''

''क्या तुम मेरे साथ नहीं चल सकती   ?''

''अकेले जाने में डर लगता है!'' सिल्विया ने हंसकर कहा। उसके श्वेत दांत उसके चेहरे की भंगिमा को आकर्षक बना देते हैं।

''नहीं, यूं तो हमारी टीम है मगर...।''

''तो क्या परेशानी है  ? अच्छी पिकनिक मनेगी जंगलों के बीच। अपना खाना तथा पानी जरूर साथ में ले जाना। वैसे क्या देखना चाहती हो वहां जाकर कि किसके-कितने बच्चे हैं, कि कोई बच्चा और मां क्यों बीमार है, कि... मां को कितना भोजन मिलता है  ? यही समझाओगी न कि माला-डी का सेवन कब और कैसे करना चाहिए  ? माला-डी खिलाकर क्या उनकी संख्या इतनी कम कर देना चाहती हो कि वे मानव संग्रहालयों में नमूने के तौर पर रखे जायें... जानवरों के लुप्त होने पर तो पर्यावरण पर असर पड़ता है। इंसानों की जाति लुप्त होने पर कुछ नहीं होने वाला...।'' हमेशा चुप रहने वाली सिल्विया इन दिनों कुछ ज्यादा ही बात करने लगी थी। रहन-सहन में बदलाव आना तो स्वाभाविक था, मगर बातों में इतनी छटपटाहट... इतनी गइराई... इतना व्यंग्य।

''तो कुछ नहीं बताओगी   ?'' उसने हताश होकर पूछा।

''केसला ब्लाक तक का रास्ता तो तुम्हारा ड्राइवर जानता ही होगा और बाकी चीजें तथा जगहें तुम अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख लोगी।''

''वो तो ठीक है मगर ये तो बताओ कि वहां के लोग कैसे हैं  ? क्या अच्छा लगता है उन्हें, जिससे उन्हें हम लोगों से अपनापन लगे और वे हमारे ऊपर विश्वास कर सकें।''

''विश्वास की अपेक्षा पहले करने लगी तुम उनसे ! क्यों  ? जो मानव-जीवन में अच्छा लगता है वो सब वहां नहीं है। एक अंश तक भी दिखाई नहीं देगा तुम्हें। जब मैं वहां से आई थी तो लगा था कि एक नई दुनिया में आ गई हूं, जहां लाईट थी। पानी था। जहां खाने के लिए रोटियां थीं। भात था।... कितने दिनों तक मेरे मन में दु:ख बना रहा कि यह जो मैं मुफ्त का खा रही हूं-वह मेरे परिवार वालों को देखने तक को नहीं मिलता है।''

वह सिल्विया का करुणार्द्र चेहरा देखती रह गई ! चौड़ी फैली हुई नाक में उसने नग वाली लोंग पहन रखी थी  ! चपटे गालों में काफी भराव आ गया था। कालेज में आदिवासी नृत्य करते समय उसे बेहद करीब से देखा था... तब से उसके प्रति सहानुभूति तथा आत्मीयता की भावना बढ़ गई थी। वरना सिल्विया जैसी लड़कियां सबके बीच में रहकर भी एकदम अलग और एकाकी रहती हैं।

''यहां आकर मुझे बहुत डर लगता था खासकर तुम सब सुसंस्कृत लोगों से... जिस वेशभूषा में हम लोग नृत्य करते थे उसे देखकर सारा हाल तालियों से गूंज उठता था।... वे सारी चीजें वास्तव में क्या वहां की औरतें पहनती हैं  ? नहीं   ! ईश्वर का दिया रंग रूप और एक पाषाण-युगीन दुनिया से बाहर आकर रहना... आत्मविश्वास पैदा होने में वर्षों लग जाते हैं।'' सिल्विया बोलती जा रही थी अविराम...।

''हमारा परिवार केसला ब्लाक का रहने वाला है। पापा बताया करते थे कि बांध बनने पर हमारे सैकड़ों लोग वहां से हटा दिए गए थे। उनकी जमीनें छिन गई थीं। रोजी-रोटी का सहारा न रहा तो उन्हें जंगल के भीतर चले जाना पड़ा। तब मैं कितनी छोटी-सी रही होऊंगीं!'' सिल्वियां के चेहरे पर स्मृतियों का विषाद तथा भोलापन दौड़ गया जैसे वहां से वह कुछ पकड़ना चाहती हो या एक स्थान पर बांध देना चाहती हो लेकिन बहना... ठहरना... फिर बह जाना... उसके रेत जैसे जीवन का सच था।

जब हमारे रिश्तेदार तथा अन्य परिवारों ने जंगल के भीतर रहना शुरू किया तो पता चला कि अब वहां वाईल्ड लाईफ के तहत केंद्र के निर्देश पर वन विभाग अभयारण्य विकसित करने जा रहा है। कई बार मेरा मन करता था कि मैं जाऊं... देखूं... अपनी नानी को... अपने लोगों को... लेकिन...''

''फिर क्या हुआ  ?'' उसने सिल्विया के पतले काले लंबे हाथों को थपथपाकर कहा-''अभयारण्य बनने के बाद वे लोग कहां चले गये  ?''

''कहां जाते  ? जिनके जीवन का कोई मतलब, कोई मूल्य नहीं किसी के लिए, वे कहां जायेंगे  ? वे बहुत उपयोगिता के प्राणी नहीं हैं शायद ! प्रदर्शनी के लिए नस्ल रहनी चाहिए या उनकी वस्तुएं जिन्हें दिखाकर बता सकें कि देखो ये है... महान् सांस्कृतिक विरासत... खैर... दुर्भाग्य उन लोगों के साथ कई रूपों में जुड़ा होता है। बाढ़... हवा... पानी... बेवक्त पैदा हुई बीमारियां ! क्यों जानना चाहती हो बिना मूल्य की यह सब बातें  ?'' सिल्विया ने फिर उसे कुरेदा। क्लास में हमेशा पीछे वाली सीट पर बैठने वाली यह लड़की अपनी जाति व अपने समाज का पूरा इतिहास अपने वक्ष में जलती आग के रूप में दबाये बैठी थी। उसके इतने उग्र तेवर देखकर उसे बेहद आश्चर्य हो रहा था।

''उसी क्षेत्र के पास आर्डनेंस फैक्ट्री है। मुझे याद है अभयारण्य से विस्थापित होकर वे लोग जहां बसे थे उस जगह को आर्मी की फायरिंग रेंज बना दिया गया। घने जंगलों में अपने लिए जगह तलाशते मेरे समाज के लोग एक बार फिर हटा दिए गए अपनी जगहों से। क्योंकि उनके लिए कोई कोर्ट लड़ने वाला नहीं था। शक्तिविहीन... अनाश्रित थे वे। कितने बच्चे पैदा हुए... कितने मर गये, कोई हिसाब नहीं। अब मैं चाहती हूं कि मैं कुछ करूं। मेरा सपना है और जीवन का उद्देश्य भी। भाग्य तो मुझे यहां ले आया, सिस्टर विलियम के सहारे वरना मुझे भी पता न चलता कि जीवन इतना सुंदर और आरामदायक हो सकता है।''

''यही तो मेरा विषय था। तुम साथ में चलती तो मेरा वह काम भी हो जाता।''

''अगली बार जब तुम जाओगी तब मैं जरूर जाऊंगी... पर वहां जाकर हो सके तो नानी से जरूर मिलना।'' कहकर उसने अपनी नानी का नाम लिखकर दे दिया।

जब वह अपने कमरे से बाहर निकली तो तेज धूप उसके सिर पर थी। आज ही उन लोगों को निकलना था। जीप से जब उनकी टीम केसला ब्लाक के मुख्यालय पहुंची तो रात के आठ बज चुके थे।
बीहड़... कच्चे पथरीले रास्तों और घने वृक्षों से सघन होती छायाओं के बीच का वो भयावह रास्ता मन को थर्रा देने वाला था। दूर-दूर तक इंसानों का पता न था। पूरा इलाका ही पेड़ों की उच्छवासों से सहमा हुआ लग रहा था। सनसनाती हुई बलशाली शाखाओं ने अजीब-सी दहशत उसकी नसों में उतार दी थी। किताबी अधययन या बहुत अच्छी रिपोर्ट्स बना देना और बात है... मगर जो तकलीफें स्वयं भोगते हैं उनको महसूस करके दूर करना सपने जैसा लगता है। इस स्वप्न-कथा की शुरुआत उसके जीवन में... सिल्विया ने की थी। कितना दर्द था उसकी बात में- ''अभी तो मैं बाहर निकल पाई हूं। उनको यहां तक आने में पता नहीं कितनी शताब्दियां लग जाएंगी  ?'' सिल्विया की वह बात उसकी चेतना पर निरंतर प्रहार कर रही थी। न जाने क्यों वह बेहद तल्ख अंदाज में बात कर रही थी  ? क्या वो अपना वर्षों का जमा फ्रस्टेशन निकाल रही थी या अपनी अथाह पीड़ा... या व्यवस्था तंत्र एवं विकास के ढकोसलों के प्रति ये उसका विद्रोह था। एन.जी.ओ. के नाम से वह चिढ़ क्यों गई थी। क्या उसे यह सब नापसंद था... या कोई कटुस्मृति इसकी तह में दबी हुई थी... आखिर वह नाराज क्यों थी  ? उसका मन इन बातों के चक्र से नहीं निकल पा रहा था।

''आइए साहब!'' जीप से उतरते ही एक युवक उन लोगों के सामने आकर टार्च से रास्ता दिखाता हुआ एक मकान की तरफ ले गया।

''यहां आप लोगों के ठहरने की व्यवस्था है।'' उस हालनुमा कमरे का ताला खोलकर उसने लाइट जलाई तो पता चला कि चालीस पावर का बल्ब दीए के समान रोशनी दे रहा था। उसने महसूस किया कि इस रोशनी में भी एक तरह की वीरानी तथा उदासीनता की छाया फैली हुई है। युवक ने तख्त पर रखे कपड़ों को झड़काया और... कोने में खड़ी चारपाइयों को बिछा दिया। झीने उदास अंधेरे में धूल का रंग तो दिखाई नहीं दे रहा था मगर उसकी गंध फैंफड़ों में उतर गई थी।

''खाना-पीना।'' युवक ने रटे-रटाये शब्द दोहराये जबकि उसके चेहरे से साफ झलक रहा था कि इन दोनों चीजों की व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है। उसने जूते उतारे और पांव पसारकर तख्त पर बैठ गई। ढेर सारे मच्छर एक साथ भिनभिनाने लगे और काकरोचों का झुंड इधर-उधर बिखरकर अदृश्य हो गया। आंखों... होठों तथा दांतों पर चिपकी धूल के कारण किसकिसाटह हो रही थी। आंखें जल रही थीं। खांसते-खांसते उसका बुरा हाल होने लगा।

''खाना खाया जाये।'' सुनीता ने कहा।

''मेरे तो भीतर तक धूल जम गई है। मुझे एलर्जी है। आल आउट लगाने के लिए प्लग तो है नहीं, कछुआ-अगरबत्ती ही लगा लेते हैं, वर्ना बीमार पड़ जाएंगे।''

''पहले हाथ-मुंह धो लीजिए।''

''बैठे-बैठे और दचकों से पीठ अकड़ गई।'' उसने गुलाब जल मिले पानी से आंखों पर छींटे मारते हुए कहा।

''चाय बची है क्या थर्मस में  ?''

''नहीं, उससे पूछो।''

''क्या  ?''

''सुबह मिलेगी या नहीं  ?''

''उबला पानी मिल जाये तो भी चलेगा।'' उसे सब कुछ घूमता और तैरता हुआ लग रहा था। क्या सोचा था और क्या निकला  ? अजीब-सी ऊब तथा निराशा उसके मन पर छाने लगी।

''बंद करके सोना और वो अगरबत्ती जरूर जला लेना।''

वह युवक सुझाव देकर चला गया। उसने दौड़कर दरवाजा बंद किया और दुखते-अकड़ते पांवों को दबाकर बैठ गई। उसे लग रहा था जैसे कमरे की दीवारें तथा छत मूक राक्षस की तरह उस पर झुके आ रहे हैं। जगह-जगह से पपड़ी झड़ रही थी। दीवार के बीच गहरी चौड़ी दरार में कोई कीड़ा या पक्षी सरसरा रहा था। निस्तब्धता तथा सिहरन बढ़ा देने वाला गाढ़ा अंधकार कीड़े-मकोड़ों की ध्वनियों को समेटे खर्राटे लेता हुआ लग रहा था।

''डर लग रहा है  ? मुझे तो नींद ही नहीं आ रही है। पता नहीं इतने दिन कैसे कटेंगे  ?''

''वाकमैन निकालते हैं।''

''सिल्विया साथ में आती तो कितना अच्छा होता।'' उसने उसांस लेकर कहा।

''क्या उसका घर यहां पर है  ?''

''उसकी नानी और समाज के लोग यहां पर हैं।''

''क्या वो यहां पर पैदा हुई थी  ?''

''क्यों ! क्या आश्चर्य वाली बात है  ?''

''सुबह से अपना काम शुरू कर देंगे।'' कहकर सुनीता करवट बदलकर सो गई।

वह मन ही मन सोचने लगी कि सिल्विया को ऐसा क्यों लग रहा था कि हम लोग यह सब करके उन लोगों की गरीबी का मजाक बना रहे हैं... मैं अपना काम करके... क्या उनका कुछ अहित कर रही हूं... क्या वो आहत हो गई है  ?... बुरी तरह थकी होने के बावजूद भी उसकी आंखों में नींद न थी। डर और विस्मय में डूबी रात्रि धीरे-धीरे खिसक रही थी। उसका मायावी रहस्यमय रूप कमरे में बार-बार प्रकट हो जाता। कभी लगता कोई झांक रहा है तो कभी लगता कोई पीछे चल रहा है। तो कभी लगता अतल गहराईयों में से किसी जानवर की आवाज दिल में धसकती जाती, तो कभी लगता बड़ा-सा सांप सरक रहा है। सिल्विया सच ही कर रही थी कि अंधकार और प्रकाश में जितना फर्क होता है, उसकी अमूर्त्तता जितनी जीवंत और विराट होती है, उतना ही अंतर यहां और वहां के जीवन में है। क्यों नहीं कोई चीज बदलती है और बदलती भी है तो कितने वर्षों में ! सोचते-सोचते पता नहीं कब उसकी आंख लग गई। जब उसकी नींद टूटी तो देखा पूरा कमरा हल्की-सी उजास से भर गया है। कछुआ-अगरबत्ती की राख शेष है तथा दरवाजा खटखटाने की आवाज निरंतर आ रही है।

''इतनी गहरी नींद में थे आप लोग।'' बाहर खड़े फील्ड असिस्टेंट संजय ने कहा।

''हम लोगों को टेंशन हो गया था कि आखिर हो क्या गया  ? कहीं आप लोग... डर के मारे बेहोश तो नहीं हो गये, यही चिंता हो रही थी... ! आप लोगों को नींद आई  ?''

''मुझे तो होश ही नहीं रहा।''

उसने देखा कि रातवाला युवक केतली में चाय तथा खाली गिलास लेकर खड़ा है। मगर उन लोगों ने डिस्पोजेबल गिलास पहले ही निकालकर रख लिए थे।

''कितने बजे निकलना है  ? क्या गोंड-कोरकू जाति की बस्ती वही है  ?''

''नाश्ता वगैरह लेकर चलते हैं।''

वे लोग धूल भरी कच्ची पगडंडियों पर लंबे-लबे पेड़ों से होते हुए दूर जंगल के भीतर प्रवेश करते जा रहे थे, जहां विस्थापितों के दो-ढाई सौ परिवार छोटे-छोटे समूहों में दस-बारह किलोमीटर के क्षेत्र में बिखरे हुए थे। कच्ची मिट्टी के मकान व झोपड़ियां, जिनकी छतें घास व पत्तों की बनी हुई थीं, उनके लिए सर्दी-धूप, गरमी व ठंड से बचाव के लिए बस वही थीं।

उन लोगों को देखकर तमाम बच्चे शोर मचाते हुए जीप को घेरकर खड़े हो गये। एक दूसरी ही दुनिया उसके सामने थी। दूसरी नस्ल के से लगते गहरे काले रंग के दुबले-पतले बच्चे जो निहायत ही कमजोर व बीमार लग रहे थे। उन्हें देखकर डार्विन का विकासवाद का सिध्दांत अक्षरश: सत्य नजर आ रहा था। गले के बाहर निकली हड्डियां, बालों के बंधे गुच्छे, बहती नाक, पीले रंग की आंखें, बदन पर नाम मात्र के फटे वस्त्र, फिर भी कितने मासूम और जिज्ञासु बच्चे। उसे याद आया, सिल्विया बता रही थी कि जब वो मिशन स्कूल के होस्टल में रहती थी तो वहां भोजन में मिलने वाले चावल को बचाकर और बाद में सुखाकर रख लेती थी। जब उसकी वार्डन ने पूछा कि इन चावलों का क्या करोगी तो उसने बताया था कि वह इस भात को अपने भाई-बहिनों को देगी। तब उसने सिल्विया की बात को कितने हल्के ढंग से लिया था, बल्कि उसके चोर होने की बात तक सोच ली थी... मगर इस समय इन बच्चों को देखकर सिल्विया की उस हृदयावस्था को महसूस कर रही थी और कहीं न कहीं आत्मग्लानि का भाव भी उसे कचोट रहा था। संकोच, शर्म तथा कौतूहल में डूबी औरतों से बात करना एकदम असंभव लग रहा था। निकले हुए पेट... लटकते हुए स्तन... पीछे भागते बच्चे गोदी में मुंह छुपाये... नन्हें बच्चों को लादे हुए देखकर उसका मन द्रवित हो उठा। सिल्विया जब क्लास में आती थी तो उसे छूने में डर लगता था और घिन लगती थी कि पास से निकलेंगे तो बदबू आयेगी। उसने स्वयं को स्मृतिलोक से बाहर निकाला और अपना कार्य शुरू करने के लिए कागज तथा पेन लेकर प्रश्नों के कटघरे में उन मासूमों को घेरना आरंभ कर दिया।

''यहां स्कूल, अस्पताल नहीं है  ?''

''नहीं।''

''क्या काम करते हो  ? भोजन में क्या-क्या लेते हो  ?''

''जंगली कंद-मूल। कोदो-कुटकी का पेय व महुआ पीते हैं। इसी से भूख मिटती है।''

''क्यों  ? और कुछ नहीं मिलता क्या  ?''

''पहले जंगल हमारे थे। शहद हमारी थी। लकड़ी... और गोंद हमारी थी। चारबीजी ( चिरौंजी ) महुआ हमारा था। अब तो हमारे हाथ में कुछ भी नहीं रह गया। सब जंगल विभाग वाले आकर छीन लेते हैं। जैसे-तैसे जंगल से इन सबको इकट्ठा भी करते हैं तो सोसायटी वाले आधे-अधूरे पैसों में ले लेते हैं साहब।'' उनकी आवाज में गहरी मनोव्यथा थी। सारा जीवन रेगिस्तान के समान पड़ा था। पता नहीं कब कौन आकर इन्हें इंसानों का जीवन देगा।

''तरक्की के नाम पर सब छीन लिया इनसे। पचास वर्षों में अरबों रुपये खर्च करके यही विकास हुआ है  ?'' इस बार संजय ने व्यंग्य से कहा।

''फिर क्या होगा  ?'' सुनकर वह चिंता तथा निराशा में डूब गई। जिसके पास कुछ भी नहीं है वो पोषक तत्वों वाला संतुलित भोजन और मातृत्व क्या समझेंगे  ? सारे शब्द उसे चिढ़ाते हुए लग रहे थे। सिल्विया की नाराजगी कहीं इसीलिए तो नहीं थी कि...

''क्या शहर में आकर मेहनत-मजदूरी नहीं कर सकते तुम लोग  ?''

''नहीं साहब, नहीं। यहां तो जंगल हमारी स्त्रियों की लाज ढक लेता है। वहां सड़कों पर कौन ढकेगा  ?''

हर रोज एक नयी कहानी, एक नयी घटना और नयी स्थिति से साक्षात्कार हो रहा था। इस बहाने कई आदिवासी महिलाओं से बातचीत हो गई थी। टूटी-फूटी भाषा में उनके रीति-रिवाज... जादू-टोना... पूजा... तथा तमाम चीजों की अमूल्य जानकारी भी उसे प्राप्त हो गई थी। यद्यपि मुख्य काम जो था डाटा कलेक्शन तथा रिपोर्ट तैयार करने का वह भी लगभग पूर्ण हो चुका था। मगर उसे मालूम था कि यह सब तो महज कागजों पर रह जायेगा। आफीसर एक निगाह डालकर आगे की टेबल पर खिसका देंगे और यहां इन बदनसीबों का जीवन इसी तरह बहता
रहेगा...। उम्र के पड़ावों पर... ! इन जीती-जागती मानव देहों का क्या होगा जो सभ्यता से दूर... जर्जर कृषकाय सूनी आंखों और हड्डियों को लिए पशुओं की तरह जीते-मरते रहेंगे। ऊ... उसका मन छटपटा उठा। नसें तनने लगीं... सुनीता कहती है कि वह जरूरत से ज्यादा सोचती है। उसका काम सुधार करना या निष्कर्ष निकालना नहीं है, सौंपी गई डयूटी को पूर्ण करना है... मगर वह क्या करे... दिमाग में आने वाली बातों को तो नहीं रोका जा सकता है।

उस दिन वापिस जाना था। सिल्विया की बूढ़ी नानी, जिसे आंखों से दिखाई नहीं देता था, उससे वह दो बार मिल चुकी थी। उसने मन ही मन सोच लिया था कि अगर किसी फैक्ट्री में जम गया तो उसके मामा को काम पर लगवा देगी। टोप्पो को इन लोगों के साथ मुख्यालय वापिस आना था लेकिन वह अभी तक नहीं पहुंचा था।

''क्या हम लोग चलें  ?''

''उसको साथ में लेकर ही चलेंगे।'' संजय ने अपना टेपरिकार्डर खोल रखा था। काम समाप्त होने तथा लौटने का उत्साह भी था। तीन घंटे के लंबे तथा ऊबाऊ इंतजार के बाद टोप्पो दौड़ा-दौड़ा बदहवास,