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चावल निर्यात पर सरकार
की किरकिरी
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विद्यानंद
आचार्य |
भारत के चावल उत्पादक किसान एवं चावल को निर्यात
करने वाले व्यापारी एक बार फिर सरकार की गलत नीतियों
एवं असामयिक निर्णयों की चपेट में आ गए।
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अक्टूबर को संप्रग सरकार ने तुगलगी फरमान जारी करके
गैर बासमती चावल की कई किस्मों के निर्यात पर
प्रतिबंध लगा दिया। गैर बासमती चावल में प्रमुख रूप
से पूसा-1121
तथा शरबती आदि आते हैं। पूसा-1121
धान की कीमत प्रतिबंध लगने के एक सप्ताह के भीतर ही
150
रुपये प्रति क्विंटल तक नीचे गिर गयी। हरियाणा की
मंडियों में पूसा-1121
की कीमत
2040
रुपये से लुढ़क कर
1900
रुपये प्रति क्विंटल हो गयी। चूंकि इन प्रजातियों की
अगेती किस्म उत्तर भारत में उत्पादित होती है।
इसलिए यहां के किसान सरकार के इस निर्णय से सर्वाधिक
प्रभावित हुए।
ज्ञातव्य हो कि पश्चिमी देशों को निर्यात किया जाने
वाला बासमती भारत एवं उसके पड़ोसी देशों में भी
उपजाया जाता है। इसकी गुणवत्ता
को लेकर बहस एवं विरोध होता आया है। गैर बासमती की
पूसा-1121
की किस्म गुणवत्ता
की दृष्टि से बासमती के समकक्ष है। और इसलिए इसे
अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।
1100 से 1200
डालर प्रति टन की दर से बिकने
वाला यह गैर बासमती चावल बासमती की कुछ किस्मों से
भी अच्छी कमाई कर लेता है। उत्तरी भारत के राज्यों
एवं दक्षिण के एक-दो राज्यों में इसकी उत्पादकता भी
काफी अच्छी है। पूसा-1121
प्रति एकड़ 19 से
20 क्विंटल की उपज देता है।
गैर बासमती चावल की इन खास किस्मों के निर्यात पर
अचानक लगाये गये प्रतिबंध के कारण हरियाणा की अनाज
मंडियों में सबसे अधिक असर पड़ा। बाजार में धान की
खरीद बंद हो गयी। जींद,
सफीदो,
निरवाणा,
पिल्लुखेड़ा और जुलाना जैसी
मंडियों में मातमी सन्नाटा छा गया। मंडियों में काम
करने वाले मजदूर बेकार हो गए। सरकार के इस निर्णय से
किसान, व्यापारी एवं
मजदूर सभी परेशान हो उठे। उनका आक्रोश धीरे-धीरे
उग्र रूप लेने लगा। प्रतिबंध के दूसरे दिन ही
हरियाणा के पिल्लुखेड़ा में किसानों ने ट्रेन को दो
घंटे तक रोके रखा और संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी
एवं प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के पुतले फूंके।
किसानों ने धमकी दी कि यदि प्रतिबंध का निर्णय वापस
नहीं लिया गया तो आंदोलन को तेज किया जाएगा।
शुरुआती दिनों में सरकार ने किसानों की मांग पर ध्यान
नहीं दिया। इस कारण बड़ी तेजी से किसानों का आंदोलन
पूरे देश में फैलने लगा।
24 अक्टूबर को हरियाणा के
किसानों ने लोक स्वराज अभियान की अगुवाई कर रहे रमेश
डागर के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना
दिया। स्वदेशी जागरण मंच और राष्ट्रीय स्वाभिमान
आंदोलन जैसे कई अन्य जन संगठनों ने भी उनका साथ
दिया। इस अवसर पर रमेश डागर ने कहा कि यह सरकार जो
खुद को मुक्त व्यापार का समर्थक कहती है,
अपने ही किसानों को लाभकारी
मूल्य मिलने से क्यों परेशान हो रही है। उन्होंने
आरोप लगाया कि कृषि मंत्री एवं नौकरशाहों के बौध्दिक
दिवालियेपन के कारण देश के किसान आत्महत्या करने के
लिए विवश हैं। पहले नकदी फसलों के किसान बाजार में
कम कीमत मिलने के कारण आत्महत्या करते थे। अब चावल
और गेहूं जैसी फसलों के उत्पादक किसानों को भी
आत्महत्या करने के लिए बाध्य किया जा रहा है। श्री
डागर ने सीधे-सीधे कहा कि सरकार किसानों के हितों की
बलि चढ़ाकर भी खाद्य पदार्थों की कीमत कम रखना चाहती
है, क्योंकि वह
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सस्ते मजदूरों की
आपूर्ति को सुनिश्चित करना चाहती है।
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"जब देश को गेहूं की जरूरत नहीं होती तो दोगुने
से अधिक मूल्य पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों
से जानवरों के खाने लायक गेहूं का आयात कर लिया
जाता है। और जब चावल निर्यात पर प्रतिबंध की
जरूरत नहीं होती तो चावल निर्यात पर प्रतिबंध
लगा दिया जाता है।" |
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जब केन्द्र सरकार ने देखा कि उसके निर्णय का किसानों
द्वारा विरोध बढ़ता ही जा रहा है तो अंतत:
25 अक्टूबर को उसने अच्छी किस्म
के गैर-बासमती चावल के निर्यात से प्रतिबंध हटा
लिया। इस प्रकार सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध
15 दिन से अधिक नहीं चल
सका। सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी
ने सरकार के निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि
425 डालर प्रति टन से
अधिक दाम वाले अच्छी किस्म के चावल के निर्यात पर से
प्रतिबंध हटा लिया गया है। जबकि इससे कम दाम वाले
चावल पर लगा प्रतिबंध जारी रहेगा। श्री दासमुंशी ने
बताया कि कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केन्द्र
सरकार से मिलकर कहा था कि अच्छी किस्म के गैर बासमती
चावल के निर्यात से सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर कोई
असर नहीं पड़ता है, बल्कि
प्रतिबंध लगने से पाकिस्तान आदि देशों को फायदा
मिलता है। उन्होंने कहा कि किसानों को शिकायत है कि
प्रतिबंध लगने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी
किस्म के गैर बासमती चावल पर पाकिस्तान आदि देश
कब्जा कर रहे हैं। इसलिए प्रतिबंध हटा दिया गया है,
ताकि भारतीय किसान भी अपने
उत्पाद का लाभकारी मूल्य प्राप्त कर सकें और
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के प्रतिद्वंद्वी देश
प्रतिबंध का लाभ न उठा सकें।
यद्यपि सरकार ने अच्छी किस्म के गैर बासमती चावल के
निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध हटा लिया है,
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से सरकार
की नीयत को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। खाद्य
सुरक्षा के नाम पर सरकार किसानों की ही बलि क्यों
चढ़ाती है ? क्यों सरकार
कभी अनावश्यक आयात करके तो कभी निर्यात पर प्रतिबंध
लगाकर किसानों को लाभकारी मूल्य प्राप्त करने से
रोकती है ? यदि देश में
सभी वस्तुओं का मूल्य बढ़ रहा है,
चारो ओर महंगाई बढ़ रही है,
तो ऐसी स्थिति में किसानों
द्वारा उत्पादित अनाज को कृत्रिम तरीके से क्यों
सस्ता रखा जा रहा है,
इसका जवाब सरकार के पास नहीं है।
निर्यात पर प्रतिबंध के फैसले का किसानों ने ही नहीं,
कृषि विशेषज्ञों ने भी विरोध
किया। इस बारे में डा. देवेन्द्र शर्मा ने कहा कि
कृषि मंत्रालय ने जो पुर्वानुमान लगाया था,
उसके अनुसार इस बार किसानों ने
गैर बासमती चावल के पूसा-1121
किस्म की खेती आधे से अधिक रकबे
में की है। इसके बाद गैर-बासमती चावल के सीएसआर-30
किस्म का नंबर है,
जिसे लगभग 25
प्रतिशत हिस्से में बोया गया है।
इस प्रकार केवल 25
प्रतिशत हिस्से पर ही बासमती धान की खेती हो रही है।
ऐसे में सरकार द्वारा केवल बासमती के निर्यात को ही
मान्यता देने के पीछे कोई कारण समझ में नहीं आता। यह
स्थिति हास्यास्पद है। इससे पता चलता है कि सरकार ने
यह
निर्णय
पश्चिमी देशों,
बहुराट्रीय कंपनियों एवं देश के
ही बड़े-बड़े बासमती निर्यातकों के दबाव में लिया था।
श्री देवेन्द्र शर्मा ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा
कि जब देश को गेहूं की जरूरत नहीं होती तो दोगुने से
अधिक मूल्य पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से
घटिया गेहूं का आयात किया जाता है। और जब चावल
निर्यात पर प्रतिबंध की जरूरत नहीं होती तो इस पर
प्रतिबंध लगा दिया जाता है। चाहिए तो यह कि सरकार
बढ़ते लागत मूल्य से किसानों को बचाने के लिए उनकी
सहायता करे, लेकिन यहां
तो उल्टे सरकार किसानों को आर्थिक रूप से विकलांग
बनाकर उन्हें आत्महत्या के लिए विवश कर रही है।
प्रश्न उठता है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश
में सरकार किसानों को पंगु बनाकर कैसे खाद्य सुरक्षा
लाना चाहती है ?
(लेखक
स्वदेशी पत्रिका के संपादक हैं) |