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अक्टूबर, 2007

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चलती चक्की देख के

मात्र रंग बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती

डा. सीतेश आलोक

   देश की सरकार अभी भी जलते तवे पर बैठी है... सांप छछूंदर वाली गति में। जलते तवे को छोड़ने का उसमें साहस नहीं है, क्योंकि इससे आम चुनाव का खतरा उत्पन्न हो जाता है। लेकिन तवे पर बैठे रहना भी कम कष्टकारक नहीं है, क्योंकि इसके नीचे की लाल अंगार जब-तब दहकती रहती है।

आश्चर्य है कि जिस वामपक्ष को, परोक्ष रूप में ही सही, सरकार की सरगना ने 'देश का शत्रु' घोषित किया था, उसका दामन छोड़ना सरकार को गवारा नहीं है। सरकार अपनी ओर से समझा-समझा कर हार चुकी है, लेकिन 'लाल दरबार' उसकी बात सुनने-समझने को तैयार नहीं है। हरदम बस यही रट कि अमेरिका से कोई सम्बन्ध उसे स्वीकार नहीं। अमेरिका मरते समय उसे दवा देने भी आये तो वह विरोध ही करेगा। स्थिति कुछ वैसी ही है जैसी कांग्रेस की भाजपा के प्रति। बरसों पहले, जब अधिक वर्षा या सूखा पड़ने की स्थिति में खेती को खतरा उत्पन्न हो जाता था तो इंदिरा गांधी कहती थीं कि इसमें संघ या जन संघ का कोई हाथ है।परमाणु करार को लगभग निरस्त करा के भी वामपंथी अड़े हैं और वे अब सरकार की नाक रगड़वाने की योजना बना रहे हैं। अब उन्होंने सरकार से परमाणु करार पर लिखित बयान मांगने का बीड़ा उठाया है।

पिछले महीने क्रिकेट का दीवाना देश कभी रोता रहा तो कभी दम साधे बैठा रहा। लेकिन, 50 ओवरों के एक-दिवसीय मैचों में आस्ट्रेलिया से बुरी तरह पिटने के बाद जब भारतीय टीम ने बीस-बीस में विजय पायी तो सबने सन्तोष की सांस ली।

क्रिकेट की यह दीवानगी, एक ऐसी  पीढ़ी का पोषण कर रही है जो क्रिकेट को अपना मजहब और किसी खिलाड़ी को अपना खुदा मानती है। जाहिर है कि समय-समय पर उसके खुदा बदलते रहते हैं। कुछ प्रेम-दीवानियों को, इस बहाने, 'मुझसे शादी कर लो' की तख्तियां दिखाकर आत्म-विज्ञप्ति का अवसर भी मिल जाता है। जनता ही नहीं सरकार भी क्रिकेट प्रेम के चलते अन्य खेलों को भूल गयी है। पिछले दिनों हाकी में देश ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुन: पाई है। और फिर शतरंज है जो वास्तव में बुद्धि का खेल है। उसमें भारत के ही विश्वनाथन आनंद ने देश को संसार में सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्रदान किया है। लेकिन उसे कोई पूछ नहीं रहा। बात यह है कि शतरंज समझने में कुछ बुद्धि लगानी होती है... और दूसरी ओर चौका लगा तो चार का अंक दिखाकर कूद लिए और छक्का लगा तो छ: का अंक दिखाकर नाच लिए। इस सबमें दिमाग की क्या जरूरत। आगे जीवन में कुछ नहीं कर पाए तो लाल दरबार में पहुंच कर रोएंगे। उसने सबको काम दिलाने की गारंटी तो दे ही रखी है।

इधर आए दिन, ब्लू लाइन के चर्चे होते रहे... किलर लाइन ने आज इतने मारे, आज इतने की जान ली, सरकार सो रही है... ब्लू लाइन पर शिकंजा क्यों नहीं कसते? मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए... आदि, आदि।

कुछ लोगों को याद होगा, पहले दिल्ली में रेड लाइन बसें थीं। उनसे मरने वालों की संख्या जब बढ़ने लगी तो लोगों ने उसे किलर लाइन का नाम दे दिया। लोगों में रोष बढ़ता रहा। सरकार पर विकल्प ढूंढने के लिए दबाव बढ़ता गया। शीघ्र ही लाल रंगों वाली बसों का रंग बदल कर नीला कर दिया गया। रेड लाइन, ब्लू लाइन बन गई। लेकिन इस प्रकार तो दुर्घटनाओं का सिलसिला बंद नहीं होने वाला था।

परमाणु करार को लगभग निरस्त करा के भी वामपंथी अड़े हैं और वे अब सरकार की नाक रगड़वाने की योजना बना रहे हैं। अब उन्होंने सरकार से परमाणु करार पर लिखित बयान मांगने का बीड़ा उठाया है।

आवश्यकता यह समझने और पहचानने की है कि दिल्ली में जब तक जनसंख्या अधिक है और निरन्तर बढ़ रही है तो बसें भी बढ़ेंगी और बढ़ती रहेंगी... लेकिन अतिरिक्त बसों के लिए सड़कें नहीं बढ़ाई जा सकतीं, नए ड्राइवर सहसा नहीं उत्पन्न किए जा सकते। और जहां पूरे देश में अनुशासन हीनता बढ़ रही है, वहां केवल बस चालकों से अनुशासन की आशा कैसे की जा सकती है? जनता का रोष तो केवल बसों का रंग बदल कर उन्हें नया नाम ही दे सकता है। अब जब टैक्सियां भी निर्दोषों को रौंदने लगी हैं, तो इसका क्या करेंगे। समझने की बात यह है कि मात्र रंग बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। इससे कोई सुधार नहीं होता।

पाकिस्तान में भी आत्मघाती हमले बढ़ रहे हैं। बेनजीर के काफिले पर हमले में 139 जानें गईं। अब तो कुछ अध्ययन भी पाकिस्तान को सर्वाधिक आतंकवादी देश बता चुके हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। यह तो होना ही था। पाकिस्तान ने ही आतंकवाद के भस्मासुर को उत्पन्न किया था। अब यह भस्मासुर अपने जनक को नष्ट करने पर आमादा है। इस समय पाकिस्तान को ही नहीं, सभी इस्लामी देशों को यह गंभीरतापूर्वक सोचना होगा कि उनकी मूल सोच में ऐसा क्या है जो हिंसा को जन्म देता है।

पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे पता चलता है कि अपने देश में, अपनी संस्कृति से भटकती नयी पीढ़ी न जाने कहां जा रही है। सुना, दो नौजवान लड़कों ने देवी को प्रसन्न करने के लिए, गला रेतकर आत्महत्या कर ली। हजारों नौजवानों की तरह, एक युवक प्रेमिका का साथ पाने की ललक में वाहन चोर बन गया। दुख की बात यह है कि ऐसी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है जो उन्हीं लड़कों का साथ चाहती हैं जो उन्हें बाइक या कार पर घुमाएं, जो उन्हें कीमती तोहफे दें और बड़े रेस्त्रां में ले जाएं...। इस सबके लिए पैसे कहां से आते हैं, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं।

याद आता है कि एक बार मैंने एक कर्मचारी को रिश्वत न लेने की सलाह दी तो वह पलटकर बोला, ''क्या बात  करते हैं साब! जिस दिन ऊपर की कमाई न ले जा, बीवी घर में नहीं घुसने देती।'' और हमारे देश की न्याय व्यवस्था! सुभान अल्लाह... एक सिपाही ने एक तिपहिये वाले का ढाई हजार रुपये का चालान किया। और छोड़ने के लिए 2000 रुपऐ रिश्वत मांगी। तिपहिए वाले ने बहाने से उसकी रिश्वत की मांग अपने मोबाइल पर रिकार्ड कर ली। कोर्ट में जब उसने वह रिकार्डिंग दिखाई तो उससे जांच के लिए रुकने को कहा गया। उसके लिए वहां रुकने का मतलब था अपनी दैनिक आय का नुकसान। उसे चालान के ढाई हजार चुका कर लौट आना ही हितकर लगा। यह एक उदाहरण है कि किस प्रकार अक्षम न्याय प्रणाली किसी शरीफ आदमी को दोहरा दंड देती है। तिपहिए वाले को एक ओर तो अधिक पैसे खर्च करने पड़े, दूसरी ओर पुलिस वाले भी उसके दुश्मन बन गए। आगे किसी न किसी बहाने उसे सताया जाता रहेगा। उसकी मदद के लिए कोई नहीं आगे आएगा।

ईमेल: siteshalok@hotmail.com

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