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अगर
कोई भाषा दुरूह न हो गई हो,
उसमें लिखा साहित्य आसानी से
समझ में आने लायक न हो तो क्या उस भाषा और उसके
साहित्य को समझने-समझाने के लिए विशेष प्रयास
करना पड़ता है? भाषा
विज्ञान का नियम है कि केवल उसी भाषा को समझाने
के लिए नियमों की जरूरत पड़ती है,
व्याकरण की जरूरत पड़ती है,
जिसे आम बोलचाल की भाषा के
रूप में समझना हमारे लिए आसान न रह गया हो। अगर
महाभारत के समय तक आते-आते वैदिक भाषा कठिन हो
गई थी, उसे और उसमें
लिखे मंत्रों को समझाने के लिए आचार्य यास्क को
'निरुक्त'
नाम से एक किताब लिखनी पड़ी,
तो इसका मतलब साफ है कि तब
तक वैदिक भाषा आम लोगों से पूरी तरह दूर हो चुकी
थी और लोगों के बीच रोजमर्रा की उसी संस्कृत का
प्रयोग होता था,
जिसमें वेदव्यास ने महाभारत नामक प्रबंध काव्य
लिखा था। तब तक साहित्यिक या क्लासिकल भाषा बन
चुकी वैदिक संस्कृत से अलग लोगों के बीच संस्कृत
का यह नया रूप,
अर्थात् लौकिक रूप महाभारत से एक हजार साल पहले
हुए वाल्मीकि के समय से ही चलन में आ चुका था और
वाल्मीकि ने आदिकाव्य रामायण इसी नई संस्कृत में
लिखी थी।
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यास्क ने एक खास सिद्धांत
यह बनाया था कि-
'अर्थनित्य: परीक्षेत'
अर्थात् शब्दों को हमेशा
अर्थ के सहारे समझो |
अगर यास्क ने अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ निरुक्त न
लिखा होता या यास्क का निरुक्त ग्रन्थ अपने से
पहले लिखे करीब बारह निरुक्त ग्रंथों की तरह
लुप्त हो चुका होता,
तो देश के भाषाई विकास के
महत्वपूर्ण पड़ावों से हमारा परिचय ही नहीं हो
पाता। इस महत्वपूर्ण आचार्य और उनके महत्वपूर्ण
ग्रन्थ के बारे में हम अधिक जानकारी पाएं,
इससे पहले अति संक्षेप में
एक छोटी-सी बात जान लेना रोचक रहेगा।
हर भाषा की तरह संस्कृत में भी कुछ शब्द ऐसे हैं,
जिनका प्रयोग
सिर्फ
भाषाई सौंदर्य के लिए होता है,
या काव्य में पूरक यानी फिलर
के रूप में होता है। अंग्रेजी के आई मीन,
यू सी आदि की तरह संस्कृत
में खलु, ननु,
नूनम्,
वै जैसे शब्द इसी श्रेणी के
हैं। इस तरह के शब्दों की मदद से हम एक ही बात
को एक से ज्यादा तरीके से कह सकते हैं। मसलन
कहीं कहा गया है कि 'इति
यास्क:' अर्थात्
यास्क ने ऐसा कहा है। पूरक या सौंदर्यवाची शब्द
का प्रयोग करते हुए वही बात इस तरह से भी कही गई
है- इति वै यास्क:। इसका अर्थ भी वही है कि ऐसा
यास्क ने कहा है। यहां वै का प्रयोग महज भाषा को
ज्यादा सुंदर बनाने के लिए किया गया है। अन्यथा
'इति यास्क:'
या 'इति
वै यास्क:' में कोई
फर्क नहीं है। पर हमारे देश की हर चीज में
भ्रांति पैदा करने में सिद्धहस्त कुछ पश्चिमी
विद्वानों ने कह डाला कि निरुक्त नामक ग्रन्थ के
लेखक के दो नाम मिलते हैं- यास्क और वैयास्क। है
न मजेदार? पश्चिमी
विद्वानों ने हमारे बारे में भ्रांतियां ऐसे ही
फैलाई हैं।
यास्क का महत्व चूंकि निरुक्त के कारण है,
इसलिए पहले निरुक्त के बारे
में जान लिया जाए। निरुक्त का संबंध चूंकि वैदिक
भाषा से है, इसीलिए
वैदिक भाषा के सन्दर्भ में इसका अर्थ है वह
किताब, जिसमें इस
भाषा के शब्दों को भली भांति समझा दिया गया है।
कैसे समझा दिया गया है?
निर्वचन के द्वारा और हमारे
देश की ज्ञानराशि को यास्क का यही सबसे बड़ा
योगदान है। चूंकि यास्क के समय तक वैदिक भाषा
दुरूह हो चुकी थी,
इसलिए उसके शब्दों को समझाने का यास्क ने एक
तरीका निकाला है।
यास्क क्या करते हैं?
वे किसी एक वैदिक मंत्र को
उठा लेते हैं और उसका अर्थ करना शुरू कर देते
हैं। अर्थ करने के दौरान जरूरी शब्दों को उठाते
जाते हैं और उनका अर्थ इस तरह से समझाते हैं कि
पढ़ने वाले को शब्द के साथ उसके अर्थ का जुड़ाव
पूरी तरह समझ में आ जाए।
किसी शब्द का अर्थ जानने का इससे अच्छा तरीका
क्या होगा कि उसका प्रयोग समझा दिया जाए। आप
चाहें तो उसे आज की शिक्षा प्रणाली का डायरेक्ट
मैथड जैसा मान सकते हैं। मसलन एक शब्द है,
राजा। यास्क उसका अर्थ इस
तरह समझाएंगे, राजा
राजते: अर्थात् राजा वह है जो विराजित हो,
चमक-दमक रहा हो। देवता का
अर्थ यास्क इस तरह समझाएंगे- देवो दानाद् वा,
दीपनाद् वा,
द्योतनाद् वा,
द्युस्थानीयो भवतीति वा,
अर्थात् देवता वह है जो
लोगों को कुछ दे,
प्रदीप्त हो,
दीप्तिमान हो या द्युलोक वासी हो। प्रचलित अर्थ
या अर्थों के आधार पर वैदिक शब्दों को समझाने
वाले यास्क ने एक खास सिध्दांत यह बनाया था कि-
'अर्थनित्य: परीक्षेत'
अर्थात् शब्दों को हमेशा
अर्थ के सहारे समझने की कोशिश करनी चाहिए। भाषा
में दो मूलतत्व होते हैं- शब्दों की
ध्वनियां
और शब्दों के अर्थ। संस्कृत व्याकरण की पुस्तकें
ध्वनि के आधार पर शब्दों की चीरफाड़ करती हैं,
जबकि निरुक्त में अर्थ के
आधार पर शब्दों को समझा जाता है। भाषा विज्ञान
को यास्क की यह अद्भुत देन है और अपनी इस अद्भुत
देन को यास्क ने जिन भाषाई आयामों के आधार पर
समझाया है, वे वही
आयाम हैं, जिनके आधार
पर आज के भाषाविज्ञान का अर्थविज्ञान अर्थात्
सिमेन्टिक्स टिका है। दूसरे शब्दों में भाषा
विज्ञान ने जो काम आज किया है,
यास्क ने ठीक वही काम आज से
पांच हजार साल पहले किया था। पांच हजार साल पहले
कैसे ? क्योंकि यास्क
महाभारत से बस चंद दशक पहले ही हुए थे। अपने
निरुक्त में उन्होंने भीष्म के पिता शान्तनु और
शान्तनु के भाई देवापि का जिस तरह से वर्णन किया
है, उससे असंदिग्ध
रूप से मान लिया गया कि यास्क शान्तनु के
समकालीन थे।
वाल्मीकि के समय ही जो वैदिक भाषा बोलचाल का रूप
छोड़कर साहित्यिक हो गई थी,
महाभारत तक आते-आते वह काफी
दुरूह भी हो गई थी और यास्क ने इसी दुरूहता को
आसान करने के लिए अपना ग्रन्थ लिखा था। शब्दों
का अर्थ करने के अलावा यास्क वेदों को समझने की
भी खास कोशिशें करते नजर आते हैं। वे कहते हैं
कि वेदों के मंत्र तीन तरह के हैं। कुछ आधिभौतिक
हैं, कुछ आधिभौतिक
हैं और कुछ आध्यात्मिक
हैं। एकाध जगहों पर यास्क कुछ नए किस्म के
प्रयोग भी करते हैं। मसलन वे बताते हैं कि एक ही
मंत्र की व्याख्या यज्ञवादी कैसे करेंगे
?
इतिहासकार कैसे करेंगे या काव्यशास्त्री कैसे
करेंगे। क्या मतलब है इस सबका
?
मतलब यह कि वैदिक भाषा की
तरह वैदिक मंत्र भी,
महाभारत के समय तक काफी दुरूह हो चुके थे और
लोगों के बीच में कई तरह की धारणाओं व स्थापनाओं
का विकास हो चुका था। इस हद तक कि देश में वेदों
को बेकार का ग्रन्थ मानने वालों की एक लाबी भी
काफी ताकतवर हो चुकी थी। यास्क ने 'मंत्र
सार्थक हैं या अर्थहीन'
इस सवाल पर भारी-भरकम
तर्क-वितर्क से बहस चलवाकर अंतत: उस पार्टी को
अपना वोट दे दिया है,
जो वेदों को अर्थवान मानती थी। जाहिर है कि अगर
यास्क वेदों के मंत्रों को अर्थहीन मान लेते तो
उनका अर्थ करने के इतने वैज्ञानिक नियमों का
सूत्रपात वे कैसे कर पाते?
ऐसा मानने वाले भी कम नहीं,
जो कहते हैं कि निर्वचन के
सहारे अर्थविज्ञान का प्रवर्तन करने वाले यास्क
कोई पहले आचार्य नहीं थे। इस मान्यता का आधार यह
है कि खुद यास्क ने अपने निरुक्त ग्रन्थ में
अपने से पहले बारह आचार्यों का उल्लेख किया है।
इन आचार्यों के नाम जान लेना रोचक हो सकता है।
नाम हैं- औदुम्बरायण,
औपमन्यव, शाकटायन,
गार्ग्य,
वार्ष्यायणि,
आग्रहायण,
और्णवाभ,
शाकपूणि,
तैटीकि,
गालव,
स्थौलाष्ठीवी और क्रोष्टु।
हैं न मजेदार नाम?
आजकल कहीं ऐसे नाम सुनने को मिलते हैं?
इन नामों को लेकर यह विवाद भी चलता रहता है कि
यकीन से कह नहीं सकते कि इन्होंने अपने-अपने
निरुक्त ग्रन्थ लिखे थे या कि इनके कुछ मत ही
लोक प्रचलित हो गए थे। मान लिया कि उसमें से
हरेक ने अपना-अपना निरुक्त लिखा था तो जाहिर है
कि यास्क का निरुक्त नए किस्म का,
मौलिक उद्भावनाओं वाला एक
परिपूर्ण ग्रन्थ रहा होगा,
जिसके बौद्धिक तेज के आगे
शेष सभी पूर्ववर्ती ग्रंथों की ऐसी बलि चढ़ी कि
आज उनमें से एक का भी निरुक्त ग्रन्थ नहीं
मिलता।
देश के ज्ञान के विकास में यास्क का योगदान तो
मालूम पड़ गया कि उन्होंने दुरूह होती जा रही
वैदिक भाषा को समझने के लिए अर्थविज्ञान संबंधी
नियम बनाए। इस जरिए यह भी मालूम पड़ गया कि
वेदव्यास के समय तक आते-आते वैदिक भाषा
विद्वानों के लिए भी दुरूह हो गई थी। तो सवाल है
कि यास्क के व्यक्तित्व के बारे में क्या
जानकारियां हमें मिलती हैं?
कोई खास नहीं मिलतीं। यास्क
शान्तनु के समय हुए थे,
इसका संकेत खुद उनके निरुक्त
से मिल जाता है,
जिसमें उस समय पडे बारह वर्षीय दुर्भिक्ष को
यास्क ने अपनी आंखों के सामने घटे भूतकाल के
उदाहरण के रूप में पेश किया है। पर महाभारत
युद्ध का उसमें दूर-दूर तक कोई सन्दर्भ नहीं है।
महाभारत परवर्ती एक महत्वपूर्ण पुस्तक
वृहदारण्यकोपनिषद् में यास्क के गुरु के बारे
में कुछ पता चलता है और उन्हें आसुरायण का
समकालीन माना जाता है। इस बारे में बहस चलती
रहती है कि यास्क चतु:कीर्ति के शिष्य थे या
पुत्र। खुद यास्क ने अपने ग्रन्थ में अपने को
पारस्कर कहा है, जो
उनके रहने के स्थान का संकेत देता है। 'यस्क'
उनके पिता का नाम था या गुरु
का, जिसके पुत्र या
शिष्य होने के कारण वे यास्क कहलाए,
इस पर भी बहस चलती रहती है।
यास्क के बारे में इससे अधिक पता नहीं चलता। पर
वैदिक समस्याओं के विवेचन के क्रम में यास्क के
बारे में एक धारणा यह भी बनी है कि वे
भाषाशास्त्री होने के अलावा वैज्ञानिक भी थे।
वैश्वानर अग्नि के विवेचन में यास्क के भीतर
छिपे बैठे वैज्ञानिक से हमारा परिचय बखूबी हो
जाता है। पर यास्क के समय तक वैदिक मंत्र लिखे
जाने क्रमश: बंद हो रहे थे,
वेदों के प्रति एक आदरभाव,
रहस्यभाव और साथ ही
उपेक्षाभाव भी विकसित हो चुका था। शायद इसीलिए
यास्क ने वेदों के कवियों को रचयिता न मानकर
ऋषि कहा है और जानते हैं,
ऋषि
का अर्थ क्या है?
यास्क कहते हैं- 'ऋषिर्दर्शनात्'
अर्थात् जिन्होंने मंत्रों
को लिखा नहीं, बस
दर्शन किए हैं, वे ही
ऋषि हैं। एक अकेले यास्क हमें कितनी ही नई
बातों से सराबोर कर देते हैं।
(भारतगाथा
पुस्तक से साभार)
सम्पर्क:
एन.डी.
23, विशाखा इंकलेव,
पीतमपुरा,
दिल्ली-110034
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