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नवम्बर,  2007

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ब्लूलाइन का सफर

अनिल जोशी

ब्लूलाइन की महिमा अनंत है। इसकी  महिमा वाल्मीकि या तुलसीदास भी नहीं लिख सकते। बहुत सी रामलीलाओं में इस बार रावण के रूप में ब्लूलाइन को दिखाया गया। पर रावण के तो दस सिर थे। ब्लूलाइन के तो पांच-सात हजार हैं। दिल्ली के लोगों से अगर पूछा जाए कि यमराज का वाहन क्या है तो वे भैंसा नहीं ब्लूलाइन कहेंगे।

 

ब्लूलाइन बस आपको एक सफर में इतने आध्यात्मिक अनुभव देती है कि आपको गीता पढ़ने की जरूरत नहीं रह जाती।

ब्लूलाइन बस आपको एक सफर में इतने आध्यात्मिक अनुभव देती है कि आपको गीता पढ़ने की जरूरत नहीं रह जाती। यात्रा के प्रारंभ में ही जिस तरह आपको गालियां देकर, धक्का देकर आगे बढ़ाया जाता है, वह एक दिव्य आध्यात्मिक अनुभव है। आप भले ही अपने को लाट साहब समझते हों, पर ब्लूलाइन का कंडक्टर बड़े-छोटे, बुजुर्ग-बच्चे, आदमी-औरत, बुढ़िया में कोई फर्क नहीं करता। वह सबको धक्के देता है। सबकी मां-बहन की करता है। आप मान-सम्मान के भाव से ऊपर उठ जाते हैं। उसकी नजर में सभी सवारियां अगले स्टाप की टिकट ले आखिरी स्टाप पर उतरना चाहती हैं। वो तीन रुपए वालों को पांच की, पांच वालों को सात या दस की और सात वालों की दस रुपए की टिकट फाड़ता चलता है। अगर आप में मां-बहन करने की क्षमता है तभी तीन की तीन या पांच की पांच रुपये में टिकट ले सकते हैं। इस प्रकार वह आप में साहस का संचार करता है। आपको अभद्र भाषा में बोलना सिखाता है। यह सीखे बिना आप दिल्ली में कैसे रह सकते हैं। यह पाठ आपको थ्री व्हीलर वालों, सब्जी वालों के साथ व्यवहार में काम आता है।

बस में बैठने के बाद फिर थोड़े देर में कोहराम शुरू हो जाता है। किसी से टिकट पर लड़ाई, महिलाओं से बदतमीजी पर लड़ाई, शराब पिए हुए लोगों से लड़ाई। आपसी गाली-गलौच में समय का पता ही नहीं चलता। इसमें कई बार चाकू भी निकल जाते हैं। खून भी बहता है। जो लोग बीच-बचाव में ज्यादा रुचि लेते हैं, उन्हें थोड़ी देर में पता चलता है कि उनका पर्स जा चुका है। पर्स लुटने की सूचना रुटीन तरीके से ली जाती है। लो इस वाले चक्कर में इसका गया। इसके बाद आप दीन-दुनिया के झगड़े से पूरी तरह अनासक्त हो जाते हैं और पत्नी की सीख, 'काम से काम रखो' पर पूरी तरह अमल करने लग जाते हैं।

कंडक्टर से जुड़ी बातें खौफनाक हैं पर उतनी नहीं जितनी ड्राइवर से जुड़ी। यह एक सवारी चढ़ी, बस चल चुकी है, सवारी लटक रही है, उसके हाथ-पांव लहूलुहान हो गए हैं, ड्राइवर हंस रहा है। यह बचा साइकल वाला, अरे-अरे रेहड़ी वाला तो अभी जाता। ड्राइवर सबको गाली देता जा रहा है- 'सालों को सड़क पर चलना नहीं आता।' यमराज चले आ रहे हैं। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। डी.टी.सी. वाले को खदेड़ दिया है। उसे पीछे रहने के पैसे मिलते हैं। लड़ाई तो दूसरी ब्लूलाइन से है। उसे भी एक शेर जवान चला रहा है। रेड लाइट पर दोनों शेरों की नजरें मिलीं। दोनों ने जंगली भाषा में कुछ बात की। दोनों बसों में बैठे लोग डरे हैं-दुबके हैं। उन्होंने जिन्दगी की उम्मीद छोड़ दी है। उन्हें सफर और जिन्दगी के बीच कुछ चुनना था, सो वे चुन चुके हैं। आत्मा-परमात्मा का चिंतन उन्हें समझ आ चुका है। बजरंग बली का पाठ तेजी से चल रहा है। अब बताइए उनके आध्यात्मिक  विकास में बस का कितना योगदान है। उधर भीड़ भरे बाजार में लोग भागते हुए अपनी जान बचा रहे हैं। इधर ट्रांसपोर्टर शीला जी के पास गुलाब जामुन खा रहे हैं। ये... ये... बचा... ये तो बाल-बाल बचा। तब तक वो पीछे वाली आगे निकल गई। क्यों... इसने चूड़ियां पहन रखी है। उसने पिछले स्टाप पर सवारियां नहीं उतारीं। क्या मजाल इसकी। इसकी मां की...। मां, बहनें अपनी खैर मना रही हैं। ये कार से टक्कर होते-होते बची। खुले सांड की तरह बसें भाग रही हैं। लोग चीख रहे हैं। भीतर भी और बाहर भी। आखिर में एक बस रेलिंग पार कर गई। थ्री व्हीलर वाले को टक्कर मारते हुए वह दूसरी तरफ निकल गई। थ्री व्हीलर में बैठी महिला और बच्चे चीख मार कर गिर गए हैं। उधर दूसरी बस ने बस स्टैंड पर खड़े लोगों को रौंद दिया है। लाशें इधर-उधर गिरी हुई हैं। ट्रैफिक पुलिस वाले मुस्तैद हैं। उन्होंने पर्चे पर कोड लिखा हुआ है, 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे।' पैसा आ चुका है। बोतल मिल गई है...।

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