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नवम्बर,  2007

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दूर तक जाना है

चैतन्य प्रकाश

मय उड़ा जा रहा है। सदियां बीत चली हैं। धरती के कुछ बाशिंदे आसमान पर बस्तियां बसाने का सपना देख रहे हैं, तो दूसरी ओर हजारों लाखों लोग दो बीघा जमीन की लड़ाई हारकर बेघर, बेजमीन हो रहे हैं। अभावों का सिलसिला रुकने की बजाय और तेज होता जा रहा है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दारुण दृश्य 28 अक्टूबर रविवार को नई दिल्ली की चौड़ी और चिकनी सड़कों पर उपस्थित हुआ। जल, जंगल, जमीन और जीविकोपार्जन के अधिकार की मांग को लेकर 18 राज्यों के 25 हजार से अधिक लोग 240 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठे हुए। पूरे 24 दिन की इस यात्रा में शामिल यात्रियों का अनुशासन काबिलेतारीफ रहा है। इस यात्रा के सूत्रधार, एकता परिषद के अधयक्ष पीवी राजगोपाल का कहना है, ''हम गांधी के बताए रास्ते पर चल कर संघर्ष इसलिए कर रहे हैं, ताकि देश और दुनिया को यह बताया जा सके कि गांधी का तरीका कारगर तरीका है।'' इन अनपढ़ और निर्धन लोगों का संगठित अहिंसक संघर्ष, आत्मविश्वास और अनुशासन देखकर स्वामी विवेकानंद की अभिजात वर्ग के लिए दी गई यह फटकार जीवंत हो उठती है-

"निराशा की गहरी खाई में गिरकर आत्महत्या की ओर अग्रसर होने की बजाय विद्रोह का रास्ता लाख दर्जा बेहतर है। नैराश्य को जीतने का इस परिस्थिति में और बेहतर रास्ता मिलना मुश्किल ही था। इन हजारों लोगों ने न केवल सत्ता और शासन के मनमाने रवैये को नकारा है, बल्कि स्वयं के भीतर से उठते नैराश्य की दासता सहने से भी इनकार किया है।"

''भारत के अभिजात वर्ग के लोगो! क्या तुम सोचते हो तुम जीवित हो ? तुम दस हजार वर्ष पुराने शव की तरह हो। आज भारत में जो भी थोड़ी-सी जीवन शक्ति शेष है वह उन लोगों में है जिन्हें तुम्हारे पूर्वजों ने चलते-फिरते सड़े-गले मांसधारियों के रूप में घृणा का पात्र समझा। लेकिन असल में चलते-फिरते मुर्दे तो तुम स्वयं हो। तुम्हारे मकान, तुम्हारे असबाब, सज्जा, सामग्री अजायबघर की वस्तुओं से लगते हैं। वे इतने निर्जीव और पुरातन हैं। इस मायावी विश्व में उच्च वर्ग के लोगो! तुम स्वयं मोह, भ्रम की भांति हो। तुम भूतकाल के प्रतिनिधि हो। तुम भविष्य के सन्दर्भ में अस्तित्वहीन हो और शून्य रूप हो। भारत के भूतकाल के शव के मांसहीन, रक्तहीन कंकाल के रूप तुम हो। तुम शीघ्र ही शून्य में क्यों नहीं विलय हो जाते, ताकि तुम्हारे रिक्त स्थान पर एक नये भारत का उदय हो।

इस नये भारत का उदय हो हल थामे किसान की कुटी से, मछुवों, मोचियों, मेहतर-भंगियों की झोंपड़ियों से, फल बेचने वालों की हट्टी से। नये भारत का उदय हो कारखानों, बाजारों और हाटों से। इन आम लोगों ने हजारों वर्षों से बिना उप्फ किये उत्पीड़न सहा है, जिस कारण इनके अन्दर बड़ी सहनशक्ति है। उन्होंने बडे दुख सहे, जिससे उन्होंने जीवनी शक्ति पायी है। एक मुट्ठी चना खाकर भी उनमें इतनी स्फूर्ति है जो सारे विश्व में भी समा नहीं पाती। भूत-काल के अस्थि-पंजर! तुम्हारे सामने तुम्हारे उत्ताराधिकारी हैं, आने वाले भारत के प्रतीक। तुम शून्य में समाकर अदृश्य हो जाओ! तुम्हारे विलुप्त होते ही पुनर्जाग्रत भारत के उद्धाटन का घोष तुम सुनोगे, जो  कई लाख बिजलियों के गर्जन के सदृश समस्त सृष्टि में गूंज उठेगा।''

ऐसा लगता है मानो रविवार के दिन दिल्ली के दरबार को चुनौती देने आया भारत का आमजन विवेकानंद की इस फटकार का प्रतिनिधि बनकर आया हो।

सरकार के नुमाइंदे दिल्ली में बसते हैं; वे देश के गांवों और नगरों की यात्राएं कर जनता के सुख-दुख को अनुभव करें, उनकी समस्याओं का समाधान करें; यह लोकतंत्र की मूल अपेक्षा है। किंतु जिंदगी जीने की न्यूनतम जरूरतों के हक के लिए हजारों लोग पांव के छाले और फफोलों के दर्द सहते हुए, पैदल दिल्ली तक आ पहुंचते हों तो लोकतंत्र के अर्थ में पैदा होते हुए अनर्थ की आहट स्पष्ट सुनाई पड़ने लगती है। एक तरफ देश में शेयर मार्केट का सूचकांक रिकार्ड छू रहा है, तो दूसरी ओर भूस्वामी भूमिहीन हो रहे हैं। औद्योगिक विकास की गति तीव्र है; बाजारों में रौनक है, धनवानों की जमात बढ़ रही है, नव धनाढय वर्ग तेजी से फल-फूल रहा है। मगर गरीबी और लाचारी मौत के मुहाने तक पहुंच गई है। अन्नदाता किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। आलीवर गोल्डस्मिथ ने इस संघटना को 'उजाड़ गांव' ( Deserted Village) में इस तरह लिखा है, ''जहां केवल दौलत जमा होती है वहां क्षय होता है मनुष्य का (मनुष्यता का) '' (Where wealth accumulates, men decay!)

कुछ लोगों की मालकियत, मनमानी और मौज के लिए अनेकों लोगों की जिंदगी का तरन्नुम विदा होता जाता है, या तरन्नुम कभी पैदा हो ही नहीं पाता, तनाव और दबाव ही जिंदगी की हकीकत रह जाती है। ऐसे में समाजवादी विचारक टाउनी की बरसों पहले कही गई बात वर्तमान भारतीय समाज पर लागू होती दिखाई देती है-

''मानवता के हाल के अनुभवों पर शान्ति से विचार करने वालों के लिए यह सोचना कष्टसाध्य है कि केवल खुशकिस्मत परिवारों के समूह को छोड़कर प्रत्येक अन्य पीढ़ी की प्रतिभा जैसे ही पुष्पित-पल्लवित होने लगती है वैसे ही उसे आर्थिक चक्की में पीस दिया जाता है, ताकि उसको पीसकर एक मानवीय लुगदी बनायी जा सके। ऐसा माना जाता है कि इस लुगदी से राष्ट्रीय वैभव और शक्ति की, और विश्व के सारे राज्यों और उनके गौरव की रचना की जा सकेगी।''

पूंजी के प्रभाव और उससे आमजन पर पड़ने वाले दबाव को महात्मा गांधी ने बहुत पहले स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था, इसीलिए उन्होने कहा था-

''शहरों में दिखाई देने वाली धन-दौलत से हमें धोखा नहीं खाना चाहिए। यह इंग्लैंड या अमेरिका से नहीं आती। यह सर्वाधिक गरीबों के खून से प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि भारत में सात लाख गांव हैं। किसी के पास इस बात का लेखा-जोखा नहीं है कि इनमें बंगाल और कर्नाटक और अन्य जगहों पर कितने हजार गांव भूख और बीमारी से नष्ट हो गए। सरकारी रजिस्टर यह नहीं बता सकते कि ये ग्रामीण किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। लेकिन स्वयं एक ग्रामीण होने के नाते मैं गांव की दशा जानता हूं। मैं गांवों की अर्थव्यवस्था जानता हूं। मैं आपको बताता हूं कि ऊपर का दबाव नीचे के लोगों को कुचलता है।''

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इग्लैंड के गरीब किसान की नियति पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने अपनी पुस्तक 'द एज आफ रिवोल्यूशन' (1973) में लिखा है-

''इस तरह पूंजीवादी समाज के दायरे में और अधिक देर तक शरण पाने में असमर्थ, गरीब तबके के सामने तीन ही संभावनाएं बची थीं। या तो वे खुद बूर्जुआ बनने का प्रयत्न करें या अपने-आप को धीरे-धीरे परास्त हो जाने दें या विद्रोह का मार्ग अपनायें।''

जनादेश यात्रा में सबसे अच्छी बात यह है कि हजारों लोग असहमति और प्रतिरोध की आवाज को बुलंद कर रहे हैं। लोगों की व्यक्तिगत मजबूरी लोकतांत्रिक मजबूती की मिसाल बन गई है। निराशा की गहरी खाई में गिरकर आत्महत्या की ओर अग्रसर होने की बजाय विद्रोह का रास्ता लाख दर्जा बेहतर है। नैराश्य को जीतने का इस परिस्थिति में और बेहतर रास्ता मिलना मुश्किल ही था। इन हजारों लोगों ने न केवल सत्ता और शासन के मनमाने रवैये को नकारा है, बल्कि स्वयं के भीतर से उठते नैराश्य की दासता सहने से भी इनकार किया है। इस नैराश्य का उल्लेख करते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था-

''दासता का सबसे बुरा रूप है नैराश्य की दासता। इस अवस्था में व्यक्ति को अपने ऊपर विश्वास नहीं रह जाता और वह इसी अविश्वास के बंधन में बंधा रहता है।''

पीवी राजगोपाल और एकता परिषद के अन्य कार्यकर्ताओं की सूझबूझ और जी तोड़ मेहनत ने भारत के इस आमजन में विश्वास का संचार किया है। उसे नैराश्य की दासता से बाहर निकालकर शासन के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए प्रोत्साहित किया है। इक्कीसवीं सदी का यह गांधीमार्ग कुछ मांगों के मनवाने के लिए निकाली जाने वाली यात्रा मात्र नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि यह विकास और विनाश की देहरी पर खड़ी विभ्रमित मनुष्यता के कान खोलने वाली ललकार है।

1945 में बेंजामिन डिजरायली ने अपने समय के अंग्रेजी राष्ट्र को दो ऐसे राष्ट्रों में विभक्त किया था- ''जिनमें न तो आपसी समन्वय था और न ही किसी तरह की सहानुभूति। दोनों एक दूसरे की आदतों, विचारों और अनुभवों से इतने अपरिचित थे मानो दोनों अलग-अलग क्षेत्र या विभिन्न ग्रहों के निवासी हों। जिनका लालन-पालन और खान-पान अलग-अलग हो। जिन पर शासन का तरीका अलग हो। बल्कि जिनके लिए नियम-कानून अलग-अलग हों। एक राष्ट्र था धनी का दूसरा गरीब का।''

करीब-करीब ये ही हालात आज भारत में पैदा हो रहे हैं। जैसे भारत और इंडिया दो अलग-अलग आचार-विचार रहन-सहन, खान-पान के प्रतिनिधि की तरह विकसित हो रहे हैं। भारत पिछड़ेपन का प्रतिनिधि है और इंडिया कथित विकास की चकाचौंध का। एक गहरा अन्तर्विरोध भारतीय जनमानस में उत्पन्न हो गया है। इंडिया लगातार भारत को विस्थापित करने में लगा है। एक लड़ाई पश्चिमी सम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ी गई थी, बहुत संभावना है कि दूसरी लड़ाई मारक, विनाशक विकास के विचार के खिलाफ लड़ी जाये। जाहिर है यह लड़ाई आसान नहीं है, किंतु गांधी के इस देश में मुश्किल लड़ाइयों को अपने तरीके से लड़ने की प्रेरणा सदैव मौजूद रही है।

त्ता और साहूकारों के गठजोड़ पुराने हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि साहूकारों के रूप बदल गए हैं। वे अब सूदखोर साहूकार के रूप में नहीं बल्कि सपनों के सौदागर की तरह आ रहे हैं। वे सत्ता के साथी हैं, वे गरीबी से घृणा करते हैं, शायद गरीबों से भी...। सत्ता और साहूकारों के इस नवरूप गठजोड़ के सामने आमजन सचमुच निरीह है, असहाय है, पर शायद उतना नहीं जितना ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सामने था।

सत्याग्रहियों की 240 कि.मी. की यात्रा महज एक पड़ाव है। लड़ाई लंबी है, इसके बहुत सारे मोड़ भी होंगे और अनेकों पड़ाव भी होंगे। यह लड़ाई एक सभ्यता विमर्श को उत्पन्न कर रही है। यह लड़ाई दारिद्रय और समृद्धि की युगानुकूल परिभाषाएं करने का निमंत्रण दे रही है। ये लड़ाई भोग और संयम के मूल्यों के बीच चुनाव का संदेश दे रही है। यह लड़ाई मनुष्यता के भविष्य की निर्णायक घोषणा करेगी। इस लड़ाई में तेजी आना अवश्यंभावी है। यह केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व में वैश्वीकरण और बाजारवाद के प्रभावों से उत्पन्न होते असंतुलन एवं असंतोष की प्रतिनिधि लड़ाई है।

सड़कों पर उतरे सत्याग्रही जल, जंगल जमीन की मांग कर रहे हैं, वे अपनी जिंदगी के मूलभूत हक की मांग कर रहे हैं। यह मांग सत्ता की सोच में विचलन पैदा करती है, त्ता प्रतिष्ठानों में बैठे लोगों को या आरामदायक चारदीवारी में सुरक्षित, सुसज्जित धनाढय वर्ग को यह कोलाहल विकास विरोधी लग सकता है। वस्तुत: यह एक स्वातंत्रय का स्वर है। यह जीने की संस्कृति के निर्धारण का प्रश्न है। यह व्यक्ति के नैसर्गिक अधिकारों के हनन का मसला है। यह लड़ाई कथित विकसितों और वंचितों के बीच की दिखाई देती है। मगर सच्चाई यह है कि प्रकृति और विकृति के दोनों छोरों से ऊपर संस्कृति के विचार की स्थापना का आह्वान इस संघर्ष में से मुखरित होता है। कवि शमशेर बहादुर सिंह ने इसे यों कहा है-

''संकुचित है आज जीवन का हृदय

व्यक्ति-मन रोता है जन-मन के लिए''

वे जो पिछड़े, दरिद्र कहलाने के लिए अभिशप्त हैं, वे प्रकृति के छोर पर बैठे हैंवे अपने हिस्से का खाते हैं, उतना ही कमाते हैं। किंतु जो विकसित कहलाने के मोह से ग्रस्त हैं वे दूसरों का छीन कर खाने में लगे हैं। इन दोनों छोरों के ऊपर मनुज की संस्कृति है जो अपना हिस्सा भी दूसरों को देना सिखाती है। इस मनुज संस्कृति को पाने के लिए चाहिए संयम और परिश्रमपूर्वक अर्जित की गई समृद्धि। फिर संयम दारिद्रय का प्रतीक नहीं होगा, बल्कि विफलता और समृद्धि का अधिकारी होगा। वास्तव में तब यह राष्ट्र द्विखंडी नहीं होगा; एकरस, एकात्म होगा। इंडिया और भारत दोनों कंधे से कंधा मिलाकर परिश्रम करेंगे और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होंगे। तब सचमुच कोई अभिजात्य नहीं होगा और कोई पिछड़ा भी नहीं होगा। तब विवेकानंद के शब्दों में, वास्तव में भारत का अभिजात्यवर्ग बहुजन में, सर्वजन में विलीन हो जायेगा। और यह आमजन, सर्वजन भारत के भाग्य और भविष्य को तय करेगा। एक अरब भारतवासी अपने पसीने की बूंदं से भारत का भाग्य लिखेंगे, तब स्वतंत्रता और लोकतंत्र का असली अर्थ प्रकट होगा।

परस्पर संवेदनशीलता, सहयोग, सामंजस्य मनुष्यता की पहचान है। ये जो हजारों लाखों गरीब, वंचित लोग हैं, त्ता और साहूकारों को इनके लिए जीने का संकल्प लेना होगा, आगे बढ़कर इनको गले लगाना होगा, इनके जीवन में खुशहाली लाने के रास्ते खोजने होंगे। तभी शायद हम एक विकसित राष्ट्र होने के स्वप्न को साकार कर पाएंगे। यह जो यात्रा दिल्ली तक पहुंची है, इसके क्रांतिधर्मी यात्रियों को अपने उद्देश्यों का विस्तार करना होगा। भोगवादी, रोगयुक्त, शोषक, स्वार्थी, लालची, अहंपोषक विकास के विनाशक विचार के खिलाफ उत्पादन मूलक, संयमयुक्त, स्वास्थ्यदायी, संपोषक, सहभागी, उत्सर्गपूर्ण एवं अनुग्रहपरक विकास के मार्ग की संकल्पना को स्थापित एवं क्रियान्वित करने का बीड़ा उठाना होगा। वरना छोटी-बड़ी मांगों के लिए देश के सर्वाधिक उत्पादनशील वर्ग को प्रकृति की गोद से दिल्ली की कठोर सड़कों पर बार-बार लाने की कवायद करना सचमुच मुश्किल और गैरजरूरी होता जायेगा। समझना होगा कि अभी यह जनादेश यात्रा है, राजधानी तक पहुंची है, इसे एकात्म विकास की विचार-यात्रा के रूप में विकसित होना है और जन-मन तक जाना है। इसे यहां रुकना नहीं है, दूर तक जाना है।           (लेखक स्वतंत्र चिंतक हैं।)

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