भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

नवम्बर,  2007

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मूल प्रवृत्ति आज भी नहीं बदली है

आज अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद मनुष्य का अतीत प्रकृति के अन्य जीवों से भिन्न नहीं है। अपने अस्तित्व के शुरुआती दिनों में मनुष्य अन्य पशु-पक्षियों की भांति मुक्त विचरण करता और उसे अपने लिए जो भी वस्तु आवश्यक लगती, उसे वह हासिल करने में लग जाता। लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य की इस प्रवृत्ति पर शासकीय एवं नैतिक व्यवस्थाओं के द्वारा अंकुश लगा दिया गया। निजी स्वामित्व की अवधारणा का जन्म हुआ और यह तय किया गया कि कोई मनुष्य या मनुष्यों का समूह दूसरे मनुष्य या मनुष्यों के समूह की वस्तु को उसकी सहमति के बिना नहीं ले सकेगा। हालांकि यह बात जनसाधारण के लिए थी, शासक वर्ग के ऊपर ये नियम लागू नहीं होते थे। वे अपनी इच्छानुसार जब चाहे कोई भी वस्तु हासिल कर सकते थे। पिछले कुछ हजार वर्षों का ज्ञात मानव इतिहास ऐसी तमाम घटनाओं से भरा है जब शासकों ने अपनी ताकत के बलबूते कमजोर व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की संपत्ति पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया।

आज शासन की ओर से यह दावा किया जाता है कि किसी एक समुदाय के हित के लिए दूसरे समुदाय का अहित नहीं किया जाएगा। लेकिन यह दावा करते समय सरकार एक बात और जोड़ देती है। वह यह कि व्यापक हितों को देखते हुए यदि किसी एक समुदाय के हितों को नुक्सान पहुंचाना पड़ा तो उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है।

19वीं शताब्दी की शुरुआत से मानव सभ्यता तेजी से बदलने लगी। राजतंत्र की जगह लोकतंत्र की अवधारणा का प्रचार-प्रसार हुआ। किसी एक शासक के स्वेच्छाचारी शासन के स्थान पर कानून के शासन की स्थापना की गई। जिस व्यक्ति के हाथों में शासन की बागडोर होती है, वह स्थापित नियमों के तहत शासन चलाता है। सैध्दांतिक रूप से आज की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था अपने सभी नागरिकों की बेहतरी के लिए काम करती है। उसकी दृष्टि में सभी समान हैं। आज शासन की ओर से यह दावा किया जाता है कि किसी एक समुदाय के हित के लिए दूसरे समुदाय का अहित नहीं किया जाएगा। लेकिन यह दावा करते समय सरकार एक बात और जोड़ देती है। वह यह कि व्यापक हितों को देखते हुए यदि किसी एक समुदाय के हितों को नुक्सान पहुंचाना पड़ा तो उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। सरकार ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है।

अब बात आती है कि समाज या देश का व्यापक हित किसमें है। अगर हम आज की संपूर्ण शासन व्यवस्थाओं को देखें, जिसमें भारत भी एक है, तो सभी जगह व्यापक हित को शासक वर्ग के हितों का समानार्थी सिद्ध किया जाता है। समाज का वह वर्ग जो शासक वर्ग को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है, उसके हितों की प्राय: अनदेखी की जाती है। विस्थापन के मुद्दे को अगर हम इस दृष्टि से देखें तो स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है। यह तर्क दिया जाता है कि यदि विकास होना है तो फैक्ट्रियां बनेंगी, बांध बनेंगे, शहर बनेंगे तथा और भी बहुत कुछ बनेगा। इस सबके लिए यदि किसी समुदाय की जमीन लेनी पड़ी तो जरूर लेनी चाहिए। जिनकी जमीन छीनी जाती है, उन्हें मुआवजा देने की बात करके पूरी प्रक्रिया को न्यायोचित सिद्ध करने का भी प्रयास होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रभावित समुदाय को यह अधिकार नहीं दिया जाता कि वह मुआवजे को ठुकराकर अपनी जमीन पर कायम रहे। मुआवजा क्या होगा, इसका निर्णय भी प्रभावित समुदाय नहीं कर सकता। विस्थापित होकर दर-दर भटकना ही उसकी नियति बन जाती है।

जरा सोचिए, ऐसा क्यों होता है कि विकास के नाम पर विस्थापित किए जाने वाले लोग हमेशा कमजोर तबके के होते हैं? ऐसा क्यों होता है कि विकास का फायदा हमेशा एक किस्म के लोगों को मिलता है जबकि विस्थापन का दर्द दूसरे किस्म के लोगों को? वास्तविकता यह है कि आज के शासक वर्ग की मूल प्रवृत्ति अपने पूर्ववर्ती शासकों जैसी ही है। वे अपने और अपने लोगों के हित को साधने के लिए किसी का भी अहित करने से नहीं चूकते। पहले जहां यह सब खुले आम होता था, वहीं अब यह अप्रत्यक्ष रूप से मानवता और विकास के नाम पर होता है। यह बात अलग है कि जिस स्वरूप में विकास हो रहा है, उससे संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो गया है। असलियत यह है कि हम मानव जाति के एक बहुत ही नाजुक मोड़ पर हैं। आज यह बहुत ही जरूरी हो गया है कि हम विकास की एक ऐसी अवधारणा विकसित करें, जिसमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण प्राणीमात्र के सतत् सहअस्तित्व की व्यवस्था हो।

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