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गांधीजी
के अहिंसक मंत्र को खुद में समेटे दो स्पेनी
नागरिक इन दिनों जंतर-मंतर पर धरना दिए हुए हैं।
रोजा और पेडिला नामक ये दो व्यक्ति अपनी मांग को
लेकर डेरा जमाए हुए हैं। दोनों सन्
1988
से भारत में एक खास उद्देश्य से निवास कर रहे
हैं।
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आखिर यह गांधी की भूमि है। इनकी मांग है कि
इन्हें मुआवजा राशि प्रदान की जाए। इनकी
संस्था ने स्थानीय नागरिकों को भी रोजगार
प्रदान किया है। |
दरअसल,
इनकी योजना एक ऐसी फुटबाल
टीम की है जो पूर्णतया शाकाहारी हो। इन्हें अपने
मकसद में सफलता भी हासिल हुई। सन् 2002
में
ऋषिकेश में इनकी
संस्था ने खेल का भी आयोजन किया था। कोलकाता,
पुष्कर और हरिद्वार में ये
लोग जमकर काम करते आए हैं। लेकिन,
रोजा और पेडिला की संस्था को
2006 में एक साथ कई
समस्याओं का सामना करना पड़ा। स्थानीय प्रशासन की
करतूत ने इन्हें दिल्ली
के
जंतर-मंतर पर धरना देने को मजबूर कर दिया।
गौरतलब है कि इस संस्था ने हरिद्वार
के
समीप जगजीतपुर
कंकल
में
15 बीघा जमीन खरीदी। इसी
जमीन पर ये लोग स्थानीय लोगों को फुटबाल का खेल
सिखाया करते थे। एक दिन अचानक पुलिस अधिकारियों
ने इनके
कैंपस को खाली करा दिया। साथ ही इनकी संपत्ति को
भी नष्ट कर दिया। रोजा और पेडिला इस घटनाक्रम से
काफी आहत हुए। उत्तराखंड सरकार ने इनसे जमीन भी
वापिस ले ली।
दिल्ली स्थित जंतर-मंतर
के
एक छोटे से कोने में ये दोनों गांधीजी
के
अहिंसक हथियार को लिए बैठे हैं। आने-जाने वालों
को अपनी बात समझा कर रोजा और पेडिला दिन-रात
लिखते-पढ़ते रहते हैं। इनका मानना है कि इन्हें
अवश्य सफलता मिलेगी। जो लोग इनके
पास आते हैं,
उन्हें ये लोग प्रधानमंत्री
का पता लिखा हुआ एक पोस्टकार्ड देते हैं,
ताकि देश की जनता अपने
प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखे। अनशन पर बैठे ये
दोनों स्पेनी नागरिक अभी तक 450
पत्र प्रधानमंत्री
के
नाम भेज चुके
हैं। रोजा और पेडिला अपने वतन से कोसों दूर
संघर्ष कर रहे हैं। इनकी संस्था विश्व की अकेली
ऐसी संस्था है जो शाकाहारी खिलाड़ियों की टीम
तैयार करने में जुटी है। राष्ट्रीय टीम से भी
खेल चुके
सुमित सरकार रोजा-पेडिला की संस्था से जुड़े हुए
हैं। आज इनकी संस्था कोलकाता और
ऋषिकेश
में मृतप्राय है। वहीं पुष्कर में इनकी संस्था
ठीक ढंग से काम कर रही है। तकरीबन पांच सौ
युवकों को प्रतिदिन पुष्कर में
ट्रेनिंग
दी जाती है। रोजा
के
अनुसार इनकी योजना देहरादून में भी एक ऐसी ही
संस्था शुरू करने की थी,
लेकिन,
प्रशासन
के
रुख ने इनकी सारी योजनाओं पर पानी
फेर
दिया है। विश्वस्त सूत्रों
के
अनुसार स्थानीय प्रशासन ने इन्हें उत्तराखंड छोड़
देने की भी धमकी दी है। इतना कुछ हो जाने
केबाद
भी रोजा और पेडिला को यह आशा है कि उन्हें जरूर
सफलता मिलेगी। आखिर यह गांधी की भूमि है। इनकी
मांग है कि इन्हें मुआवजा राशि प्रदान की जाए।
इनकी संस्था ने स्थानीय नागरिकों को भी रोजगार
प्रदान किया है। पेडिला कहते हैं कि यदि इन्हें
मुआवजा राशि मिल जाएगी तो ये पुष्कर में ही
युवको को फुटबाल खेलने
के
लिए समुचित कैंपस बनाएंगे। संघर्ष की इन तमाम
कहानियों को खुद में समेटे रोजा-पेडिला शाम ढलते
ही मनोविज्ञान की किताबों में खो जाते हैं। जमीन
पर लेटे ये दोनों स्पेनी नागरिक गांधीजी
के
सच्चे अनुयायी की तरह लगातार संघर्ष
के
मूड में हैं।
आज की दुनिया में जहां गांधीजी
के
अहिंसा-सत्याग्रह
के
फार्मूले को हम सभी भूलते-बिसरते जा रहे हैं,
वहीं रोजा-पेडिला की जोड़ी
उसी दमखम से अहिंसा-सत्याग्रह
के
फार्मूले को अपने जीवन का हिस्सा बना चुकी है,
जैसा कि पहले गांधीजी अफ्रीका
और चम्पारण में किया था। रोजा-पेडिला के संकल्प
को देखते हुए यह लगता है कि आने वाले दिनों में
उनकी संस्था शाकाहार को विश्व पटल पर कुछ खास
अंदाज में सामने लेकर आएगी।
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