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 दिसंबर,  2007

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ये कैसी विदेश नीति

ऋतेश पाठक

भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी रूस की आधिकारिक यात्रा पर गए थे। लेकिन रूस के विदेश मंत्री को प्रणव दा से मिलना जरुरी नहीं लगा। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद हमारे प्रधानमंत्री सात साल से जारी भारत-रूस वार्ता के लिए मास्को गए। 'शिखर वार्ता' को दोनों देश कितनी गंभीरता से ले रहे थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 28 घंटे में यात्रा पूरी हो गई। ये हालात तब हैं जब भारत सरकार अपनी विदेश नीति को 'भारत के हितों के अनुसार' बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है।

चीन की सधी हुई प्रतिक्रिया थी कि वह म्यांमार को दूसरा ईराक बनने नहीं देगा। यह चीन के हिसाब से उसका स्पष्ट रुख था। दूसरी ओर भारत सरकार की चुप्पी हमारी नीतियों पर प्रश्न खड़ा करती रही। यह प्रश्न-चिन्ह और भी गहरा इसलिए हो जाता है कि दमन के केंद्र में वह नेता (आंग सान सू की ) थी जिन्हें खुद भारत सरकार ने 1999 ई. में नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किया था।

 

भारत-रूस संबंधों में आयी इस तल्खी ने कहीं न कहीं भारत-अमेरिका संबंधों की ओर इशारा किया। अधिकतर विश्लेषकों ने इस घटना को इन तीन देशों की सीमाओं में बां कर देखा। लेकिन हम अपने नजरिए को और विस्तार दें तो पाएंगे कि मामला सिर्पफ इन महाशक्तियों से संबंधों का नहीं बल्कि भारत की अस्पष्ट विदेश नीति का है। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि गुट-निरपेक्ष आंदोलन का पैरोकार देश दो महाशक्तियों के बीच पेंडुलम की तरह पड़ा है और विश्वमंच पर अपनी स्वतंत्र व तटस्थ उपस्थिति नहीं दर्ज करा पा रहा है।

 

पं. जवाहर लाल नेहरू, मार्शल टीटो और कर्नल नासिर की पहल पर लगभग 52 साल पहले बने गुट निरपेक्ष आंदोलन को एक सशक्त आवाज के रूप में देखा गया था। आधी सदी बीतने के बाद भी इसके अधिकतर सदस्य देश एक ्रुव की ओर आसक्त हुए तो इसे कहीं न कहीं कूटनीतिक तौर पर भारत की विफलता माना जा सकता है। आज आर्थिक व अन्य कारणों से भारत को उभरती महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है। उसकी यह दावेदारी और भी सशक्त होती अगर कूटनीतिक स्तर पर भारत और अधिक कौशल दिखाता।

आसियान, दक्षेस और कई अन्य अपेक्षाकृत छोटे मंच हैं जिन पर दमदार उपस्थिति दर्ज कराके भारत विश्व स्तर पर अपना महत्व बढ़ा सकता था। पड़ोसी देशों के मामलों में भारत की प्रतिक्रिया देखें तो उसमें आत्मविश्वास की कमी और ढुलमुल नीति की झलक मिलती है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत अशांत पड़ोसी देशों से घिरा हुआ है और उनके प्रति आत्मविश्वास भरी प्रतिक्रिया न रखना इसे पश्चिमी राष्ट्रों की तुलना में कमजोर करता है। दुनिया भर के राष्ट्र अपने पास-पड़ोस के बारे में स्पष्ट राय रखते हैं। ताजा-तरीन उदाहरण म्यांमार का लें। वहां जब सैन्य शासकों द्वारा लोकतंत्र समर्थकों का दमन हो रहा था तो जापान से अमेरिका तक ने जुंटा पर दबाव बनाया। चीन की सधी हुई प्रतिक्रिया थी कि वह म्यांमार को दूसरा ईराक बनने नहीं देगा। यह चीन के हिसाब से उसका स्पष्ट रुख था। दूसरी ओर भारत सरकार की चुप्पी हमारी नीतियों पर प्रश्न खड़ा करती रही। यह प्रश्न-चिन्ह और भी गहरा इसलिए हो जाता है कि दमन के केंद्र में वह नेता (आंग सान सू की ) थी जिन्हें खुद भारत सरकार ने 1999 ई. में नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस प्रकरण में कहा गया कि परस्पर व्यापार और पूर्वोत्तर में चरमपंथियों की नकेल कसने के लिए भारत को म्यामांर की सैन्य सरकार से रिश्ते मधुर रखने की जरूरत है। कुछ लोगों ने इसे म्यांमार का आंतरिक मामला मान लिया। अगर हम इतने ही सहमे हुए हैं तो कैसे महाशक्ति बनने का सपना देखते हैं।

अगर म्यांमार के प्रति भारत के इस रवैये को आंतरिक चरमपंथ और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समन्वय की पहल मान भी लें तो यह तथ्य एक बार फिर हमारी नीतियों में विरोधाभास दर्शाता है। अभी हाल ही में नेपाल में एक बार फिर सत्ता बदली है। अब सत्ता पर माओवादियों का दबदबा है। कहने की जरुरत नहीं कि आज भारत के 11 राज्य ( 250 से अधिक जिले ) इस विचारधारा के साये में पनपती अशांति के शिकार हैं। बावजूद इसके वहां इनकी ताजपोशी के लिए भारत सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधि भी गए और उनसे भी पहले वहां सरकार के सहयोगी-दल के नेता पहुंच गए। इसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के पीछे लिट्टे का हाथ बताया जाता है, किन्तु उन्हीं की पार्टी के नेतृत्व में बनी वर्तमान सरकार का एक घटक दल गाहे-बगाहे लिट्टे की प्रशंसा कर बैठता है। संभव है कि इसे गठबंन व्यवस्था की मजबूरी बताकर पल्ला झाड़ा जाए, लेकिन ये हालात पड़ोसियों के प्रति हमारे रवैये की दिशाहीनता स्पष्ट कर देते हैं।

हाल ही में प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति से द्विपक्षीय वार्ता के बाद इब्सा (भारत-ब्राजील-द. अफ्रीका ) शिखर सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। उम्मीद थी कि इस सम्मेलन में तीनों देश विश्व व्यापार संघ, संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों के लिए संयुक्त रणनीति की घोषणा करेंगे। लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। इस सम्मेलन में भी ज्यादा ध्यान परमाणु र्जा की ओर रहा। इस क्षेत्र में परस्पर सहयोग के लिए ब्राजील से भी पेशकश की गयी। दीगर बात है कि अमेरिका के साथ इसी क्षेत्र में किया गया करार विवाद का विषय बना हुआ है। अफ्रीकी देशों के साथ बुनियादी स्वास्थ्य, संचार और परस्पर व्यापार के बारे में कुछ समझौते जरूर हुए लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मजबूती के प्रयास होते नहीं देखा गया।

इराक, ईरान और अफगानिस्तान के मामलों में भारत सरकार ने जो फैसले लिए उन पर अमेरिका का साया स्पष्ट रूप से दिख रहा था। खासकर, ईरान के विरुद्ध आईएईए में मतदान अर्से पुराने सबंधों को ताक पर रखने जैसा रहा। जब भारत ईरान को परमाणु संपन्न होने से रोकने के लिए मत दे रहा था तब उसकी निगाह अमरीका से परमाणु तकनीक आयात करने पर टिकी थी। इन तीनों देशों के मामले में हमारी नीति अंतरराष्ट्रीय संबंधों को तात्कालिक रूप से जरूर प्रभावित करती रही। लेकिन, इन संबंधों पर सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे आत्मविश्वास और स्पष्टता का ही रहेगा। इसलिए जरूरी है कि भारत एशिया के रास्ते विश्वमंच पर अपनी आत्मविश्वासपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराए। यह इसलिए भी जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में हमसे कहीं आगे खड़ा चीन जब-तब एक बिगडैल पड़ोसी की भांति व्यवहार करने लगता है। अंतरराष्ट्रीय जनमत को अपने हिसाब से मोड़ने की क्षमता हासिल किए बिना उसे जवाब देना दुष्कर होगा। ईमेल: riteshinmedia@gmail.com

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