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करीब
205
वर्ष पूर्व यानी
11
अक्टूबर
1802
को केरल के वायनाड जिले की कुरुचिया जनजाति ने
अपनी परम्परा और आस्था बचाने के लिए अंग्रेजों
से जमकर संघर्ष किया। संघर्ष करने वालों के
नेता थे तलक्कल चन्दू और एडाचन कुनकन। तलक्कल
चन्दू छापामार युद्ध में बहुत कुशल थे।
इन्होंने ड्यूक आफ वेलिंग्टन की अंग्रेजी सेना
से घमासान युद्ध कर उसे करारी शिकस्त दी और
परमरम का किला जीत लिया। सिर्पफ
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वनवासियों की सेना ने इसी तरह
कन्नवम और मनंथवदी के जंगल में जंग करके
कमांडिंग अधिकारी डिकिन्सन और लेफ्टीनेन्ट
मैक्सवेल सहित अंग्रेजी सेना के
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सैनिकों का सफाया कर दिया। इसी के साथ तलक्कल
चन्दू की सेना को
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बन्दूकें और गोला बारूद की आधा दर्जन पेटियां
भी मिलीं।
अंग्रेजों के लिए काल बनकर आती
छापामार सेना थी तो छोटी-सी लेकिन इसकी वजह से
अंग्रेजों की बड़ी सेना भी घबराती थी। मैसूर से
वायनाड के बीच बावली में तलक्कल चन्दू ने ऐसे
हमले किए कि अंग्रेजी फौज आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके हमलों से परेशान मलाबार कलेक्टर ने
तलक्कल चन्दू पर राजद्रोह का आरोप लगाकर
गिरफ्तारी पर तीन हजार रु. का ईनाम घोषित कर
दिया। वनवासियों के हथियार धनुष-बाण और
भाले-तलवार थे जबकि अंग्रेजी फौज बन्दूकों से
सुसज्जित रहती। फिर भी नुकसान अंग्रेजों का ही
होता। कई वर्षों तक इसी तरह मुठभेड़ें चलती
रहीं। वनवासी वीर परम्परा और आस्था के लिए
जूझते और बलिदान होते रहे। युद्ध के साथ-साथ
वनवासियों में पर्याप्त चेतना आ चुकी थी।
इसलिए जब एक युद्ध में राजा पझसी और तलक्कल
चन्दू ने लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की तो भी
उनके साथियों ने कदम पीछे नहीं हटाये। मनंवदी
के जंगल में दोनों योध्दाओं की शहादत का
साक्षी विशाल बूढ़ा बरगद आज भी खड़ा है। इसी
स्थान पर
1805
में इनका अंतिम संस्कार हुआ था। |