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व्यंग्य |
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आइए प्लीज पुतला जलाइए |
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अशोक गौतम |
स्वयंभू लोकप्रिय अंतिम सांसें ले रहे थे। राजनीतिक
जीवन की नहीं,
दैहिक जीवन की। उम्र भर नास्तिक होने वाले आप अंतिम
चरण में भगवान के द्वारे जा पहुंचे। बचे-खुचे बजट भी
बंटने बंद हो गए। सारी फाइलों के टायर पंचर।
बस,
सरकारी बजट से मंदिरों में उनके
लौट आने
के
लिए पुजारी किराए पर किए गए। पुजारियों
के
हाथों आखिर चढ़ ही गया किसी
के
हत्थे न चढ़ने वाला। सो,
वे हिसाब पूरा करने में जुट गए।
नाई से और पुजारी से आज तक कौन बचा है?
भगवान ने ही पूछा था कल। कह रहे
थे-वे मुहल्ले
के
मंदिर से स्वर्ग जाना चाहते हैं। पर,
पुजारी छोड़े तब न! मंदिर
के
द्वार पर रात को एक नहीं,
चार-चार ताले जड़ जाता है।
सरकारी धन से आप जी
के
स्वास्थ्य लाभ
के
लिए मंदिर में महामृत्युंजय शुरू! पंडित माला
फेर
मनकों की गिनती में उलझा। जितने ज्यादा मनके
फिरेंगे,
उतनी ज्यादा पगार। घिसी-पिटी
घंटियों को फिर राजनीतिक संरक्षण मिला। आप जी
के
हरकारे हर मंदिर
के
बाहर,
आप जी
के
हरकारे हर मस्जिद
के
बाहर,
आप जी
के
हरकारे हर गुरुद्वारे
के
बाहर,
आप जी
के
हरकारे हर चर्च
के
बाहर। जनता से अपील-वह अपने लिए भगवान से दुआ मांगने
के
बदले आप जी
के
बचने की दुआ मांगे। आप स्वस्थ तो देश स्वस्थ,
आपके
पांव में देश का पांव! जय हो लोकतंत्र!
जो मुल्ला मांगे,
पलक झपकते हाजिर! जो पुजारी
मांगे, पलक झपकते हाजिर।
जो ग्रंथी मांगे, पलक
झपकते हाजिर। ईसाई ने
कुछ
नहीं मांगा। हरकारे अनेक,
पर उद्देश्य एक। आप जी को लोक
सभा में एक और टैन्योर मिल जाए तो चार पुश्तें तर
जाएं। भूखों को आप जी की ओर से खिलाने
के
लिए भूखी बस्ती में गया। टोकरा लड्डुओं का लिए
चबूतरे पर खड़ा हो मुल्ला बन पुकारा,
''आओ-आओ,
भूखे भाइयों
आओ,
भूखी उनकी पत्नियों आओ,
भूखी दादियों आओ,
भूखे दादाओं आओ! आप जी की ओर से
जी भर
के
लड्डू खाओ!''
पर भूखे नहीं आए! उन्हें पता ही
नहीं था कि लड्डू क्या होते हैं,
सरकारी पैसे वाले। उन्होंने ठान
लिया था कि जिसने उम्र भर उनका हिस्सा खाया है,
अब वे उसके
कल्याण
के
लिए लड्डू नहीं खाएंगे,
भले ही वे भूखे मर जाएंगे...
हाय! भूखों की बस्ती में लड्डुओं का अपमान! कोई दफतर
होता तो गत्तो का डिब्बा भी न मिलता।
किसी अनिष्ट की शंका और गहराई। सरकारी बजट का रुख
कुछ
और प्रार्थनाओं की ओर मुड़ा। पर खरीदी गई दुआएं,
बद्दुआओं से भी भयंकर होती हैं।
विपक्षी नहीं, आप जी
के
खासमखास ही कहते सुने गए।
तभी एक मसखरा आप जी
के
अधबंद
कान में फुसफुसाया,
'महाराज! बचे रहने का एक सिद्ध
उपाय है।'
'क्या??'
आप जी को संजीवनी की आस
बंधी।
'शास्त्रों में लिखा है कि यदि
मृत्यु शैया पर लेटे
के
पुतले जलाए जाएं तो वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है।
भगवान उसे दीर्घायु प्रदान करते हैं। सारी बीमारियां
उसके
दुश्मनों
के
राशन कार्ड में नाम लिखवा लेती हैं।'
'तो??'
पत्नी ने ज्यादा उठने से रोका।
'तो एक रास्ता ही शेष है
बस श्रीमंत!' 'पर मेरे
पुतले जलाएगा कौन? जनता
तो भूख, भ्रष्टाचार में
पहले ही जल चुकी है।' 'प्रभु
जीना है तो-उन्होंने तो कह दिया कि भगवान उनकी
प्रार्थनाएं सुनने में असमर्थ हैं। वे इन दिनों
डेंगू
के
डर से किसी से नहीं मिल रहे।'
पुन: आपातकालीन बैठक हुई। खूब मौज-मस्ती की हरकारों
ने। आखिर तय हुआ कि गरीबी
फूंकने
वाला बजट पुतले
फूंकने
पर लगाया जाए। बड़े तो अपना बजट छोड़ने से रहे। आप जी
रहेंगे तो गरीबी हटाओ आंदोलन तो फिर भी चलता रहेगा।
पर अगर आप जी न रहे तो?
उधर
टीवी,
अखबार वाले उन जी
के
जीवन वृत्ता को ढूंढने में पल-पल परेशान! सभी,
एक्सक्लूसिव
के
चक्कर में। प्रायोजकों ने साफ कह दिया था वे उन जी
का सब
कुछ
स्पांसर करेंगे,
पर हो आकर्षक! दर्शक वाह! वाह!
कर उठें। आकाशवाणी,
दूरदर्शन वाले भी पूरी तरह तैयार थे कि कल को
एक्सप्लेनेशन काल न हो। देखते ही देखते शहर में
पुतले जलाने
के
लिए लोग मजदूरी पर लाए गए। उन्होंने साफ कह दिया था
कि मुफ्रत में तो वे अपने बाप की चिता पर लकड़ी पाने
भी नहीं जाते,
ये तो गैर का पुतला जलाने का
सवाल है।... और देश पुतलों
के
जलने
के धुंए
से भर गया।
आप जी का एक फसली बटेरा गंदी बस्ती में गया,
बोला, 'हे
गंदी बस्ती
के
अच्छे लोगों! तुम्हें इन जी ने आज तक
कुछ
दिया?'
'नहीं।'
सब उसे पत्थर मारने को हुए ही कि
वह फिर बोला, 'ठहरो,
मैं तुम्हारी तरह का ही हूं।
भूखा, नंगा।'
वे रुक गए। 'तो??'
'तुमने कभी इनका पुतला जलाया?'
'चूल्हा जलाने को पैसे नहीं,
बेकार का पुतला गधो क्यों जलाएं?'
'कोई बात नहीं! पैसे मैं दूंगा!
पुतला तुम जलाओगे!
फिर
मिलकर खाएंगे...'
'क्या?' 'जो
तुम खाते हो।' 'हम तो
कुछ
नहीं खाते। खाने वाले तो दूर
कुर्सियों
पर हैं।'
उसने पैसे दिये,
उन्हें कम लगे तो वे गुर्राये!
उसने
कुछ
पैसे और दिये। फोटो दिया,
ताकि गलत पुतला न जल जाए।
...पूरी बस्ती में पुतले जलने लगे। बौने-बौने
आधो-पौने। चमत्कार! पुतले जलने
के
साथ कई पुतले जिंदा हो उठे। ये
कैसी
मिट्टी है देश की?
भय जलाने पर भय पनपता है। भूख
जलाने पर भूख पनपती है। भ्रष्टाचार पनपता है पर जमीन
में बीज डालने पर
फसल नहीं पनपती। सभी ने चैन की
सांस ली। उन्होंने कसम खाई कि अब वे जनता को
कुछ
भी
फूंकने
से नहीं रोकेंगे।
पुतलों में मृत संजीवनी होती है। रावण को ही देख
लीजिए।
पर मुझे तो यह बहुत पहले से पता था भाई साहब! और
आपको?
संपर्क:
गौतम निवास,
अप्पर सेरी रोड,
नजदीक वाटर टैंक,
सोलन (हि.प्र.)
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