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पुस्तक
:
घर-बेघर
लेखिका : कमल कुमार
प्रकाशक : पैंग्विन बुक्स |
कमल कुमार के कहानी संग्रह
'घर
बेघर'
में बारह कहानियां हैं। इन कहानियों में विषय की
दृष्टि से काफी विविधता है। लेखिका ने काल्पनिक
दुनिया के बजाए कहानियों के विषय का ताना-बाना
वास्तविकता के धरातल पर बुना है। कुछ कहानियों में
तो स्थिति को इस तरह बयां किया गया है कि सारी घटना
आंखों के सामने साक्षात दिखने लगती है। दरअसल,
इस कथा संग्रह के हर कहानी में सामाजिक सरोकार की
छाप है।
जीवन जीने की उत्कंठा को
'अपराजेय'
कहानी के जरिए व्यक्त करने की
कोशिश की गई है। वस्तुत: इस कहानी में लेखिका ने
पाठकों को जीवन के सार से रूबरू कराया है। सुख और
दुख जीवन के दो पहलू हैं। कोई अगर दुख में भी सुख सी
अनुभूति करे तो उसका जीवन सफल हो जाता है। वह कभी
हार नहीं सकता, अपराजेय
होकर दुनिया से कूच करता है। 'घर-बेघर'
कहानी में जीवन की जटिलताओं और
उनसे उपजी विवशताओं का काफी अच्छा बखान किया गया है।
इसमें यह बताया गया है कि घर में रहते हुए भी
व्यक्ति कैसे बेघर हो सकता है। यह कहानी युवाओं में
पनपती पलायन की भावना पर भी चोट करती है। अन्य
कहानियों में भी कमल कुमार ने अलग-अलग ज्वलंत
मुद्दों को काफी संजीदगी से प्रस्तुत किया है।
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पुस्तक :
सूरजू के नाम
लेखिका : जयवंती डिमरी
प्रकाशक :भारतीय ज्ञानपीठ
मूल्य :
65 रुपए
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जयवंती डिमरी के उपन्यास
'सूरज के नाम'
में भूटान के उस दुर्गम प्रदेश
का चित्रण किया गया है,
जहां जीवन आसान नहीं है। एक आप्रवासी मजदूर स्त्री
के जीवन में आने वाली मुश्किलों से लेखिका ने पाठकों
को रूबरू कराया है। वस्तुत: उपन्यास का कथानक काफी
सहज नहीं है। फिर भी इस उपन्यास में लेखिका ने एक
ऐसी औरत के संघर्ष का वर्णन किया है,
जो किसी नारीवाद की पैरवी न करता
हुआ वस्तुस्थिति से पाठकों को अवगत कराता है। आज भी
समाज में महिलाओं को दोयम दर्जा ही हासिल है। इस
दुर्भाग्यपूर्ण हालात पर भी यह उपन्यास चोट करता है।
उपन्यास की मुख्य पात्र सुकूरनी दुनिया से जूझती एक
मां के रूप में दिखाई देती है,
लेकिन यह युवा एकाकी मां सहारे
की आस में बार-बार छली जाती है। यह जानते हुए भी कि
यही उसकी नियति है, वह
अपने बेटे सूरजू के लिए खुली पलकों से सपने देखने
में भी नहीं हिचकती है। लेखिका ने भूटान में अध्यापन
कार्य किया है इसलिए उपन्यास में पूर्वी भूटान का
परिवेश और लोकाचार स्वाभाविक रूप से वर्णित है।
उपन्यास के संवादों में हिन्दी,
नेपाली,
बोडो और भूटानी के शब्दों को भी
समाहित किया गया है। इनके जरिए उपन्यास और भी सजीव
हो गया है।
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पुस्तक
:
चोर पुराण
लेखक : विमल कुमार
प्रकाशक : पैंग्विन बुक्स
मूल्य :
150 रुपए
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मूलत: कवि और पेशे से पत्रकार विमल कुमार की पुस्तक
चोर पुराण आई है। इसे पैंग्विन ने प्रकाशित किया है।
इस पुस्तक में लेखक चोरों को एक मानवीय और
संवेदनात्मक धरातल पर रखते हुए अपनी बात कहता है।
लेखक पूरी पुस्तक में चोर के जन्म से लेकर उसके
प्रेम और काम-धंधो तक की जीवन प्रक्रिया पर किस्से
सुनाते हुए मौजूदा व्यवस्था पर टिप्पणी करता प्रतीत
होता है।
लोगों में घोर निराशा का संचार कर रही व्यवस्था पर
बडे ही
धारदार
अंदाज में टिप्पणी की गई है। राजनीतिक से लेकर
सामाजिक व्यवस्थाओं पर भी लेखक ने बड़े तीखे अंदाज
में प्रहार किया है। एक जगह लिखा गया है,
'चोरी की जा सकती है। लेकिन चोर
यह समझ नहीं पाया कि अगर कोई रायल्टी चोरी करता है
तो उसे चोर न कह कर प्रकाशक क्यों कहते हैं और फिर
बड़े-बड़े लेखक उसके आगे-पीछे क्यों घूमा करते हैं।'
पत्रकार होने के नाते विमल कुमार
ने सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को करीब से देखा
है। इस दौरान प्राप्त अनुभवों का असर इस पुस्तक में
दिखता है। पूरी पुस्तक में लेखक का व्यवस्था के
प्रति मोहभंग स्पष्ट झलकता है। |