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विविधा |
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लोक-कहावतों में
खेती ज्ञान के स्वर |
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'जगन्नाथ
विश्व' |
भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने-अपने भाव,
भाषा एवं वेशभूषा के अनुरूप लोक-कहावतें जन-जन के
मुख पर आती रहती हैं। इन कहावतों में मानवीय जीवन की
प्रत्येक हलचल का सही चित्रण हमें देखने को मिलता
है। ऐसी ही कुछ कहावतें हैं जिनमें स्वास्थ्य,
खेती सुधार,
उपज वृद्धि व कूट-कूट कर भरे पड़े हैं।
किसान अच्छे पशु को शुभ मानता है। इसलिए पशु की
पहचान होना आवश्यक है,
क्योंकि हमारी पारंपरिक ग्रामीण
अर्थव्यवस्था में पशुओं का काफी महत्व है।
वरद विसावन जावों कंता,
खेरा का जिन देखा दंता
कहां परे खैरे की खरी,
तो फर डाले चपरा पूरी
जहां परे खेत की लार,
बढनी लेके बहारों सार
अर्थात् बैल खरीदते समय खेरे किस्म के बैल के
दांत-नहीं देखें,
क्योंकि खेरे बैल की जहां खुर पड़
जाती है वहां सर्वनाश हो जाता है। कहा जाता है कि
जहां खेरे बैल की लार पड़ जाए वहां तुरंत साफ कर देना
चाहिए वरना भयानक रोग दूसरे जानवर को लग जाएंगे।
सींग गिरेला जानवर और मनई कोड़
यह नीके ना होयगें करलो जतन करोड़
कहावत में कहा गया है कि गिरे हुए सींग के जानवर तथा
आलसी मनुष्य कभी अच्छे नहीं होते। दोनों सदा बीमारी
के घर रहते हैं। कवि शिरोमणि तुलसीदासजी ने एक स्थान
पर उत्तम
खेती के लिए लिखा है-
अति
ऊंचे भू-धरन
पर भुजगन के स्थान
तुलसी अति नीचे सुखद उंख अन्न असपान
खेती ऐसे
ऊंचे स्थानों पर करनी चाहिए जहां पर सांप
रहते हों,
पहाड़ों के ढाल पर उंख हों,
वहीं पर अन्न और पान की अच्छी
फसल होती है।
बोनी का भी अपना महत्व है। खेती का प्रकृति से सीधा
संबंध
है। प्रकृति के नियमानुसार बोनी का मुहुर्त बड़ा शुभ
और हितकारी होता है। यही भाव इस कहावत में देखा जा
सकता है।
बुद्ध
वृहस्पति दो भले,
शुक्र न भला बखान
रवि,
मंगल बोनी करे,
द्वार न आवे
धान
अर्थात-धान
की बुवाई हेतु बुद्ध
और गुरु शुभ दिन हैं। शुक्र अशुभ है। अगर रविवार और
मंगल को
धान
बोया जाएगा तो उपज नहीं के समान होगी ऐसा लोकमत है।
भादो की छटी चांदनी जो अनुराधा
होय
उबड़-खाबड़ बोय दे,
अन्न घनेरा होय
कवि ने अपनी लोकोत्ति में स्पष्ट कहा है कि भादो
सुदी छट को अनुराधा
नक्षत्र हो तब अनुपजाउ
धरती
में भी
धान
बो देने से उपज हो जाती है। इसी प्रकार यह भी कहावत
अनुकरणीय है-
असाड़ जोतो लड़के ढार,
सावन भादो हरवा है
क्वांर जोतो घर का बैल,
तब उंफचे उनहारे।
अर्थात-किसान को चाहिए कि आषाढ माह में साधारण
जुताई करें। सावन भादो में उससे अधिक,
परन्तु क्वांर में इतनी अधिक
जुताई करें कि उसे दिन-रात का भान ही न रहे,
तभी तो अच्छी और अधिक
उपज होगी।
खेती पर ही मानव जीवन निर्भर है। अच्छी किस्म की
पैदावार के लिए खेती में खाद के महत्व को भी लोक
कवियों ने कहावतों में मुखरित किया है। जैसे,
खेती करे खाद से भरे,
सो मन कोठी में ले
धरे
खाद
पड़े तो होवे खेती,
नहीं तो रहे नदी की रेती
खेती करने वालों को चाहिए कि खेत में खूब खाद डालें।
बिना खाद के तो जमीन सूखी नदी की रेत के सामान रहती
है। इसलिए खेती में दाना पड़ने के पूर्व खाद का पड़ना
आवश्यक है।
कवि रहीम ने अपने एक दोहे में इस संबंध
में कहा है कि अगर खेत में खाद आदि डाल दिया जाएगा
तो खेती में प्रभावशाली उपज होगी। खाद एक ऐसी वस्तु
है जिसके आगे भाग्य टल सकता है। अर्थात दुर्भाग्य को
सौभाग्य में बदलने के लिए किसान खाद के महत्व को कभी
न भूले। हमारे ग्रामीण किसान प्रकृति के नियमों से
सदैव ही जुडे रहे हैं। जमीन में कब कितना और कौन सा
अन्न बोना चाहिए इसका ज्ञान भी उन्हें इन लोक
कहावतों से मिलता है। इन्हीं भावों का परिचय देती एक
कहावत है-
जो बोये गेहूं पांच पसेरी,
मटर के बीधा तीन सेर
बोये चना
पसेरी तीन,
सेर तीन जुबारी कीन्ह
दो सेर मेथी अरहर माल,
डेढ सेर बीघा बीज कपास
पांच
पसेरी बीघा
धान,
खूब उपज भर कोटिला
धान
अर्थात् प्रति बीघा में पांच पसेरी गेहूं बोना
चाहिए। मटर तीन सेर। चना तीन पसेरी। ज्वार तीन सेर।
अरहर और उड़द दो सेर। डेढ़ सेर कपास एवं
धान
पांच पसेरी बोया जाए तो अनाज की इतनी अधिक
उपज होगी कि आपके बखार भर जायेंगे।
खेती-बाड़ी के विकास में औजारों का भी महत्व कम नहीं
है। उत्तम
खेती के लिए औजारों पर लोककवि ने बड़ा बल दिया है।
भई हल लगा बस पाताल
न पड़े जगत और घर काल
लोककवि कहता है कि व्यक्ति और समाज दोनों प्रसन्न
सुखी रहें इसलिए कर्मठ किसानों को धरती में हल को
खूब धांसा कर जमीन जोतना चाहिए। यदि सब ऐसा करें तो
कहिए इस संसार में अकाल कैसे पड़ सकता है?
इस प्रकार ग्रामीण जीवन में ऐसी
बहुत सी लोक-कहावतें हैं जिनमें कृषि विकास एवं
पशुधन के रख-रखाव हेतु व्यावहारिक अनुभवों के आधार
पर
उन्हें खेती बाड़ी का ज्ञान मिलता रहा है।
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