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 दिसंबर,  2007

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वादे हैं वादों का क्या! नारे हैं नारों का क्या

सीतेश आलोक

सुना होगा आपने... हर आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादी को दो लाख रुपये के डिपाजिट के साथ दो हजार रुपए प्रति माह की सहायता राशि दी जाती है। जबकि परमवीर चक्र पाने वाला देश का जांबाज सैनिक 166 रुपए प्रतिमास की पेंशन पाता है। है न मेरा भारत महान!

भारत एक गरीब देश है। यहां गरीबी दूर करने का वादा लगभग हर राजनैतिक पार्टी ने दुहराया है। बारंबार दुहराया है। कांग्रेस नेताओं और संविघान रचनेवालों ने समाजवाद का नारा दिया। सबको समान अधिकार देने का वादा किया। लेकिन ये 'नारे हैं नारों का क्या' और 'वादे हैं वादों का क्या!'

याद आता है, किसी बाप ने मरते समय अपने बेटों को शिक्षा दी थी कि मिलकर रहना। एकता में ही सुरक्षा है, शक्ति है। लेकिन अब बाप की सुनता कौन है! आधुनिकता सिखाती है- हां जन्म दे दिया, ठीक है। अब पैसा दो। मुझे अपने ढंग से जीने की आजादी दो।

 

देश की प्रगति पर राजनीतिज्ञ गद्गद हैं आठ, नौ और दस प्रतिशत विकास दर की बातें होती हैं। क्या आपको मालूम है, विश्व के बीस सबसे अमीर लोगों में तीन इस देश के हैं, इस गरीब देश भारत के चार अमीरों के पास इतनी सम्पत्ति है जितनी कि चीन के चालीस सबसे अमीर लोगों के पास है।

और गरीब! उनकी गरीबी भी तेजी से बढ़ रही है। आपने चौराहों पर भीख मांगते बच्चों को देखा है? अगर आपके सीने में हृदय की जगह किसी बेकार ईंट का टुकड़ा नहीं पड़ा है तो देखा ही होगा... अब दस बरस के बच्चे की गोद में दो-तीन माह के बच्चे भी भीख मांगना सीख चुके हैं। उन्हें जन्म लेते ही अपना नन्हा हाथ उठाकर माथे से लगाना सिखाया जाता है। कुछ संवेदनशील लोग अब भी बचे हैं, जो यह देखकर आंसू नहीं रोक पाते।

और दूसरी ओर, करोड़पतियों, अरबपतियों के बच्चे बचपन से ही अपने साथियों के साथ दादागीरी करना सीखते हैं। कुछ ड्रग्स लेते हैं

 तो कुछ चमचे बनाते हैं, सड़क पर और क्लबों में नियम-कानून तोड़ते हैं। किसी को मारना, किसी को कुचलना, किसी को अपमानित करना और किसी को रात भर के लिए उठवा लेना उनका खेल बन जाता है।

यह समाजवाद है सबको बराबर का अधिकार... हां वोट देने का अधिकार सभी को है।

देश की प्राचीनतम वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यही है कि वह जन्म के आघार पर आ टिकी थी-यद्यपि मूल व्यवस्था में ऐसा कोई विधन नहीं था। मैं पूछता हूं कि आज क्या हो रहा है? अमीर का बेटा और अमीर, गरीब का बेटा और  गरीब जबकि नेता का बेटा जन्मजात नेता।

राहुल गांधी की ताजपोशी हो चुकी है। क्या हैं राहुल गांधी? हां, राजीव का बेटा। वह राजीव जो कहीं और नौकरी करते-करते सहसा इसलिए राजनीति में खींच लिए गए थे कि प्रघानमंत्री इंदिरा गांधी के मनोनीत उत्तराधिकारी पुत्र संजय गांधी की अचानक मृत्यु हो गयी। और क्या थे संजय? शिक्षा-दीक्षा में असफल होने के बाद जब उद्योगपति बनने में भी असफल हुए तो निर्णय लिया गया कि प्रघानमंत्री बन सकते हैं।

समाचार पढ़ा- राहुल गांधी ने बच्चों के साथ फिल्म देखी। आहा! कितना महत्वपूर्ण, कितना बड़ा समाचार है। कुछ समाचार पत्रें ने पहले पृष्ठ पर उसे छापा। न्य हैं पत्रकार, न्य है पत्रकारिता। पढ़कर मन और भी न्य हुआ जब एक समाचार पत्र में वही समाचार चौथे पृष्ठ पर भी छपा दिखाई दिया।

पत्रकारिता नित्य ही नये कीर्तिमान स्थापित करती दिखाई देती है। एक फिल्म स्टार ने क्रिकेट मैच देखा। एक मैच देखने वह नहीं आया। एक फिल्म स्टार को वायरल हो गया। विदेश की एक माडल गर्भवती है। एक माडल ने प्रेमी बदल लिया, हैं न ये सब महत्वपूर्ण समाचार! पढ़कर हम सब न्य होते रहते हैं, यही प्रगति है, यही आधुनिकता है।

नन्दीग्राम खबरों में है। वहां वामदलों की दादागिरी सैकड़ों की जान ले चुकी है। भय और आतंक का वातावरण बना हुआ है। लेकिन वामदलों को चिन्ता गुजरात की है... मोदी की है। मोदी को फिर नहीं आना चाहिए। खरीदो, खरीदो, खरीदो। मोदी से असन्तुष्ट विघायकों को खरीदो। गोरा काण्ड को उछालो। नहीं रेल-डिब्बे में जलाए गए निर्दोष लोगों की बात न करो, बस आक्रोश में मारे गए वोट बैंक के लोगों की चर्चा करो।

पड़ोसी देश पाकिस्तान बारूद के ढेर पर बैठा है। बामियान में बुद्ध की प्रतिमा तोड़ने के बाद पाकिस्तान में भी बुद्ध की प्रतिमा खंडित की गयी। हमारे बौद्ध भाई अब भी समझते हैं कि वे अपने आप को समाज से पृथक रखकर सुरक्षित रहेंगे। याद आता है, किसी बाप ने मरते समय अपने बेटों को शिक्षा दी थी कि मिलकर रहना। एकता में ही सुरक्षा है, शक्ति है। लेकिन अब बाप की सुनता कौन है! आधुनिकता सिखाती है- हां जन्म दे दिया, ठीक है। अब पैसा दो। मुझे अपने ढंग से जीने की आजादी दो।

पाकिस्तान में मुशर्रफ ने जो कुछ किया तानाशाही ढंग से किया। लेकिन मुशर्रफ ने पहली बार कट्टरपंथी आतंकवादियों के विरुद्ध कोई ठोस कदम उठाया। हम जितना चाहें मुशर्रफ को कोस लें, बुश को कोस लें। लेकिन, पाकिस्तान में क्या प्रजातंत्र जीवित रह सकता है? पिछले साठ वर्षों में वहां आधो से अधिक समय तक सैनिक शासन रहा है। इमरजेंसी का इतना विरो क्यों? यदि इमरजेंसी इतनी घृणित व्यवस्था है तो संविघान में इसका प्रावघान ही क्यों है? और प्रजातंत्र ही क्यों विकल्प है, वह प्रजातंत्र जो भ्रष्ट नेताओं को ही चुनकर देश चलाने का अवसर देता रहता था। जिसमें न्याय व्यवस्था जन-साघारण की पहुंच से बहुत दूर, बहुत दूर होती है। जहां अपराधी किसी को सताकर, खुले आम मकी देता है- 'क्या कर लोगे तुम मेरा? कोर्ट के इतने चक्कर लगवाउंफगा कि एड़ियां घिस जाएंगी तुम्हारी।'

प्रजातंत्र की न्याय व्यवस्था महंगी है और न्याय के लिए बरसों तरसती भी है। कभी दस साल, तो कभी बीस साल या कभी मृत्यु पर्यन्त। देश में आतंकवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। आतंकवादियों के हौसले बुलन्द हैं। हाल ही में लखन, वाराणसी और फैजाबाद में विस्फोट हुए। ये तब तक होते रहेंगे, जब तक हम आतंकवाद की जड़ तक पहुंचने का साहस नहीं जुटाएंगे। लेकिन जब तक वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति है, यह असम्भव है।

सुना होगा आपने... हर आत्मसमर्पण करने वाले आतंकवादी को दो लाख रुपये के डिपाजिट के साथ दो हजार रुपए प्रति माह की सहायता राशि दी जाती है। जबकि परमवीर चक्र पाने वाला देश का जांबाज सैनिक 166 रु. प्रतिमास की पेंशन पाता है।

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