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विविधा |
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भीड़ की भड़ास |
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विजय कुमार
मिश्र |
व्यक्ति और समाज से भीड़ प्रभावित
होती है या भीड़ से व्यक्ति और समाज?
यह एक जटिल प्रश्न है,
इसकी अनेक परतें और गुत्थियां हैं।
हाल के दिनों में अनियंत्रित भीड़ के व्यवहार से
संबंधित अनेक घटनाओं ने इस विषय की ओर लोगों का
ध्यान खींचा है। समाचार-पत्रें और मीडिया के अन्य
माध्यमों के साथ-साथ विचार-विमर्श और चर्चा के अनेक
मंचों पर इसकी गूंज गाहे-बगाहे सुनाई देती रही है।
बिहार के भागलपुर और पटना के साथ-साथ देश के
सर्वाधिक साक्षर समझे जाने वाले केरल राज्य के
मालापुरम जिला के एडप्पल बाजार में महज चोरी की कुछ
घटनाओं की प्रतिक्रिया में लोगों की भीड़ ने निर्दयता
और क्रूरता से आरोपियों की पिटाई की है। यह लोगों की
बढ़ती अधीरता और खोते नियंत्रण की सूचना देने के
साथ-साथ भीड़ के मनोविज्ञान को समझने के कुछ सूत्र भी
थमा जाता है। एडप्पल में तो जिन तीन आरोपी महिलाओं
की पिटाई की गई उनमें एक गर्भवती महिला की चीख और
पीड़ा भी शामिल है। यह व्यक्ति और समूह की
संवेदनहीनता के साथ-साथ व्यवस्था से तंग लोगों के
आक्रोश और उसकी छटपटाहट को भी उद्घाटित करता है।
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मगर हाल के दिनों में रैलियों और
प्रदर्शनों में विशेष प्रबंध
के तौर पर या यों कहें कि भाड़े की भीड़ की
व्यवस्था की जाने लगी है। यही कारण है कि अनेक
रैलियों और प्रदर्शनों के दौरान भीड़ अनियंत्रित
हो उठती है और भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती है। |
सवाल उठता है कि क्या चंद लोगों के
समूह के द्वारा किसी सार्वजनिक स्थल पर तोड़फोड़ और
सार्वजनिक सम्पत्तियों को क्षति पहुंचाने जैसा काम
ही भीड़ के जिम्मे है या फिर भीड़ का उद्देश्य तथा भीड़
का नेतृत्व करने वाले लोगों का दायित्व कहीं और अधिक
बड़ा है?
इस देश
में व्यवस्था इतनी अधिक
लचर है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और जायज मांगों की
ओर
ध्यान
देने की बजाए उन्हें अनसुना कर दिया
जाता है। कुछ मामलों में भीड़ का व्यवहार वाकई
चिन्ताजनक है,
जिससे
कानून को सख्ती से निपटना चाहिए नहीं तो समाज और देश
की सुरक्षा व्यवस्था को वाकई बड़ा खतरा पैदा हो सकता
है।
कुछ दशक पहले तक राजनैतिक दलों के
नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा लोगों के समूह या भीड़
को अनुशासित तरीके से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में
शामिल करते हुए सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में उनकी
भागीदारी को सुनिश्चित किया जाता था। उन दिनों
राजनैतिक दलों के कार्यक्रमों और रैलियों में आने
वाले लोग किसी राजनेता या उसके विचारों से प्रभावित
और प्रेरित होते थे। इस तरह वे राष्ट्रीय-सामाजिक
मिशन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल होते
थे। मगर हाल के दिनों में रैलियों और प्रदर्शनों में
विशेष प्रबंध
के तौर पर या यों कहें कि भाड़े की
भीड़ की व्यवस्था की जाने लगी है। यही कारण है कि
अनेक रैलियों और प्रदर्शनों के दौरान भीड़ अनियंत्रित
हो उठती है और भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती है। यहां
तक कि लोग अपने नेताओं के निर्देशों की भी
धज्जियां
उड़ाने लगते हैं। राजनीति में गुंडों और अपराधियों
के बढ़ते दखल से भी देश की सामाजिक व्यवस्था और
संतुलन पर विपरीत असर पड़ा है। लोगों के लिए
गुंडागर्दी,
अपराध
और उपद्रव शर्म का नहीं ग्लैमर का
विषय बन गया है। अधिकारियों
के व्यवहार और उनकी मनमौजी के शिकार लोगों की
मानसिकता में परिवर्तन करना भी जरूरी है। तमाम
सरकारी और सत्ता
प्रतिष्ठान से जुड़ी खामियों और अनियमितताओं के चलते
लोगों का धौर्य जवाब देने लगा है। ऐसे में भीड़ की
भड़ास को प्रकट करने वाली तमाम घटनाओं से भारतीय समाज
की अधीरता
का ही पता चलता है।
वास्तव में मीडिया के बढ़ते दखल और
उसकी उपस्थिति से भी भीड़ को ऐसी घटनाओं को अंजाम
देने का प्रोत्साहन मिला है। घटनाओं और
प्रतिक्रियाओं के जरिए भीड़ या जनसमूह मीडिया के माध्यम
से अपनी बात उन अधिकारियों,
नेताओं और मंचों तक पहुंचाने में
सफल हो जाती है, सामान्य
तौर पर जहां तक अपनी बात पहुंचाना स्वर्ग तक सीढ़ियां
बनाने सरीखा है। इस प्रकार भीड़ के भड़ास की इन
प्रवृत्तियों का विकास बदलती सामाजिक परिस्थितियों,
संवेदनाओं और बदलते सरोकार के
साथ-साथ तकनीकी विकास,
मीडिया के बढ़ते प्रभाव और देश की राजनीतिक व्यवस्था
में आए बदलाव के कारण भी हुआ है। हमने इस देश में
लोकतांत्रिक व्यवस्था को तो अपनाया मगर जीवन और
व्यवहार में उसे लागू करने के लिए जरूरी कदम नहीं
उठाए। ऐसी समस्याओं और अव्यवस्थाओं से निपटने के
लोकतांत्रिक तरीकों की जानकारी लोगों को नहीं दी।
लोकतांत्रिक प्रशिक्षण के इस अभाव के कारण ही बिहार,
उत्तर
प्रदेश,
कश्मीर,
असम जैसे राज्यों में ही नहीं,
देश के
सर्वाधिक
साक्षर राज्य केरल में भी ऐसी घटनाओं को हम रोक नहीं
पाते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतांत्रिक
प्रशिक्षण की प्रक्रिया और तरीकों का प्रभावी और
जोरदार तरीके से प्रचार-प्रसार हो और साक्षरता के
मिशन में लोकतांत्रिक प्रशिक्षण को महत्वपूर्ण स्थान
मिले। अन्यथा भीड़ की भड़ास के भय से उपजते संकटों को
झेलने के लिए भविष्य में भी देश को तैयार रहना होगा।
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