भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 दिसंबर,  2007

पिछले अंक

हमारे बारे में

संपर्क करें

सदस्य बनें

 विविध स्थाई स्तंभ

 संपादकीय

 चलती चक्की देखके

 भारतगाथा

 कहानी

 पुस्तक परिचय

 व्यंग्य

अपना ई- मेल देखें

 जी-मेल

 हाट-मेल

 याहू-मेल

 रेडीफ-मेल

 सिफी-मेल

हिन्दी समाचार-पत्र

 अमर उजाला

 जागरण

 भाष्कर

 नवभारत टाइम्स

 प्रभासाक्षी

 सहारा समय

 बी.बी.सी हिन्दी

भारत विकास संगम-2008

 घर बचओ- देश बचाओ अभियान

 

 आवरण कथा 

आर्थिक असमानता की आग

 

भारत आज एक उदीयमान एशियाई ताकत और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) महाशक्ति माना जा रहा है। यहां करोड़ों-अरबों डालरों की सम्पत्ति वाले धन्नासेठों की संख्या में तेज गति से वृद्धि हो रही है। लेकिन यहीं दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब भी निवास करते हैं और यह मानव विकास सूचकांक के लिहाज से एक फिसड्डी देश बना हुआ है। यहां प्रति व्यक्ति आय आज भी काफी कम है। बेलगाम धन लिप्सा और भौंडी दिखावेबाजी में लिप्त एक छोटे से उपरी हिस्से तथा सारी सम्पदा पैदा करने के बावजूद दरिद्रता के अंधकार में डूबे विराट जनाघार के बीच का यह क्रूर विरोधाभास एक बेहद असंतुलित और विकास की खोखली रणनीति का नतीजा है। कृषि देश की बहुसंख्यक जनता के लिए आजीविका और रोजगार का स्रोत है। 

   
 

वंचितों और आदिवासियों की यात्रा के दिन ही दिल्ली में मैराथन दौड़ भी आयोजित की गई थी। जनादेश यात्रा में शामिल हुए सत्याग्रहियों का सूखा चेहरा भारत के सत्तर फीसदी आबादी की तस्वीर पेश कर रहा था, जो कदम-कदम पर संघर्ष और त्याग का जज्बा लिए आगे बढ़ रहे थे। राजनीतिक हलकों में वह तब भी महत्व नहीं पा सकी जब वह ग्वालियर से दिल्ली की तीन सौ किलोमीटर से ज्यादा लंबी यात्रा पूरी कर चुकी थी। वहीं पर दिल्ली मैराथन ने हमारे देश के बीस प्रतिशत नवनाढयों, पूंजीपतियों और फिल्मी नायकों का प्रतिनिधित्व किया। इस यात्रा में टीना अंबानी, प्रियंका चोपड़ा और ढेर सारे चमकते चेहरे शामिल हुए।

किन्तु, आज यह संकट और उपेक्षा के दौर से गुजर रही है। खाद, बीज, पानी आम किसानों को उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यदि हो रहा है तो उनकी पहुंच के बाहर है। कृषि को दिनों दिन गिरावट की तरफ धकेला जा रहा है। भारत के परंपरागत उद्योग ठहराव के शिकार हैं। क्योंकि बहुराष्ट्रीय देशी-विदेशी कंपनियों का वे मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। वहीं आज ऐसे सेक्टर विकासमान हैं जो निर्यात बाजार से जुड़े हैं और अभिजात्य उपयोग की जरूरतों को पूरा करते हैं। हमारे प्राकृतिक और मानवीय संसानों को लगातार बड़े पूंजीपतियों के लिए खोला जा रहा है।

आज कृषि और रियल एस्टेट पूंजीपतियों के लिए खासा रुचि का विषय बन गया है। अपने देश में जिस तरह से असंतुलित विकास हो रहा है, उसका एक बड़ा कारण असमान भूमि वितरण है। 90 फीसदी खेतिहर ग्रामीणों को विकास के हाशिए पर केलने का कुचक्र शुरू हो गया है। सरकारी योजनाओं की असफलता के कारण  बेरोजगारी  बढ़ती ही जा रही है। बावजूद इसके आज भी इस देश में शासन लगातार यह साबित करने में जुटा है कि गरीबी, भुखमरी, पलायन और बेरोजगारी का एकमात्र हल औद्योगिक विकास है। यह विडंबना ही है कि भारतीय रिजर्व बैंक के साथ-साथ एशियन विकास बैंक और विश्व बैंक सहित संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम तक यह लगातार दुहराते रहे हैं कि कृषि आधारित विकास के बिना गरीबी उन्मूलन संभव ही नहीं है।

 देश में गरीबी के अपने मिथक और यथार्थ हैं। हरित क्रान्ति और सामुदायिक विभाग कार्यक्रम के बावजूद आज भी पांच लाख गांव उपेक्षा के मारे हैं। लोग मुगालते में हैं कि अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित उछाल के साथ देश तरक्की कर रहा है। पलायन, भुखमरी, हिंसा और अपराधीकरण के लगातार उंफचे उठते ग्राफ से चिंता न हो तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? भूमि वितरण प्रणाली की असमानता और भूखमरी के कारण ही संगठित विद्रोहों का जन्म हुआ। भूमि वितरण के मामले में अपने देश की तस्वीर बहुत भयावह है। भूमि सुघार की तमाम योजनाएं आज तक कार्यान्वित नहीं हो सकी हैं।

भूमि, पूंजी और प्राकृतिक संसानों पर आज एक वर्ग का कब्जा होता जा रहा है। सिध भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर यह विभाजन लगातार चौड़ा होता जा रहा है। अपने हिस्से की आजादी और रोशनी के लिए उम्मीद लगाए बैठी जनता जब हुक्मरानों का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींच पाती, तब वह स्वयं कुछ करने को तैयार हो जाती है। नक्सली हिंसा के विरोधी हुक्मरानों एवं वोटों की बाजीगरी दिखाने वालों को कभी उनका खयाल नहीं आता है। सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी नक्सली हिंसा देश में बढ़ती जा रही है। कारण साफ है, जिस आघार पर नक्सली आंदोलन खड़ा है, सरकार लगातार उस बात को मानने से इनकार करती रही है। गुलामी की स्पष्ट रातों के बाद आजाद मुल्क में उजालों की उम्मीद कर उन्होंने न तो कोई गुनाह किया है और न ही यह उन लोगों की बेजा ख्वाहिश है। मुख्यघारा से कटे इस बडे वर्ग की अनदेखी करके सामाजिक समानता स्थापित करने के सपने में रंग भरना असंभव ही है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि आजादी के साठ वर्ष बाद भी हमारे देश की तस्वीर धुंधली ही है।

आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब एक साथ कई वर्ग, विचारघारा और दलों का चेहरा बेनकाब होकर सामने खड़ा है। अपनी जमीन को बचाने के लिए बंगाल के मिदनाफर के तमलुक परगने में एक वामपंथी सरकार आम जनता को गोलियों का शिकार बना रही है और महिलाओं के साथ बलात्कार करा रही है तो दूसरी तरफ अपने हक के लिए 25 हजार लोग ग्वालियर से दिल्ली कूच कर सरकार को चेता रहे हैं। वंचितों और आदिवासियों की यात्रा के दिन ही दिल्ली में मैराथन दौड़ भी आयोजित की गई थी। जनादेश यात्रा में शामिल हुए सत्याग्रहियों का सूखा चेहरा भारत के सत्तर फीसदी आबादी की तस्वीर पेश कर रहा था, जो कदम-कदम पर संघर्ष और त्याग का जज्बा लिए आगे बढ़ रहे थे। राजनीतिक हलकों में वह तब भी महत्व नहीं पा सकी जब वह ग्वालियर से दिल्ली की तीन सौ  किलोमीटर से ज्यादा लंबी यात्रा पूरी कर चुकी थी। वहीं पर दिल्ली मैराथन ने हमारे देश के बीस प्रतिशत नवनाढयों, पूंजीपतियों और फिल्मी नायकों का प्रतिनिधित्व किया। इस यात्रा में टीना अंबानी, प्रियंका चोपड़ा और ढेर सारे चमकते चेहरे शामिल हुए। मीडिया से लेकर प्रशासन तक सब इस मैराथन के आगे नतमस्तक थे। ये दोनों यात्राएं प्रतीकात्मक नहीं हैं। दिल्ली की सड़कों पर एक ही दिन दो घाराओं की यात्रा थी। यह महज संयोग ही नहीं था बल्कि यह हमारे अभागे देश की कटु सच्चाई है। हमारे देश में दोनों घाराएं साथ-साथ चल रही हैं। एक घारा का सब कुछ दांव पर है। तो दूसरी घारा सरपट मैराथन दौड़ लगा रही है। देश का मीडिया उस दिन जिस तरह से मैराथन यात्रा के कवरेज में लगा था उससे यह साफ है कि आम लोगों के आंदोलन को अब न केवल शीर्ष सत्ता द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है बल्कि लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले मीडिया की रुचि भी इन चीजों में नहीं है।

21वीं सदी के आने का इंतजार और उसका स्वागत बड़े जोश-खरोश से हुआ। एक पूर्व प्रघानमंत्री ने तो यह नारा ही दिया था कि हम देश को 21वीं सदी में ले जाएंगे। लेकिन अफसोस 21वीं सदी में भी हमारे देश के करोड़ो लोगों को न तो साफ पानी और न ही भरपेट भोजन मिल पा रहा है। देश में पचास प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। पिछले दस साल में डेढ़ लाख किसान कर्ज नहीं अदा कर पाने के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। इस मुद्दे का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि आज तक हमारे देश के शासक यह समझ नहीं पाए कि आखिर मूल समस्या क्या है।

इन सब के बीच पूरे देश में एक ऐसा वर्ग भी है जो अपनी जीवनशैली तथा विलासिता में अमेरिका और ब्रिटेन को मात दे रहा है। नई आर्थिक नीतियों के कारण देश में नवनाढयों की संख्या में भी अभूतपूर्व ढंग से बढ़ोतरी हुई है। सरकारी योजनाओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इस वर्ग के लिए खाद, पानी का कार्य किया है।

वहीं दूसरी ओर देश की अधिसंख्य आबादी जीवन की न्यूनतम जरूरतों से भी वंचित है। आर्थिक असमानता और सरकार की संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। देश का असंतुलित विकास सामाजिक और आर्थिक खाई को चौड़ा कर रहा है। समाज के विभिन्न वर्गों में जितनी आर्थिक असमानता आज है, उतनी कभी नहीं थी। परिणामस्वरूप एक ही शहर में एक तरफ तो समृध्दि का 'आइस लैंड' है तो दूसरी तरफ विपन्नता, गरीबी और विवशता का विशाल समुद्र। सरकार समृध्दि के इन्हीं टाफओं के हितों की रक्षा कर रही है। इसी वर्ग के लिए आर्थिक नीतियां बन रही हैं। इसी वर्ग के ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हित भी सुरक्षित हैं। आर्थिक असमानता और असंतुलित विकास से ही पूर्वोत्तर से लेकर आन्ध्र प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के लोग संगठित विरो में खड़े हो गए हैं। यदि समय रहते इस व्यवस्था को आम जनता की आशाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं नाया गया तो यह व्यवस्था भी लंबे समय तक नहीं चल सकती है।                               ईमेल: pradeep.pratap@gmail.com

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन

स्थाई स्तंभ

संपादकीय

चलती चक्की देखके

भारतगाथा

कहानी

  पुस्तक परिचय

 

सार्थक प्रयास

व्यंग्य

   

Austin e-commerce