भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 दिसंबर,  2007

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पुराने तरीके में छिपा है समाघा

यह बात सच है कि मनुष्य अपने जन्म से ही असमान पैदा होता है। उसकी शारीरिक-मानसिक क्षमताएं भिन्न होती हैं। यही भिन्नता आगे चलकर आर्थिक असमानता उत्पन्न करती है। आज की तरह पुराने समय में भी किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मोटे तौर पर उसकी व्यक्तिगत क्षमताओं और पैतृक विरासत पर निर्भर करती थी। बड़ी मात्रा में न संग्रह के दो ही माधयम थे- व्यापार और राजसत्ता। किसी एक व्यक्ति का दोनों माधयमों पर अधिकार प्राय: नहीं होता था। इस कारण न संग्रह भी एक सीमा से अधिक नहीं हो पाता था। फिर भी आर्थिक असमानता तो थी ही। इस असमानता के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए हमारे यहां घार्मिक नियम बनाए गए। जीवन मूल्यों के स्तर पर भोग के स्थान पर त्याग को स्वीकृति, मान्यता और प्रतिष्ठा दी गई। 'सौ हाथ से कमाओ और हजार हाथ से दान करो' का सूत्र कूट-कूट कर समाज में भरा गया। इस कारण प्राचीन भारतीय समाज में आर्थिक असमानता होते हुए भी अशांति और अभाव नहीं रहा।

आर्थिक मामलों में जब हम प्राचीन व्यवस्था और आज की व्यवस्था की तुलना करते हैं तो दोनों में जमीन आसमान का अंतर दिखाई देता है। आज व्यक्ति जितना पैसा कमा सकता है, पहले उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। नई-नई तकनीकों का अविष्कार हो जाने के कारण नियंत्रण करने की क्षमता बहुत बढ़ गई है। व्यापार की मात्रा और भौगोलिक सीमाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इस सबके साथ राजसत्ता तथा अर्थसत्ता का गठजोड़ हो जाने से भी आर्थिक असमानता को नया आयाम मिला है। पैसा कमाने के लिए सत्ता का उपयोग करना और सत्ता हासिल करने के लिए पैसे का उपयोग करना आज आम बात हो गई है। हमें ऐसा दिखाई देता है कि सरकार द्वारा आर्थिक शक्तियों का नियंत्रण किया जा रहा है। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। आज सरकार कोई भी हो उसकी लगाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में होती है। देश की आर्थिक नीतियां उनकी मर्जी के खिलाफ नहीं बन सकतीं।

वर्तमान परिदृश्य में आर्थिक असमानता के मुद्दे को वैश्वीकरण के संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। जब से वैश्वीकरण की आंधी ने जोर पकड़ा है तब से आर्थिक असमानता की समस्या और विकराल हो गई है। पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले विश्व व्यापार संगठन के दबाव में सरकार जो आर्थिक नीतियां बना रही है, उसके दोहरे दुष्परिणाम हो रहे हैं। छोटे-मझोले और घरेलू उद्योग चौपट हो रहे हैं। बेरोजगारी इस कारण बेतहाशा बढ़ी है। वैश्वीकरण के पिछले एक दशक पर नजर दौड़ाने से पता चलता है कि इस दौरान रोजगार सृजन में बढ़ोतरी लगभग शून्य रही है। नौकरीपेशा समुदाय में अफसरों और प्रबंचाकरों तथा तकनीकी विशेषज्ञों के वेतन में बेतहाशा वृध्दि हुई है। जबकि पारंपरिक पेशों में लगे लोग दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। उनका भविष्य अंकारमय हो गया है।

कृत्रिम रूप से पैदा की गई आर्थिक असमानता से निपटने के लिए हमें कई उपाय करने होंगे। पहला उपाय तो यह है कि हम अपनी सरकारों को जनाभिमुख बनाएं। एक समानांतर राजनैतिक आंदोलन के द्वारा हमें सरकार को विवश करना होगा कि वह विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों के अनुरूप नहीं, बल्कि जनआकांक्षाओं और जरूरतों के अनुसार अपनी आर्थिक नीतियां बनाए। दूसरा उपाय है विकेन्द्रित उत्पादन एवं विपणन के लिए माहौल तैयार करना। इसमें सरकार के साथ-साथ समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। आर्थिक असमानता को नियंत्रित करने का तीसरा और सबसे कारगर उपाय है प्राचीन भारतीय मूल्यों की पुन: स्थापना। यदि समाज में उन्मुक्त उपभोग की बजाय बचत, सादगी, अपरिग्रह एवं दान को मान्यता एवं प्रतिष्ठा मिल जाए तो आर्थिक असमानता कोई बड़ी समस्या नहीं रह जाएगी।

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