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विविधा |
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महानायक टंटया
भील |
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शीला
मिश्र |
टंटया भील को टंटया मामा के नाम से भी जाना जाता है।
टंटया का शब्दार्थ समझें तो इसका अर्थ है झगड़ा।
टंटया के पिता माउ सिंग ने बचपन में नवगजा पीर के
दहलीज पर अपनी पत्नी की कसम लेकर कहा था कि उनका
बेटा अपनी भील जाति की बहन,
बेटियों,
बहुओं के अपमान का बदला अवश्य लेगा। नवगजा पीर
मुसलमानों के साथ-साथ भीलों के भी इष्ट देवता थे।
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इनके पास बड़ी-बड़ी टोलियां थीं।
बांसवाड़ा,
भीलवाड़ा,
डूंगरपुर,
बैतूल,
धार
में टंटया को भीलों का प्रमुख दर्जा था। लूटमार करके
वह होलकर रियासत राज्य में जाकर सुरक्षित हो जाता
था। अपनी वीरता और अदम्य साहस की बदौलत तात्या टोपे
इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने टंटया को गुरिल्ला युद्ध
में पारंगत बनाया। इसी वजह से वह पकड़ा नहीं जा
सका। |
ऐसा माना जाता है कि
1824-27
के आस-पास टंटया का जन्म
हुआ। टंटया वास्तव में डाका डालने वाला डकैत नहीं था
वरन् एक बागी था जिसने संकल्प लिया था कि विदेशी सत्ता
के पांव उखाड़ना है। वह युवाओं के लिए एक जननायक का
काम कर रहा था। तात्या टोपे ने टंटया भील को शिक्षा
दी थी कि हमशक्ल रखना कितना फायदेमंद होता है।
इतिहास गवाह है कि हमशक्ल रखने से कितनी तत्परता से
अपने मकसद में कामयाब हुआ जा सकता है। टंटया भी अपने
दल में हमशक्ल रखता था। पुलिस को परेशान करने के
लिये टंटया एक साथ पांच-छह विपरीत दिशाओं में डाके
डलवाता था। उस समय भील विद्रोहियों में जो टंटया के
साथ थे उनमें से महादेव शैली,
काल बाबा,
भीमा नायक आदि थे। इनके पास
बड़ी-बड़ी टोलियां थीं। बांसवाड़ा,
भीलवाड़ा,
डूंगरपुर,
बैतूल,
धार
में टंटया को भीलों का प्रमुख दर्जा था। लूटमार करके
वह होलकर रियासत राज्य में जाकर सुरक्षित हो जाता
था। अपनी वीरता और अदम्य साहस की बदौलत तात्या टोपे
इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने टंटया को गुरिल्ला युद्ध
में पारंगत बनाया। इसी वजह से वह पकड़ा नहीं जा सका।
पुलिस खोजती रहती पर उसे पकड़ने में असमर्थ रहती। लोग
उसे डाकू कहते थे पर क्रांतिकारी बनकर जो कुछ भी वह
लूटता उसे वह अंग्रेजों के विरुद्ध
ही उपयोग में लाता था। वह निमाड़ का पहला विद्रोही
भील युवक था। वह बड़ा ही बलशाली युवक था। उसमें
चमत्कारिक बुध्दि शक्ति थी। उसे अवतारी व्यक्ति तक
कहा जाने लगा। वह किसी स्त्री की लाज लुटते नहीं देख
सकता था। टंटया के बारे में कहते हैं-
तांत्या बायो,
टण्टया खड माटवो।
घाटया खड
धान,
भूख्या खडं बाटयो॥
जब टंटया भील को पुलिस द्वारा पकड़ा गया तो वह
थानेदार का हाथ छुड़ाकर बाढ़ में नर्मदा में कूद गया।
पीछे लगे थानेदार से कहा कि मार गोली मैं टंटया हूं।
मुझे पकड़ो मैं भागूंगा नहीं। टंटया ने गिरफ्तारी दी।
बाद में कुछ और लोगों को पकड़ा गया। तीन महीने जेल
में रहकर वह सोच रहा था कि वह चाहता तो नर्मदा से
निकलकर भाग जाता। वह क्यों पुलिस के हाथ पड़ता।
सहयोगी पोपली,
जसुधि
ने समाचार भेजा कि जेल तोड़कर भाग निकलो। संग्राम नाम
का एक व्यक्ति जेल में डयूटी पर तैनात था। वह टंटया
का हितैषी था। उसे वह सही सूचनाएं मुहैया कराता था।
जेल से उसे खन्डवा ले जाया जा रहा था। वहां वह एक
सिपाही की बंदूक लेकर कूद पड़ा और फिर फायर होने पर
भी बच गया। एक बार जंगल में घुस जाने पर उसे कोई पकड़
नहीं सकता था। बाद में पुलिस ने जालसाजी से उसे घेर
लिया। मुखबिर को टंटया ने मार डाला। फांसी की सजा निर्धारित
हो गई। शहादत
4 दिसम्बर 1889
को हुई। निमाड़ अंचल की
गीत-गाथाओं में आज भी टंटया मामा को याद किया जाता
है।
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