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 दिसंबर,  2007

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पृथ्वी पर जीवन का भविष्य

रमेश कुमार शर्मा  

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो पृथ्वी पर निरन्तर जनसंख्या वृद्धि, वैश्विक उष्णता, नदियों के धीमे होते प्रवाह, मानसून असंतुलन, मृदा उर्वरता में कमी एवं नाभिकीय शस्त्रों की मांग में बढ़त के उपरान्त भी जीवन के प्रति आश्वस्त और सुदूर चंद्रमा एवं मंगल पर बसने के लिए लालायित हैं। हाल ही में पूर्वोत्तर भारत एवं इंग्लैंड में आई भीषण बाढ़ और हंगरी में गर्मी से बेहाल सैकड़ों लोगों की मौतें पर्यावरण पर मंडराते खतरे पर विचार करने को बाधय करती हैं।

आज हरित क्रान्ति युगीन कृषि व्यवसाय के दौर में इस कथन को तर्क संगत नहीं माना जा सकता। क्योंकि, अब पेड़-पौधो गोबर व पशुमूत्र के खाद पर नहीं बल्कि यूरिया एवं सुपरफास्फेट जैसे उर्वरकों और डी.डी.टी. व लिन्डेन जैसे कीटनाशकों पर आश्रित है। उनसे प्राप्त फल, खाद्यान्न, सब्जियां और चारा कीटनाशकों की उपस्थिति के कारण मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए स्वास्थ्यप्रद नहीं रह गया है

 

पृथ्वी पर जीवन के भविष्य को लेकर आज के युग का निराशावाद-प्रदूषण विषाक्तता, प्रजाति विलोप एवं आधुनिक मानव की पर्यावरण विमुखता की ओर संकेत करता है। आज मनुष्य सहित समस्त प्राणी जगत और वनस्पति जगत जिस प्रदूषित पर्यावरण से रूबरू हो रहे हैं वह एक शताब्दी पूर्व के प्राकृतिक पर्यावरण से मात्रा रासायनिक संरचना में ही नहीं अपितु जीवों की अंतर्निर्भरता के संदर्भ में भी अलग है। अत: पर्यावरण के संबं में आज की धारणा शताब्दी पूर्व की धारणा से भिन्न है। समस्त जीव प्रत्येक सांस में वायुमंडल से आक्सीजन खींचते हैं और उसमें कार्बन डाई आक्साइड छोड़ते हैं जिसे प्रकाश की उपस्थिति में वनस्पतियां ग्रहण कर अपना भोजन प्राप्त करती हैं और जीवन की आधार श्वसन प्रक्रिया के लिए आक्सीजन छोड़ती हैं। यह कथन बीसवीं शताब्दी के मध्य तक पर्यावरण को अभिव्यक्ति देने के लिए अपने आप में पूर्ण हुआ करता था। आज की वैश्विक उष्णता के दौर में यह कथन संशोन मांगता है। क्योंकि असामान्य तापवृद्धि पेड़ पौधों को मिथेन गैस छोड़ने पर विवश कर सकती है और यदाकदा कर भी रही है।

प्राणी जगत और वनस्पति जगत के सहअस्तित्व के समर्थन में यह भी कहा जाता रहा है कि मनुष्य एवं पशुपक्षी अपना मल-मूत्र विसर्जन कर पेड़-पौधों के लिए खाद जुटाते हैं। पेड़-पौधो बदले में उन्हें खाद्यान्न, फल, सब्जियां एवं पत्तिायां प्रदान कर उनके स्वास्थ्यप्रद आहार की व्यवस्था करते हैं। आज हरित क्रान्ति युगीन कृषि व्यवसाय के दौर में इस कथन को तर्क संगत नहीं माना जा सकता। क्योंकि, अब पेड़-पौधो गोबर व पशुमूत्र के खाद पर नहीं बल्कि यूरिया एवं सुपरफास्फेट जैसे उर्वरकों और डी.डी.टी. व लिन्डेन जैसे कीटनाशकों पर आश्रित हैं। उनसे प्राप्त फल, खाद्यान्न, सब्जियां और चारा कीटनाशकों की उपस्थिति के कारण मनुष्यों और पशु-पक्षियों के लिए स्वास्थ्यप्रद नहीं रह गया है। बीसवीं शताब्दी की तकनीकी क्रान्ति ने पशु-पक्षियों की उपयोगिता के सिद्धान्त पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है। मनुष्य यह मानता आया है कि पृथ्वी के विवि प्राणी अपनी विशिष्ट उपयोगिता रखते हैं, मानो प्रकृति ने उन्हें उसके लिए ही बनाया हो। अभिरुचि अथवा व्यवसाय के रूप में मनुष्य ने पशुपालन अपनाया है। परन्तु अतीत में संदेश भेजने के लिए प्रयुक्त होने वाले कबूतर आज वायुयान के युग में केवल अनुपयोगी ही नहीं, वायुयान मार्ग में बाक माने जाते हैं। अत: हवाई अड्डा क्षेत्र में उन्हें गोली मार दी जाती है। दशकों पूर्व घरों की चौकसी के लिए प्रेम से पाले जाने वाले कुत्तो आज के इलेक्ट्रानिक चौकसी उपकरणों के युग में नगर परिषदों द्वारा निर्ममता पूर्वक सड़कों से उठाये जाते हैं और कहीं-कहीं तो जहरीले इंजेक्शनों से मारे जाते हैं। खेती के लिए काम आने वाले बैलों को ट्रैक्टरों ने और गाड़ी खींचने में प्रयुक्त होने वाले घोड़ों को इंजनों ने विस्थापित कर दिया है। आज वास्तव में पशु के स्थान पर यंत्रों की उपयोगिता का सिद्धांत स्थापित हो चुका है।

स्वास्थ्य एवं बलप्रदायक दू देने वाली गायें, भैंसें और बकरियां आज के वल क्रान्ति और डेयरी उद्योगों के युग में पाली अवश्य जा रही हैं, परन्तु उनके दू में डी.डी.टी. और आक्सीटोसिन की उपस्थिति को लेकर टीका-टिप्पणी भी होती है। जिसके लिए वास्तव में हरित क्रान्ति युग का कीटनाशक युक्त चारा और अधिक दुग्धा उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं को लगाए जाने वाले अस्वास्थ्यकर आक्सीटोसिन इंजेक्शन उत्तरदायी हैं। तात्पर्य यह है कि व्यवसाय की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए आज का मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील हो चला है। पशुपालन का व्यवसाय करते हुए वह पशुओं के जीवन से अधिक अपने आर्थिक लाभ की चिन्ता करता है। जीवन की लागत पर अर्थोपार्जन का सिद्धांत आज की व्यावसायिकता में प्रतिष्ठा पा रहा है।

आज वन्य जीव भी अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। शेर जंगल का राजा है, यह भारत जैसे देशों में बस कहने की बात है। यहां तेजी से बढ़ती जनसंख्या बेरोकटोक वन भूमि का अतिक्रमण किये जा रही है। आज हालत यह है कि शेर वन विभाग की देख-रेख के कारण अस्तित्व में है या अजायबघरों और सर्कसों के पिंजरे में कैद है। श्रेष्ठ भूमि प्रबंन वाले देशों में मानव जाति बहुमंजिले भवनों में निवास करती है और वन्य जीवों के निवास हेतु वन भूमि छोड़ती है। लेकिन वहां भी औद्योगिक विकास के साथ बदलती जलवायु के कारण कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं या विलोप के कगार पर हैं।

भारत में पीपल, बड़, तुलसी आदि पेड़-पौधो और पशुओं में गाय पूजी जाती है। यहां दुग्धदायिनी गाय माता के रूप में समादृत है। हाथी में गणेश, बन्दर में हनुमान, सिंह में नृसिंह, शूकर में वाराह और घोड़े में हयग्रीव के दर्शन करने वाला भारतीय समाज सिंह, वृषभ, हंस, गरूड़ आदि प्राणियों को देवी-देवताओं के वाहन के रूप में सम्मान देता है। यह समाज कबूतरों को अनाज तथा चींटियों को आटा चुगाने के लिए प्रसिद्ध है। परन्तु एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला यह देश भूमि प्रबन्धान का सर्वथा निकृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहां वन एवं गोचर भूमि पर एक-दो मंजिले भवनों में आवासीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों का क्षैतिज विस्तार हुआ है। दूसरी ओर बहुत कम जनसंख्या घनत्व वाला देश अमेरिका आवासीय क्षेत्र का उर्ध्वार विस्तार करता है और बहुत बड़ा क्षेत्र वन्य जीवों के विहार तथा पशुओं की चराई के लिए छोड़ता है। इसके उपरान्त भी वहां औद्योगीकरण के कारण जीव जन्तुओं के सहज विचरण योग्य प्राकृतिक पर्यावरण नहीं रहा है। अबाधित वायुयान मार्ग बनाने के लिए कबूतरों को गोली मारने के सर्वाधिक प्रकरण अमेरिका में उजागर हुए हैं। अतएव मनुष्य का सुविधानुकूलन ही पृथ्वी पर जीवन के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। पृथ्वी पर जीवन सतत् बना रह सके, इसके लिए मनुष्य को समग्र जीवन के प्रति संवदेनशील रुख अपनाने की आवश्यकता है। यद्यपि आज मनुष्य पर्यावर की रक्षा के खातिर मैत्रीपूर्ण तकनीक अपनाने की दिशा में बढ़ने लगा है। परन्तु इनसे औद्योगीकरण का दबाव कम होगा और मनुष्य में समग्र जीवन के प्रति संवेदनशीलता जगेगी, इसमें संदेह है। फिर भी इतना आवश्य है कि आज के तकनीकी विकास की सुविधाओं को किसी सीमा तक त्याग कर ही मनुष्य पर्यावरण मैत्रीपूर्ण तकनीक का अनुशीलन कर सकता है।

आजकल विशेषकर यूरोप में पर्यावरण मैत्रीपूर्ण तकनीक अपनाने पर बल दिया जा रहा है। इसलिए नहीं कि यूरोपवासी पृथ्वी के समग्र जीवन के प्रति संवेदनशील हो उठे हैं। बल्कि इसलिए कि वहां वैश्विक उष्णता के कारण अटलांटिक सागर के बढ़ते जलस्तर और तेज तूफानों ने मनुष्य को संकटग्रस्त कर दिया है। अत: वहां ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर नियंत्रण पाने के प्रयत्न चल रहे हैं। आज का यूरोप 2020 तक संपूर्ण र्जा का 20 प्रतिशत स्वच्छ उर्जा बढ़ाने के उद्देश्य से खनिज तेल और नाभिकीय र्जा से हटकर सौर, पवन और तरंग तकनीक सहित स्वच्छ पुनर्नवीनीकरण योग्य फर्जा की ओर अग्रसर होने की योजना बना रहा है। यूरोपीय स्त्रीवादी 'जलवायु लिंग न्याय' की मांग करते हुए पुरुषों से अधिकांश महिलाओं की भांति सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने की अपेक्षा करते हैं।

यूरोपीय सुपरमार्केट घोषणा कर चुके हैं कि वे ताजा आर्गेनिक (गोबर, पशुमूत्र आदि प्राकृतिक खाद एवं नीम रस जैसे प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग से प्राप्त फसलों से निर्मित) भोजन उत्पादों के लिए केवल पर्यावर मैत्रीपूर्ण जैव-आधारित पैकेजिंग लेना ही पसंद करेंगे। ब्रिटेन में आई.पी.सी. मीडिया जैसे बहुत से प्रकाशक आश्वस्त करते हैं कि वे उन्हीं उत्पादकों से कागज खरीदेंगे जो एफ.एस.सी. नियमितताओं सहित वानिकी आचरों की अनुपालना करेंगे। परिवहन की बात करें तो वहां कारें एक दशक पूर्व की तुलना में 10 गुना स्वच्छ हैं।

पर्यावरण मैत्रीपूर्ण तकनीकें निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। इन्हें अपनाने का अर्थ है मनुष्य का कृत्रिमता से प्रकृति की ओर उन्मुख होना। उपर्युक्त उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि यूरोप के लोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर नियंत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तकनीकी विकास की सुख-सुविधाएं त्याग सकते हैं। यदि मनुष्य सुविधानुकूलन पर्यावरण बनाना छोड़ देता है तो केवल उसे ही नहीं अपितु समस्त जीवन जगत को अपना प्राकृतिक पर्यावरण पुन: प्राप्त हो सकता है। पृथ्वी पर जीवन के भविष्य के प्रति आशावाद मनुष्य के सुविधा परित्याग पर ही निर्भर है।

ईमेल: iammukul007@yahoo.com

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