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परिचर्चा |
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नींव का काम पूरा हो रहा है |
सितंबर,
2000 में आपने अध्ययन
अवकाश पर जाने की घोषणा की थी। तब से लेकर अब तक सात
वर्ष बीत चुके हैं। इन सात वर्षों की लंबी यात्रा को
जब आप मुड़कर देखते हैं तो कैसा लगता है?
देश की जो वर्तमान स्थिति है,
उसके प्रति आपका क्या आकलन है?
इन सात वर्षों में मैं जो भी कर सका हूं,
उसे लेकर मुझे संतोष है। अध्ययन अवकाश पर जाने से
लेकर अब तक मैंने भारत के सामाजिक-आर्थिक एवं अन्य
कई पहलुओं पर जो बातें जानीं और समझी हैं,
उन्हें सक्रिय राजनीति की गहमागहमी में जान पाना
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पहले मुझे लगता था,
लेकिन अब दृढ़ विश्वास हो गया है कि भारत को जिस
व्यवस्था के तहत चलाया जा रहा है,
वह मूलत: अभारतीय है। यही कारण है कि वर्तमान
व्यवस्था भारत की लोकशक्ति को परिपुष्ट करने की बजाय,
उसे जाने-अनजाने कुचलने का काम कर रही है। |
संभव नहीं था। पिछले सात वर्षों में मैंने देश का
व्यापक दौरा किया। सभी प्रकार के सांगठनिक दायित्वों
से मुक्त हो इस दौरान मैंने देश को एक बार फिर करीब
से समझने का प्रयास किया। संघ की विचारधारा के भीतर
और बाहर,
जहां कहीं भी सज्जन शक्ति सक्रिय दिखाई दी,
मैं उनसे मिला और देशहित में सबके बीच कुछ बुनियादी
बातों पर सहमति बनाने का प्रयास किया। पहले मुझे
लगता था,
लेकिन अब दृढ़ विश्वास हो गया है कि भारत को जिस
व्यवस्था के तहत चलाया जा रहा है,
वह मूलत: अभारतीय है। यही कारण है कि वर्तमान
व्यवस्था भारत की लोकशक्ति को परिपुष्ट करने की बजाय,
उसे जाने-अनजाने कुचलने का काम कर रही है। वैश्वीकरण
इस व्यवस्था का नवीनतम रूप है,
जिसके प्रति अति उत्साह के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था
और राजनीति आज पहले से कहीं अधिक अस्थिर हो चली है।
राजनीति पर थैलीशाहों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने
लगा है। राजनीति का निगमीकरण हो गया है। वोट से नोट
और नोट से वोट के सूत्र को सभी पार्टियों ने अपना
लिया है। राजसत्ता पर अपने प्रभाव के कारण थैलीशाह
देश के सभी संसाधनों पर अपना शिकंजा कसते जा रहे
हैं। देश की सरकारें उन्हें रोकने की बजाय उनके लिए
रास्ता आसान करने में लगी हैं। गरीबों को देने के
लिए तमाम सरकारों के पास लोभ के अलावा कुछ भी नहीं
है। इसी का परिणाम है कि देश में आज
77
प्रतिशत आबादी गरीब,
असुरक्षित एवं पीड़ित है।
आज से एक दशक पूर्व जनाभिमुख शक्तियों की लड़ाई
सरकारों से होती थी,
पर आज ऐसा नहीं रह गया है।
प्रत्यक्ष रूप से ऐसा लगता है कि सरकारें निर्णय ले
रही हैं, लेकिन वास्तव
में उनकी लगाम कहीं और होती है। इन बदली हुई
परिस्थितियों में यह जरूरी हो गया है कि सभी
जनाभिमुख सज्जन शक्तियां अपनी रणनीति पर पुन: विचार
करें,
अपने लक्ष्य को पुनर्निधारित
करें। उन्हें यह समझना होगा कि सरकारें,
पार्टियां एवं कंपनियां जनता के
खिलाफ एकजुट ही रहेंगी।
जनवरी
में आप भारत विकास संगम का जो सम्मेलन कर रहे हैं,
उसकी क्या भूमिका है। इस सम्मेलन
से आप क्या हासिल करना चाहते हैं?
भारत विकास संगम उन समस्याओं से निपटने की रणनीति
विकसित करने का एक मंच है,
जिनसे आज देश जूझ रहा है। आज तकाजा नया है तो उनके
प्रतिकार का तरीका,
ढांचा,
औजार और लड़ाके भी अलग तरह के होने होंगे। आदेश,
आज्ञापालन की कार्य संस्कृति एवं उपर से नीचे के
ढांचे के स्थान पर साहस,
पहल और प्रयोग की कार्यविधि ही उपयोगी होगी।
शांतिपूर्ण तरीके से विकेन्द्रित संघर्ष का रास्ता
अपनाते हुए सरकार-बाजार से मुक्त स्वावलंबी समाज
रचना को पुन: ताकतवर बनाना होगा। साथ ही पथभ्रष्ट हो
चुकी राजनीति को फिर से मूल्यों और मुद्दों की पटरी
पर लाना होगा। इसलिए बौद्धिक,
रचनात्मक,
आंदोलनात्मक गतिविधियों एवं तदर्थ ढांचे,
कार्यपद्धति के प्रयोग करने होंगे। सोच,
ढांचे और तरीके के स्तर पर देशी एवं विकेन्द्रीकरण
ही दिशा होगी। इसके लिए युवा,
संत,
मातृशक्ति के साथ किसान,
कारीगर एवं मजदूरों की ताकत को भी संजोना है।
हमारा जिला हमारी दुनिया,
हमारा जिला हमारा सपना,
सबको भोजन सबको काम,
न कोई भूखा न कोई बेरोजगार की अवधारणा
को अपनाते हुए हमें सज्जनशक्ति को जुटाना होगा। इस
सबके लिए जिला को केन्द्र बनाकर काम करना होगा।
सज्जन शक्ति को जुटाने में संवाद,
सहमति एवं सहकार की प्रक्रिया
अपनानी होगी। हमें ऐसी परिस्थितियां निर्मित करनी
होंगी जिसमें समाज के हर घटक की बदलाव में भागीदारी
सुनिश्चित हो सके। इसके लिए जमीन पर रचनात्मक सफल
प्रयोगों के साथ ही स्थानिक छोटे-छोटे मुद्दों पर
परिणामकारी सफल आंदोलन भी संयोजित करने होंगे।
भारत विकास संगम में इन्हीं सब बातों को साकार करने
के लिए चर्चा होगी। जन के मुद्दों पर जिन लोगों ने
सफल रचनात्मक एवं आंदोलनात्मक गतिविधियां चलाई हैं,
वे अपने अनुभव के बारे में प्रतिभागियों को बताएंगे।
उनके अनुभवों पर चर्चा होगी और फिर तय किया जाएगा कि
आगे का रास्ता कैसे तय किया जाए?
हमें वास्तविक धरातल पर क्या करना है और कैसे करना
है,
यह समझ विकसित करने में इस सम्मेलन की महत्वपूर्ण
भूमिका होगी।
भारत
विकास संगम का एक सम्मेलन नवंबर,
2004 में वाराणसी में आयोजित
किया गया था। उसमें क्या हुआ था?
मेरे जीवन के दो लक्ष्य हैं। पहला हमारा देश दुनिया
का सिरमौर बने और दूसरा यह कि यहां के प्रत्येक
नागरिक की बुनियादी जरूरतें पूरी हों,
सभी लोग खुशहाल हों। अध्ययन अवकाश पूरा होने के बाद
मुझे यह स्पष्ट हो गया था कि किसी राजनीतिक दल में
काम करते हुए इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए
मैं ईमानदारी से काम नहीं कर सकता। इसीलिए मैंने
भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से
त्यागपत्र दिया और तय किया कि आगे भी मैं किसी
राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बनूंगा।
जिस रास्ते पर मैंने आगे बढ़ने का निश्चय किया,
वह रास्ता मेरे लिए नया था। मैं चाहता था कि उन सभी
लोगों के साथ एक बार सामूहिक रूप से बैठूं जिन्होंने
पिछले तीन-चार सालों में मेरा मार्गदर्शन किया था।
साथ ही जिन लोगों से मैं अलग-अलग मिला था,
वे सब लोग भी आपस में मिल सकें,
यह इच्छा थी।
2004
में आयोजित भारत विकास संगम को इसी दृष्टि से देखा
जाना चाहिए। इस सम्मेलन के बाद जहां मुझे एक वैचारिक
दृढ़ता प्राप्त हुई,
वहीं दूसरे प्रतिभागियों को भी बहुत कुछ नया
जानने-समझने का अवसर मिला। उन्हें लगा कि वे अलग-थलग
नहीं हैं। संक्षेप में कहें तो
2004
के उस सम्मेलन में हमने अपने काम का एक नक्शा बनाया।
उस नक्शे के मुताबिक जो ईमारत बननी है,
उसकी नींव तैयार करने का काम हमने पिछले तीन सालों
में किया है। यह एक लंबा काम है। इसके लिए बहुत
धौर्य चाहिए।
आप
जो ईमारत बनाना चाहते हैं,
उस पर पिछले सालों में क्या काम
हुआ। क्या उसका कुछ हिस्सा तैयार हो पाया है?
कह सकते हैं कि उस ईमारत की नीवं का काम पूरा हो रहा
है। बौद्धिक,
रचनात्मक एवं आंदोलनात्मक गतिविधियों की हमने जो
योजना बनाई थी,
उन पर काम करने वाले लोगों की पूरे देश में एक टीम
तैयार हो गयी है। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के
जरिए आंदोलनात्मक,
कौटिल्य शोध संस्थान के द्वारा बौद्धिक और भारत
विकास संगम के माध्यम से रचनात्मक कार्यों को आगे
बढ़ाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया है। उपर जिन
संगठनों का मैंने जिक्र किया है,
ये कोई सर्वव्यापी संगठन नहीं हैं। सारा कार्य इन
संगठनों के द्वारा ही हो,
ऐसी कोई महत्वाकांक्षा हमें नहीं है। हम बस चाहते
हैं कि ये संगठन अपने काम के साथ-साथ समविचारी
व्यक्तियों एवं संगठनों से संवाद,
सहमति एवं सहकार का मार्ग प्रशस्त करें। पिछले तीन
सालों में ऐसा ही हुआ है,
इस बात का मुझे संतोष है।
आगामी
सम्मेलन की रूपरेखा क्या है?
इसमें कौन-कौन लोग आ रहे हैं और
सम्मेलन की तैयारियां कैसी चल रही हैं?
आगामी सम्मेलन के जरिए हम अपने कार्यकर्ताओं में
कार्यपद्धति को लेकर स्पष्टता लाना चाहते हैं। हम
चाहते हैं कि इस सम्मेलन में एक कार्ययोजना बने
जिसके अनुसार लोग अपने-अपने स्थान पर ठोस काम कर
सकें। सहयोगी संगठनों से भी ताल-मेल की एक बेहतर
व्यवस्था विकसित करनी है ताकी हम एक-दूसरे को
अपेक्षित सहयोग कर सकें।
सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आने वाले लोगों
की अनुमानित संख्या
550
के आस पास है। इसमें लगभग
400
हमारे कार्यकर्ता होंगे जो लगभग
200
जिलों में काम कर रहे हैं। लगभग
150
लोग सम्मेलन में अतिथि के रूप में भाग लेंगे। ये वो
लोग होंगे जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर या अपने
संगठन के माध्यम से विभिन्न प्रकार के बौद्धिक,
रचनात्मक एवं आंदोलात्मक कार्यों की एक मिसाल पेश की
है। हमारी योजना है कि इन लोगों के अनुभव से हमारे
कार्यकर्ता लाभान्वित हों। इसलिए हम सम्मेलन की
योजना इस प्रकार बना रहे हैं कि पूरे सम्मेलन में
सफल प्रकल्पों/गतिविधियों की
40-50
प्रस्तुतियां हो सकें। ये प्रस्तुतियां बहुस्तरीय
सत्रों में श्रव्य-दृश्य माध्यम/ पावरप्वाइन्ट
प्रजेन्टेशन या मौखिक रूप से होंगीं।
भारत विकास संगम के इस सम्मेलन में फोकस उन लोगों पर
है जो पहले से ही हमारे साथ किसी न किसी रूप से जुड़े
हैं। लेकिन,
इस दौरान हम इस बात के लिए भी प्रयास करेंगे कि आम
नागरिकों में भी हमारी दृष्टि को लेकर एक समझ बने।
इसके लिए मीडिया का सहयोग लेने का हम प्रयास करेंगे।
सम्मेलन की तैयारियां इस समय जोरों पर हैं। आयोजन से
जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार करने एवं कार्ययोजना
बनाने के लिए कर्नाटक के बसवराज पाटिल की अध्यक्षता
में एक केन्द्रीय संचालन समिति गठित की गई है। इस
समिति की इसी दिसम्बर में
4
तारीख को वाराणसी में एक बैठक हो रही है। कुल मिलाकर
सम्मेलन की तैयारियां ठीक ढंग से चल रही हैं। आशा है
हमारी आगे की योजना को साकार करने में यह सम्मेलन
मील का पत्थर साबित होगा।
भारत
विकास संगम का यह सम्मेलन मिर्जापुर जिले के चुनार
कस्बे के पास रामबाग में आयोजित किया जा रहा है।
नजदीकी शहर वाराणसी यहां से
40 किमी दूर है। ऐसे दूर-दराज के
इलाके में सम्मेलन आयोजित करने के पीछे क्या कोई
विशेष कारण है?
इसके पीछे विशेष कारण तो नहीं लेकिन कई व्यावहारिक
कारण जरूर हैं। सम्मेलन में प्रतिभागियों की
एकाग्रता बनी रहे,
इसलिए इसका शहर से दूर होना आवश्यक है। दूसरा कारण
यह कि सम्मेलन स्थल के पास ही डगमगपुर में सुरभि शोध
संस्थान का एक बहुत बढ़िया प्रकल्प है। हम चाहते हैं
कि सभी प्रतिभागी इस प्रकल्प को देखें,
समझें और अपनी-अपनी जगहों में जाकर ऐसे ही प्रकल्प
खड़ा करने की कोशिश करें। और सबसे बड़ी बात तो यह कि
हम यदि देश की आम जनता के बीच काम करना चाहते हैं तो
हमें शहरी सुख-सुविधा के प्रति बहुत मोह नहीं करना
चाहिए। ये सुविधाएं मिलें तो ठीक,
न मिलें तो भी ठीक। इनके कारण हमारी संकल्प शक्ति पर
असर नहीं पड़ना चाहिए। सम्मेलन में बड़े शहरों की
सुविधा तो नहीं मिलेगी,
लेकिन सभी प्रतिभागियों की बुनियादी जरूरतों का पूरा
ध्यान रखा जाएगा। इस स्थान का जो सौंदर्य है,
वह शहरों में नहीं मिलेगा। |