|
परिदृश्य |
|
नैतिक
समाज की
आवश्यकता |
|
डा. दाऊजी गुप्त
|
मनुष्य
के जीवन
का आरम्भ कन्दराओं में रहने वाले,
बिजली,
तूफान,
भूकम्प,
शीत,
ग्रीष्म,
वर्षा आदि
ऋतुओं एवं शारीरिक व्याधियों को दैवी
प्रकोप मानने वाले प्राणी के रूप में हुआ था।
तत्कालीन नियमों का उल्लंघन करने पर अपराधी को हिंसक
पशुओं के सामने डाल देना,
पहाड़ की चोटी से ढकेल देना आदि भयंकर दण्ड दिए जाने
की प्रथा थी। उस समय कबीले या कबीले के प्रमुख के
निर्णयों अथवा उनके द्वारा निर्धारित रिवाजों को ही
'नैतिक'
माना जाता था।
समाज एवं संस्कृति नैसर्गिक नहीं है बल्कि,
दोनों एक परिवर्तनशील प्रक्रिया
से निर्मित हैं। सामाजिक नैतिकता के मानदण्ड
संस्कृति की देन है, जो
कालान्तर में एक सभ्यता का रूप ग्रहण कर लेते हैं।
विश्व की प्राचीनतम सभ्यताएं गंगा,
सिंधु
ह्वांगहों,
नील और दजला-फरात आदि नदियों की
घाटियों में विकसित हुई। प्राचीनतम सभ्यताओं में आज
केवल भारत की सभ्यता और संस्कृति शेष है। भारतीय
संस्कृति में नैतिकता के सार्वभौम सनातन मूल्यों की
संरचना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
ऋगवेद
कहता है कि मातृ संस्कृति,
मातृभाषा,
मातृभूमि- यह तीन देवियां सदैव
भारतीय हृदयों में विराजमान रहें। सभी भारतीय दर्शन
विशुद्ध
सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों पर आधारित
हैं तथा नैतिकता के व्यावहारिक महत्व पर बल देते
हैं।
पातंजलि का अष्टांग योग,
बुद्ध
का आर्य अष्टांग मम्यम
मार्ग एवं पंचशील व जैनियों के पंचम महावर्त
व त्रिशला सार्वभौम सनातन नैतिकता के आदर्श हैं।
भारतीय साहित्य ने नैतिक-अनैतिक की परिभाषा को इस एक
वाक्य में व्यक्त कर दिया है:
'वह कार्य जिससे दूसरों का भला
हो वह नैतिक और वह कार्य,
जिससे दूसरों को पीड़ा पहुंचे,
अनैतिक है।'
यह तो व्यक्ति के लिए हुई नैतिकता की परिभाषा,
किन्तु देश व समाज की सामूहिक
नैतिकता क्या हो इस विषय पर निरन्तर मंथन चलता रहा
है। योग वाशिष्ठ, महाभारत,
कौटिल्य के अर्थशास्त्र,
त्रिपिटक आदि ग्रंथों में
राष्ट्र के नैतिक कर्तव्यों,
राष्ट्र की नैतिकता के क्षय से
उनकी अवनति,
नैतिकता कैसे
अक्षुण्ण रहे आदि विषयों का अत्यन्त विस्तार से
वर्णन है। यह समस्त ग्रंथ तथा विचारकगण कहते हैं कि
आवश्यकता से कहीं अधिक
सम्पत्ति संचय की कामना अनैतिकता की जड़ है। यदि
विश्व इस आदर्श पर चल रहा होता तो क्या अमेरिका,
यूरोप,
जापान,
एशियाई व अप्रफीकी देशों व भारत
सहित समग्र विश्व में घोटालों,
घूसखोरी,
भ्रष्टाचार का बोलबाला होता तथा
विश्व के करोड़ों नहीं अरबों जनों की आस्था जनतंत्र
से डिगने के कगार पर होती?
भारतीय साहित्य कहता है कि
'वसुधौव कुटुम्बकम'
सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है।
इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण
नहीं किया। बल्कि,
सहत्रों
आक्रमण सहने के उपरान्त भी अपनी सीमाओं में प्रवेश
करने वाले विदेशियों को आत्मसात किया है। यही कारण
है कि विश्व में मानवाधिकारों
के हनन पर सबसे अधिक
प्रतिक्रिया भारत में होती है,
यद्यपि इस संबंध
में सबसे अधिक
बहस अमेरिका और यूरोप में होती है। भारतीय संविधान
में पूरे राष्ट्र को कुटुम्ब माना गया है तथा जाति,
धर्म,
लिंग,
कुल,
गोत्र आदि का भेदभाव
समाप्त कर सबको मूलभूत अधिकार
प्रदान किए गए हैं।
तथापि,
यह भयंकर विडंबना है कि सम्पूर्ण
भारत आज भाषा, प्रान्त,
जाति व वर्ग संघर्षों की चपेट
में आता जा रहा है और जिन पर राष्ट्र की सबसे बड़ी
जिम्मेदारी है,
वही
राजनीतिक दल अपने तुच्छ हितों व तात्कालिक लाभ के
लिए इन संघर्षों को हवा दे रहे हैं। संविधान
द्वारा प्रदत्त
राष्ट्रीय नैतिकता का चिंतन जाग्रत करने के लिए
राष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवियों को जयप्रकाश के
समग्र आन्दोलन की तरह का एक राष्ट्रीय नैतिक आन्दोलन
खड़ा करना होगा।
राष्ट्रीय और सामूहिक नैतिकता के साथ सामाजिक तथा
वैयक्तिक नैतिकता का सवाल आता है। सतयुग में
स्वेच्छा वाली प्रथा को सामाजिक स्वीकृति थी।
स्वेच्छाचार प्रचलित प्रदेशों का उल्लेख महाभारत में
है। नियमित विवाह की प्रथा का श्रेय श्वेतकेतु को
है। उसने स्त्री-पुरुष दोनों पर विवाह की पवित्रता
भंग न करने का नियम लागू किया। वैदिक काल तक विवाह
एक संस्था के रूप में स्थापित हो चुका था। ईसाई तथा
मुस्लिम
धर्म
की तुलना में भारतीय साहित्य में
धर्म,
अर्थ व मोक्ष के साथ काम को भी
पवित्र माना गया है। इसे अपवित्र और अशिष्ट मानना
मानसिक विक्षिप्तता का लक्षण माना गया है। कामसूत्र
के भाष्यकार ने इसे सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति माना
है। वह कहता है कि यौन इच्छा को तृप्त करना शर्बत
पीने के समान नहीं है। इसका आधार
चिरमैत्री और प्रेम होता है। भारतीय साहित्य में
स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक और प्रेरक होते हैं।
वे शारीरिक आनंद के द्वारा शाश्वत प्रेम में बंधते
हैं और एक दूसरे के प्रति वफादार रहते हैं।
वफादारी और नैतिकता की प्रतिष्ठा की रक्षा में
भारतीय नारियां पुरुषों से बहुत आगे रही हैं।
सावित्री,
उमा और सीता जैसे सैकड़ों उदाहरण
हमारे सामने हैं। सावित्री ने यम से स्पष्ट कहा कि
पति-पत्नी के पवित्र संबंधों
में किसी तीसरे का स्थान तो दूर उसकी कल्पना भी नहीं
की जा सकती है। वह यह भी कहती है कि इन संबंधों
की पवित्रता,
जिसे पूर्ण सम्पूर्ण कहते हैं,
तर्क और इन्द्रियजन्य सुखों से
परे है। सीता ने रावण से कहा कि राम के प्रति उसकी
निष्ठा अडिग मानसिक स्वास्थ्य का प्रतीक है।
महाभारत के वन पर्व में द्रौपदी सत्यभामा से कहती है
कि सुख से ही सुख प्राप्त नहीं होता। साधवी स्त्री
को अपने कर्तव्य निर्वाह के दु:ख में भी अपूर्व सुख
की प्राप्ति होती है। भारतीय परंपरा में पाणिग्रहण
अर्थात् हाथ पकड़ने के उपरांत वैवाहिक संहिता लागू हो
जाती है।
ऋगवेद
से लेकर आज तक विधवाओं
के पुनर्विवाह की मान्यता है। ऐसा नहीं है कि नारी
दूसरा विवाह नहीं कर सकती। अनेक परिस्थितियों में
तलाक को भी मान्यता है। पाराशर,
वशिष्ठ,
नारद,
कौटिल्य,
धर्म
सूत्र,
सभी भारतीय शास्त्रकारों ने तलाक
के उपरान्त नारी के पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की
है। वर्तमान में लागू हिन्दू कोड बिल इसी आधार
पर बना है।
गरुड़ पुराण,
अग्नि पुराण आदि कहते हैं कि यदि
पति चरित्रहीन हो, नपुंसक
हो, बहुत समय से विदेश
में हो अथवा संन्यासी हो गया हो,
अपना
धर्म
छोड़ चुका हो तो पत्नी उसे परित्यक्त कर सकती है। यह
अद्भुत बात है कि भारतीय शास्त्रकार पुरुष को यह अधिकार
नहीं देते कि वह पत्नी का परित्याग कर सके। आज भी
भारत के ग्रामों में सभी जातियों की पंचायतों का यह
नियम है कि यदि स्त्री पर चरित्रहीनता का आरोप सिद्ध
भी हो जाए तब भी पुरुष के लिए यही विधान
है कि वह पत्नी को सुरक्षापूर्वक घर में रखे।
भारत के आदिवासियों में नारी पंचायत के सामने पति को
छोड़ कर मनचाहे पुरुष के साथ विवाह कर सकती है परन्तु
पुरुष ऐसा नहीं कर सकता। नारी की इस स्वतन्त्रता के
उपरान्त भी सम्पूर्ण समाज नैतिक मूल्यों से बंधा
रहता है। पश्चिमी जगत में नारी मुक्ति आन्दोलन ने
नारी व पुरुष को पश्चिमी नैतिकता के अनुसार जीवन को
अपनी मर्जी के अनुरूप जीने की शैली को सामाजिक
समानता का जामा पहनाने के साथ परंपरागत ढंग से चली आ
रही पुरुष तथा नारी के बीच की कड़ियों पर जम कर
प्रहार किया है। स्त्री-पुरुष के संबंधों
के खुले आयाम,
पति-पत्नी रहते हुए भी एक दूसरे
के निजी जीवन के प्रति स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति,
विवाह के बंधन
से मुक्त रहते हुए भी साथ रहना,
इन सबके पीछे यह तर्क समझ में
आता है कि नैतिकता तथा जीवन मूल्य एक सतत् प्रयास की
भांति हैं, जो युग के साथ
परिवर्तित होते रहते हैं पर अपनी युवाजन्य
उन्मुक्तता,
जिसकी हम
अपने स्तर पर वकालत करते हैं। पर अपनी युवा पीढ़ियों
के उन मूल्यों की बात करने पर उग्र हो जाते हैं या
कुढ़ने लगते हैं। उसे सार्वभौम रूप से स्वीकार कर
लेने पर क्या व्यक्ति निजी स्तर पर नितांत अकेला
नहीं रह जाएगा। अपना कहने के नाम पर मनुष्य तो दूर
मूल्य भी शेष नहीं रहेंगे। तभी तो पश्चिमी देशों में
एक ऐसे वैकल्पिक मूल्यबोध
की तलाश हो रही है,
जिसमें कुंठित मनोविकार
ग्रस्त
एवं अकेला होने से व्यक्ति की रक्षा करके तथा समाज
एवं समुदाय के अधिकारों
की सुरक्षा करके मनुष्य को सामाजिक प्राणी होने का
एहसास कराया जा रहा है।
वस्तुत: हमारे वार्घैंमय तथा हमारी पौराणिक कथाओं
में नारी मुक्ति से बहुत आगे नारीत्व की गरिमा,
नारी के हितों के लिए संघर्षरत
तथा सामाजिक तरीकों से उद्देश्यपूर्ण विद्रोह करने
वाली व अपना वर्चस्व स्थापित करने वाली नारियों के
शौर्य एवं उनकी कथाओं का विशाल भंडार है।
खजुराहो,
कोणार्क की मूर्तियां मात्र
कलाकृतियां नहीं बल्कि एक सुखवादी दर्शन की
प्रतिकृति हैं। कामशास्त्र,
सौन्दर्यशास्त्र,
स्वस्थ एवं चिरयुवा रखने वाले
योग,
आयुर्वेद के शोध
एवं उनकी उपलब्धियां इसी लक्ष्य की ओर इंगित करती
हैं। काम एवं यौन सुख को पवित्र मानते हुए हमारे
वार्घैंमय ने उन्हें नैतिकता के मूल्यों से
अभिसिंचित किया है। अनेक
धर्मों,
मतों,
पंथों,
दर्शनों और विचारधाराओं
ने भारतीय संस्कृति को एक विशाल वट वृक्ष का रूप
प्रदान किया है। इनकी सम्मिलित मान्यताओं ने उन्हें
एक सशक्त सामाजिक परिवेश प्रदान किया है।
वर्तमान युग की बदली परिस्थितियां,
परिवर्तित जीवन शैली,
आधुनिकता
के मोह में वह परिवेश छिन्न-भिन्न होता दिखाई दे रहा
है। पश्चिमी देशों में जा बसे भारतीयों में तो
भारतीयता के संस्कारों एवं अपनी अस्मिता को बचाने के
प्रयत्न चल रहे हैं। परन्तु भारत के महानगरों में
हमारी युवा पीढ़ी अपने संस्कारों को परिधान
की तरह त्याग कर पश्चिमी संस्कारों की नकल में एक
अजूबा बनती जा रही है। वह एक अजीबो-गरीब संत्रस में
जी रही है। उसमें आधुनिकता
एक गंतव्यहीन जीवन-यात्र से अधिक
प्रतीत नहीं होती।
एक जीवन शैली से दूसरी जीवन शैली के मूल्यों को जीवन
में रूपांतरित होने में एक संक्रमण काल होता है और
नए मूल्यों को स्वीकारने के लिए तर्क और कारणों पर
एक लंबी बहस चलती है। भारत सहित संसार के सब देशों
में ऐसा हुआ है। लेकिन,
दूरदर्शन,
वी.सी.आर.,
अर्थहीन संगीत,
अर्थहीन वाक्यों का दिन में
सैकड़ों बार उच्चारण 'बगुले
का हंस के पर लगा लेने'
या 'सियार के शेर की खाल
ओढ़ लेने' से जैसा भी नहीं,
जिसमें कर्ता को अपनी वास्तविकता
का बोध
रहता है। वस्तुत: यह आदमी का बंदरों के कपड़े पहन कर
उनके जैसा आचरण करने और अपने आप को बंदर घोषित करने
जैसा है,
जबकि असली बंदर उन्हें सजातीय
मानने को इसलिए तैयार नहीं हैं क्योंकि वह उस कोटि
के नहीं हैं।
यद्यपि यह एक सत्य है कि पश्चिमी देशों में बसे हुए
संस्कारों परिवार या समुदाय से जुड़े रहने वाले
प्रवासी लोग अधिकांशत:
अनैतिक आचरण से बचे रहते हैं। अमेरिका तथा यूरोप के
एशियाई मूल के लोग तो भारतीय,
कोरियन,
वियतनामी या चीनी हैं तथा
धार्मिक,
सामाजिक,
साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हैं।
वे संस्कारों के कारण तथा सामाजिक अपमान के भय से
अथवा अपने समाज में सम्मानपूर्ण स्थान सुनिश्चित
रखने के लिए नैतिक मूल्यों का उल्लंघन नहीं करते।
आज के युग की सर्वाधिक
विचारणीय समस्या है नई पीढ़ी को कैसी-नैतिकता के
संस्कार दिए जाएं। नई पीढ़ी में नैतिकता रूपी प्राण
उर्जा
के निर्माण के अभाव में भारतीयता और मानवता के आदर्श
से परिपूर्ण व जीवंत पीढ़ी की कल्पना नहीं की जा
सकती। वस्तुत: बच्चे को शुरू से ही विकास के नैतिक
मूल्यों में संस्कारित करना चाहिए,
मन को संस्कारित कर देने से
संस्कारी व्यक्तित्व का निर्माण सरलता से हो जाता
है। तीन वर्ष से सोलह वर्ष की आयु तक मन की तहों में
जम चुके संस्कारों को सरलता से परिवर्तित नहीं किया
जा सकता है। इससे पहले यदि नैतिकता के संस्कार
बच्चों व किशोरों में डाल दिए जाएं तो उनके भावी
जीवन की आधारशिला
इतनी सशक्त होगी कि परिस्थितियां,
विदेश प्रवास,
सामाजिक परिवेश,
राजनैतिक दबाव,
आर्थिक समस्याएं अथवा किसी
प्रकार का भी दबाव उन्हें अपने निश्चय से कभी भी
डिगा नहीं सकेगा।
नई पीढ़ी में नैतिक संस्कारों की स्थापना संपूर्ण
विश्व में अनैतिकता के कारण उत्पन्न अनेकों
प्राणलेवा शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों
से समग्र विश्व की मुक्ति का पर्याय बनेगी। इस हेतु
विश्व स्तर पर एक वैचारिक एवं रचनात्मक आन्दोलन की
अतीव आवश्यकता है। साथ ही,
सम्पन्न देशों के समाज के
तथाकथित नैतिक मूल्य मीडिया तथा अन्य संचार माध्यमों
के कारण शेष विश्व के नैतिक मूल्य न बन जाएं,
इस खतरे को रोकने के लिए भी एक सशक्त अभियान होना
चाहिए। |