|
विविधा |
|
ध्यान
का वैश्विक
प्रभाव |
|
स्वामी वेद भारती |
हमारा मन हर समय अनेक श्रृखलाओं में विभक्त रहता है।
उस विभक्त मन को एक
धारा में सूत्रबद्ध कर हम ध्यान
के प्रभाव के बारे में बात कर सकते हैं। मन को
सूत्रबद्ध करने की सैकड़ों विधियां हैं। उनको हम
आसानी से सीख सकते हैं। इसके साथ ही हमें यह सीखने
की भी जरूरत है कि मौन-नि:शब्द प्रार्थना कैसे की
जाती है?
इसी मौन-नि:शब्द प्रार्थना से हम अपने अंदर उतरते
हैं। यानी दो बातें सामान्य तौर पर हर प्रार्थना में
शामिल हैं। पहली श्वांस पर एकाग्रता और दूसरी है
मौन-नि:शब्द प्रार्थना। इन दोनों के एकाकार से हम
ध्यान को उपलध होते हैं। संसार के सभी धर्मग्रन्थों
में यही बातें समान रूप से बताई और सिखाई जाती हैं
कि सांस-सांस में भगवान का नाम बसना चाहिए।
| |
 |
यह मौन-नि:शब्द प्रार्थना हमारे हृदय के अत्यंत
नजदीक होती है। ऐसी प्रार्थना में हम शब्द शक्ति को
आंतरिक स्तर पर जपते हैं और ऐसी विधि
में कोई
धर्मग्रंथ,
कोई संप्रदाय कभी आड़े नहीं आता।
हिन्दू, मुस्लिम,
सिख,
ईसाई सभी एक साथ बैठकर प्रार्थना-सुमिरन कर सकते
हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अफ्रीका
के छोटे गांवों तक जहां भी मैं जाता हूं,
इसी एक प्रार्थना विधि
का उपयोग करता हूं। मुझे खुशी होती है कि कभी किसी
को कोई परेशानी नहीं होती। सबको अपने-अपने हिसाब से
जो ठीक लगे उस नाम का सुमिरन करना चाहिए। नाम अनेक
काम एक। यही मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है।
मैं परिव्राजक हूं। मुझे लगता है कि जैसे कर्ण कवच
और कुंडल पहनकर पैदा हुए थे,
उसी तरह मैं पैर में चक्र डालकर
पैदा हुआ हूं। पिछले साठ सालों से निरंतर यात्रा
मेरा स्वभाव बन गया है। चीन के महान संत लाओत्से ने
जहां अपने मार्ग का प्रतिपादन किया था,
उस प्रशांत स्थान पर भी गया हूं
और वहां भी गया हूं जहां इंडोनेशिया में
ऋषी
भारद्वाज ने गज-गुहा बनाकर
ध्यान
किया। अपने इस यात्रा क्रम में पश्चिम अफीका के
देशों में भी गया। जहां-जहां भी गया वहां पूछा कि
यहां की स्थानीय भाषा में भगवान का क्या नाम है?
मुझे आश्चर्य होता है कि जितनी
भी भाषाओं में भगवान के नाम हैं वे सब मांत्रिक हैं।
यह सब कैसे संभव है?
अलग-अलग भूभागों और संस्कृतियों में बिखरे
जनसमुदायों के बीच यह कौन सी
धारा
है जो समानांतर रूप से बह रही है?
मन में सहज ही यह सवाल आता है कि
उस
धारा
को बहानेवाले अनाम लोग कौन हैं?
आजकल भारतीय सभ्यता और संस्कृति को राष्ट्रवाद का
हिस्सा बना दिया गया है। परंतु प्राचीन भारतीय
सभ्यता को समझना हो तो अथर्ववेद का मातृभूमि सूक्त
देखना चाहिए जिसमें कहा गया है,
''जन विभ्रती बहुथा विवाचर्स,
नानाधर्माणं
पृथिवी यथौकसम्''।
यह पृथ्वी अनेक भाषाओं को बोलनेवाले,
अनेक
धर्मों
का पालन करनेवाले और अनेक प्रकार के घरों में रहने
वाले लोगों को
धारण
करती है। मैं दुनिया में जितना घूमता हूं,
यह सूक्त मुझे लोगों के और करीब
जाने का मौका देता है। उनके
धर्म,
कला,
संस्कृति और आध्यात्म से मैं अपने आप को एकाकार पाता
हूं। भगवान भी तो यही कहते हैं- 'ये
यथा मां प्रपद्यंते तांस्थैव भजाम्यहम्।'
भगवान ने कभी भक्त के सामने
मार्ग का भेद नहीं रखा। उनकी ओर जो जिस मार्ग से
जाता है वे उसे उसी मार्ग से आगे बढ़ाते हैं। फिर यह
सवाल ही कहां पैदा होता है कि किसी एक मार्ग से ही
मनुष्य का उद्धार होगा?
मैं यह कभी नहीं मानता कि
धर्म
परिवर्तन करके ही मनुष्य का उद्धार होगा।
फिर भी एक बात जो समान रूप से मैंने पूरी दुनिया में
देखी है,
वह है हर संस्कृति में
ध्यान
का प्रभाव। मैं इसे इतिहास का विषय नहीं बनाना
चाहता। शायद और लोगों ने भी इसे इतिहास का विषय
बनाने के बारे में न सोचा होऋ इसीलिए आज हमें
ध्यान
की संस्कृति का इतिहास नहीं मिलता।
ध्यान
के दर्शन पर बहुत कुछ कहा गया है,
लेकिन
ध्यान
के प्रभाव के बारे में कुछ खास नहीं मिलता।
ध्यानमार्ग
पर चलने और उसकी अनुभूतियों को प्रकट करने के लिए
दुनिया के सभी
धर्मग्रंथों
में विधियों
का उल्लेख है। हम लोग जब ईसाई चर्चों में जाकर बोलते
हैं तो वहां बाईबल से ही
ध्यान
की परंपरा का प्रतिपादन करते हैं। हम लोगों को यह
नहीं मालूम है कि ईसाई परंपरा में भी
ध्यान
की विधियों
का भरपूर उल्लेख है। ग्रीस देश में माउंड एथोस
सैकड़ों वर्गमील में
फैला
है। वहां सामान्य लोगों के जाने पर पाबंदी है। आप
जानते हैं क्यों?
क्योंकि वहां पिछले आठ सौ वर्षों
से संत लोग इसी श्वांस साधना
से प्रार्थना का अभ्यास कर रहे हैं। इसी तरह सूफी
संतों की परंपरा है।
संसार में जहां भी
ध्यान
प्रक्रिया सिखाई गई उन सबके व्याकरण में एक चीज समान
रूप से पाई जाती है वह है श्वांस पर
ध्यान।
ईसाई,
सूफी,
ताओ,
जेन आदि परंपराओं
में यह समान रूप से मौजूद है। जेन शब्द
ध्यान
का अपभ्रंश है। संस्कृत के शब्द
ध्यान
का उच्चारण महात्मा बुद्ध
ने झान के रूप में किया और सदियों पूर्व जब कश्यप
मातंग भारतवर्ष से चीन गए और चौथी शताब्दी में कुमार
जीव जैसे संतों ने
ध्यान
के ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया तो ह्नेनसांग,
फा''यान,
बोधिधर्म
इन सब लोगों ने झान की जगह छान् शब्द का उपयोग किया।
यही परंपरा चीन और कोरिया के विद्वानों ने जापान को
सिखाई तो यह छान जापान में झेन बन गया। इसे भारत के
सांस्कृतिक विस्तार के रूप में देखा जाता है। चीन,
इंडोनेशिया,
कंबोडिया आदि देशों के साथ भारत
के प्राचीन रिश्तों में
ध्यान
की भूमिका में केवल सांस्कृतिक संबंध
नही हैं। संस्कृतियों के विकास के मूल में भारतीय
योगी थे।
बाली,
यवद्वीप
(जावा)
में आज भी
ऋषि भारद्वाज,
अगस्त्य और मार्कण्डेय का नाम
लिया जाता है। ये ध्यानी और योगी वहां इसलिए नहीं गए
कि वे किसी संस्कृति विशेष का प्रचार करेंगे। बल्कि
उन्होंने स्थानीय संस्कृति विशेष को ही लेकर वहां
अध्यात्म जागृत किया और उसी संस्कृति में ही
ध्यान
का प्रभाव डालकर उसे नया रूप दे दिया। आजकल मजाक में
यह कहा जाता है कि शायद अमेरिका में पैसा बहुत अधिक
है,
इसलिए हर योगी अमेरिका की ओर
भागा जा रहा है, लेकिन आप
लोगों को बता दूं कि पांच-छह हजार वर्षों से भी पहले
से भारत के योगी संसार के दूसरे हिस्सों में जाते
रहे हैं। बेलग्रेड के संग्रहालय में एक पात्र है
जिसे गुन्देस्त्रुन् काल्ड्रन कहा जाता है,
जो मोहनजोदड़ों के प्रतीक चिन्ह
पर अंकित है। ओस्लो,
नार्वे के कोन्-तिकि संग्रहालय में बहुत साल पहले
मैं गया था। वहां मैंने एक छोटी सी बुद्ध
की मूर्ति देखी। उस मूर्ति के नीचे यह लिखा हुआ था
कि छठी शताब्दी में एक नार्वेजियन महिला के शव के
उपर
यह मूर्ति रखी गई थी। छठी शताब्दी में कौन
नार्वेजियन महिला रही होगी जिसने यह कहा था कि मेरी
मृत्यु के बाद ध्यानी बुद्ध
की यह मूर्ति मेरे हृदय पर रखकर मुझे दफन करना?
यह सवाल तो उठना ही है कि यह
परंपरा नार्वे तक कौन लेकर गया?
बचपन में डाक्टर रघुवीर के व्याख्यानों से मैं बहुत
प्रेरित हुआ था। उस समय ही मेरे मन में यह इच्छा
जागृत हुई थी कि जहां-जहां भारतीय योगी और
संत-महात्मा गए हैं,
उनके पदचिन्हों पर चलते हुए मैं
भी वहां जाऊं और देखूं कि उन्होंने किया क्या है?
दुर्भाग्य से उसके प्रतीक
भारतवर्ष में नहीं पाए जाते,
वे खो गए हैं। इतिहास इसलिए नहीं
बन पाया कि योगी कभी अपना नाम करने के लिए कुछ नहीं
करते। वे नहीं चाहते कि इतिहास में उनका नाम लिखा
जाए। ऐसे योगी तो कहीं भी बैठ जाते हैं और उनका
सात्विक तेज है कि लोग उनके पास खिंचे चले आते हैं।
अतीत में योगी जहां-जहां गये थे,
उनमे से कुछ स्थानों पर मैं गया
हूं और सैकड़ों वर्षों बाद भी उनकी सात्विक उर्जा को
उस भूमि में मैंने अनुभव किया है।
ध्यान
का दुनिया की सभी संस्कृतियों पर प्रभाव है। इसकी
छोटी सी झलक उस समय देखने को मिली जब मेरे आश्रम में
ध्यान
संस्कृतियों का अंतरराष्ट्रीय उत्सव किया गया था।
जैसे हमारे यहां तुलसी पवित्र मानी जाती है,
वैसे ही कोरिया और जापान में चाय
पवित्रा मानी जाती है। इसलिए वहां चाय से कुछ विशेष
प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं। उन्होंने जो चाय प्रदान
करने का पूजा संस्कार किया उसी में सब लोग
ध्यानस्थ
हो गए। इंडोनेशिया के दक्षिण
सुलावेसी द्वीप से जो नर्तक आए थे उन्होंने
ध्यानावस्था में नृत्य किया और दर्शक ध्यानावस्थित हो
गए। भारत में कलाओं पर
ध्यान
का प्रभाव तो है ही। विश्वभर में कहां-कहां
ध्यान
का प्रभाव है,
इसका इतिहास लिखने की आवश्यकता
है। फ्रेच वेस्ट अफ्रीका में उवूदा नाम का कस्बा
है जो वूदू परंपरा का पवित्र स्थान है। वहां के
लोगों ने सुना था कि हिमालय का कोई योगी आ रहा है।
वह ऐसे ही कुआं,
झोपड़ी और
गाय-भैसों का गांव है जैसे भारत के गांव होते हैं।
उनको नहीं मालूम कि हिमालय कहां है। फिर भी उन्होंने
उस हिमालय के योगी का स्वागत करने के लिए अपनी
परंपरा के अनुसार तीन पुरोहितों को चुना। उन तीनों
ने दस दिन का एकांतवास और बिना नमक और बिना मांस का
उपवास किया। आपको आश्चर्य हो सकता है कि वूदू परंपरा
में भी उपवास में नमक और मांस वर्जित है। यह विधि
उन्हें किसने सिखाई?
परंतु इसमें आश्चर्य करने की भला क्या बात है?
अगर प्रभु सर्वव्यापक हैं तो वे
इस देश में इस देश की भाषा में ज्ञान देंगे और दूसरे
देश को वहीं की भाषा में ज्ञान देंगे। हर देश में
वहां के अनुसार ही वे आकृति
धारण
करते हैं। इसीलिए भारत के बुद्ध
का चेहरा भारतीय है,
तिब्बत के बुद्ध
का चेहरा तिब्बती है,
चीन के बुद्ध
का चेहरा चीनी है और जापान के बुद्ध
का चेहरा जापानी है और केरल में जो मदर मेरी हैं वे
साड़ी पहनती हैं। आप अलग-अलग बांटकर विश्लेषण करते
रहिए,
जिस शक्ति को जुड़ाव करना है,
वह तो ऐसे ही रास्तों से जुड़ाव
के सूत्र पैदा कर देता है।
दुनिया के किसी भी हिस्से में आप चले जाइए,
आपको
ध्यान
के प्रभाव दिखाई पड़ जाएंगे। थाईलैण्ड,
चीन,
कोरिया, जापान,
रूस-सब जगह ऐसे शरीर आज भी आपको
मिल जाएंगे जिन्होंने
ध्यान
की अवस्था में प्राणोत्सर्ग किया,
जिनके शरीर तथाकथित मृत अवस्था
में बिल्कुल ताजे बने हैं और वे आज भी सुरक्षित हैं।
चीन की सांस्कृतिक क्रांति के बाद आज भी ऐसे स्थान
छिपाकर रखे गए हैं जो कभी
ध्यान
संस्कृति के केन्द्र बने थे। जितना मार्शल आर्ट है,
वह शाओलिन मठ से निकलता है। केरल
की कलारी मार्शल आर्ट और ताओ परंपरा में जो मार्शल
आर्ट है,
उनको मिलाकर जो
विधि
बनी वह आज की ओरिएंटल मार्शल आर्ट है। आप कुंगफू और
ताईक्वांडो देखते हैं,
लेकिन आपको नहीं पता कि उसमें
योग का कितना अंश है।
संस्कृत अनेकों लिपियों में लिखी गई है। तमिल
क्षेत्र में ग्रंथम लिपि में लिखी गई है। कश्मीर आदि
में शारदा लिपि में लिखी गई,
जिसमें से गुरुमुखी निकली है।
नन्दिनागरी, देवनागरी और
ब्राह्मी लिपियां भी हैं। चीन का उदाहरण लें तो उसकी
खासियत यह है कि उस लिपि में आप बाहर का कोई शब्द
नहीं ले सकते। तो हमारे यहां से जो योगी गए उन्होंने
एक अलग लिपि का विकास किया,
उसका नाम है- सिद्धम्
लिपि। आज भी चीन और जापान में जितनी मंत्र विद्या है
वह सिद्धम्
लिपि में लिखी व पढ़ी जाती है। प्राचीन देवनागरी को
अगर चाईनीज ब्रश स्ट्रोक से लिखेंगे तो वह सिद्धम्
लिपि हो जाती है। आपको आज भी चीन,
कोरिया,
जापान,
में इन लिपियों के अवशेष मिल
जाएंगे।
आज हमें जो सांप्रदायिक समस्याएं पूरी दुनिया में
दिख रही हैं,
उनके समाधान
पिछले सैकड़ों वर्षों से जनता देती आई है। सीरिया में
मुसलमान महिलाएं चर्च के पादरियों से आशीर्वाद लेने
जाती हैं। गुरुग्रंथ साहिब पढ़कर देखिए। उसमें भगवान
के
36 नाम हैं। अल्लाह भी है और राम
भी। आस्ट्रिया के इंसब्रुक विश्विद्यालय ने अभी हाल
में मेरे कुछ प्रवचन करवाए थे। वहां भी मैंने यही
बात कही कि आप विश्वशांति की बात करते हैं लेकिन
अंदर अशांति रहेगी तो बाहर शांति कैसे होगी?
दुनिया के राजनेता,
रणनीतिकार शांतभाव से जब कोई
योजना बनाएंगे तो वह अकल्याणकारी कैसे हो सकती है?
इस आंतरिक शांति को सबको पाने का
अधिकार
है। अपने आश्रमों में यही सिखाते हैं कि जो कुछ आप
सीख गए हैं,
उसे भूला कैसे जाए?
क्योंकि अंदर जो कुछ भरा है वह
जब तक खाली नहीं होगा तब तक न मौन उतरेगा और न ही
सच्ची शांति प्राप्त होगी। अपने को शांत करने की
शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है और अपने शांत मन
से दूसरों को शांत करने की शक्ति संसार की दूसरे
नंबर की सबसे बड़ी शक्ति है। आप उसी शक्ति की उपासना
करें।
संपर्क:
स्वामी राम साधक
ग्राम,
वीरपुर खुर्द,
वीरभद्र रोड़,
पशुलोक,
ऋषिकेश
(उत्तराखंड) |