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 दिसंबर,  2007

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डॉ. अरुणा सीतेश का निधन

 

दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ महिला कालेज की प्राचार्या डॉ. अरुणा सीतेश का सोमवार दिनांक 19 नवम्बर, 2007 को दिल्ली के संत परमानन्द अस्पताल में निध्न हो गया। अंग्रेजी की प्राध्यापिका डॉ. अरुणा सीतेश प्रख्यात शिक्षाविद् थीं तथा जानी-मानी कथाकार थीं। उनका 'छलांग' कहानी-संग्रह काफी चर्चित रहा। देश-विदेश में उन्हें अनेक पुरस्कार, सम्मान तथा फैलोशिप प्रदान हुए। वे अंग्रेजी की चर्चित पत्रिका 'प्रतिभा इंडिया' की संपादक भी थीं।

हुसैन का विरोध

 

दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय द्वारा विवादास्पद चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किए जाने के फैसले का देशव्यापी विरोध देखने में आया। इस सम्मान समारोह में अतिथि के रूप में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और मानव संसाधन विकास मंत्री को भी आमंत्रित किया गया था। उल्लेखनीय है कि आखिरी समय पर हुसैन यह सम्मान हासिल करने नहीं आए।हालांकि, इसके बावजूद हुसैन का विरो जारी है। पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रांतीय संयोजक शरद अग्रवाल के नेतृत्व में जबलपुर शहर में एक विरो प्रदर्शन हुआ। जिसके बाद राष्ट्रपति के नाम एकज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा गया। इस ज्ञापन में हुसैन को मिलने वाले सम्मान पर आधिकारिक रोक लगाने की मांग की गई। इससे पहले लार्डगंज चौराहे पर हुसैन द्वारा बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। जिसमें शहर की जनता ने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह हुसैन ने कुत्सित मानसिकता का परिचय देकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले चित्र बनाए हैं।

उर्जा संयंत्र का उद्घाटन

देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. प्रणव पण्डया और कुल संरक्षिका शैल जीजी ने ग्राम प्रबंधन विभाग की गौशाला में बैल की शक्ति से संचालित पांच हार्स पावर वाले ऊर्जा संयंत्र का उद्धाटन किया। गोवर्धान पूजन के अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और कर्मचारियों ने रंगारंग छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य भी प्रस्तुत किया।

उद्धाटन से पूर्व कुलाधिपति और कुलसंरक्षिका ने मंत्रोच्चार के बीच गौओं का तिलक, पूजन एवं दोहन किया। बाद में विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस एवं देश भर से आए गायत्री परिवार के सदस्यों को संबोधित करते हुए कुलाधिपति ने कहा कि गौवंश ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। गाय का दू जहां जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला अनुपम पेय है, वहीं गोबर एवं गौमूत्र से कीटनाशकों समेत अनेक कुटीर उद्योग संचालित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि दू में कैल्शियम की वृद्धि के लिए विदेशी गायों के चारे में हड्डियों का चूरा मिलाने की परंपरा है। इससे इन गायों का स्वभाव सात्विक नहीं रह गया है। ऐसे में गायों की सात्विक भारतीय नस्ल को बचाने और बढ़ाने की और अधिक जरूरत है।

भगवान कृष्ण के गोपालक स्वरूप की याद दिलाते हुए कुलाधिपति ने कहा कि बैलों के संरक्षण के लिए उनको आर्थिक रूप से उपयोगी बनाने की आवश्यकता है। बैलों द्वारा संचालित र्जा संयंत्रें को लोकप्रिय बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि ग्राम प्रबंन विभाग में वृषभ शक्ति से चलने वाले उर्जा संयंत्र से अभी चारा काटने की मशीन संचालित होगी। बाद में इस मशीन की क्षमता बढ़ायी जाएगी, जिससे थ्रेशर एवं चक्की के साथ-साथ जेनरेटर भी संचालित करने की योजना है।

ग्राम प्रबन्धान विभाग की गौशाला में भारत के विभिन्न प्रांतों से लायी गई साहीवाल, गिर, हरियाणवी आदि नस्ल की गायों का जिक्र करते हुए डा. पण्डया ने बताया कि शांतिकुंज एवं विश्वविद्यालय के ग्राम प्रबन्धान विभाग द्वारा प्रशिक्षित व्यक्तियों के माध्यम से देश भर में दो सौ से अधिक आुनिक गौशालाएं चल रही हैं, जिनके जरिये अनेक लोग स्वावलम्बी हुए हैं। आने वाले समय में विश्वविद्यालय के घटक महाविद्यालयों में संचालित ग्राम प्रबन्धान विभाग के जरिए इस काम को और आगे बढ़ाया जाएगा।

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