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 दिसंबर,  2007

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आदिवासी नायकों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाये

डा. सुरेश मिश्र

 

भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आम लोगों के विद्रोह पर अभी तक बहुत कम लिखा गया है। जमींदारों अथवा किसानों, खेत मजदूरों अथवा कारीगरों, औद्योगिक मजदूरों अथवा मध्य वर्ग के जीवन के हालातों और उनकी चेतना के बदलाव का विश्लेषण करते हुए कोई वास्तविक इतिहास नहीं रचा गया है। इस महत्वपूर्ण कमी के कारण भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में एक शून्यता जैसी दिखती है। इस शून्यता को भरने के लिये हमें भारत भर में व्यापक रूप से फैले उन जनजातीय समुदायों के इतिहास को नजदीक से देखना होगा जिन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा के लिये अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। आदिवासियों के इन विद्रोहों की शुरुआत प्लासी युद्ध (1757) के ठीक बाद ही शुरू हो गयी थी और यह संघर्ष बीसवीं सदी की शुरुआत तक चलता रहा

मोआमारिया विद्रोह 1769 में शुरू होकर तीस साल तक चलता रहा। इसी प्रकार चकमा लोगों ने भी उसी दौरान विद्रोह किया। हो, खसिया, सिंगफो और अका जनजाति के लोगों ने उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक में ब्रिटिश शासकों की नाक में दम कर दिया। असम के वनांचल के गारों, अबोरों और लुशाइयों ने भी उन्नीसवीं सदी के मध्य में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। असम में कछार इलाके में 1882 में नागाओं ने अंग्रेजों पर आक्रमण किया।

आदिवासियों के इलाके में बाहरी मैदानी क्षेत्रों के लोग यानी साहूकार, व्यापारी और ठेकेदार घुसते रहे। इन्हें दिकू कहा जाता था और ये संथालों के शोषक थे तथा उनकी घृणा के पात्र थे। ब्रिटिश शासन इनके संरक्षक के रूप में काम करता था। इसके अलावा आदिवासियों में प्रचलित सामूहिक स्वामित्व की अवघारणा को मान्यता न देकर ब्रिटिश कानून व्यवस्था में निजी स्वामित्व को ही मान्यता दी गयी थी जिससे आदिवासी समाज में तनाव की स्थिति पैदा होते देर न लगी। ईसाई मिशनरियों को भी आदिवासियों ने अपना विरोधी समझा। क्योंकि, वे आदिवासियों के घार्मिक विश्वास पर चोट पहुंचा रहे थे। अंग्रेज सरकार के वन कानूनों ने भी आदिवासियों को अंग्रेजी शासन का विरोधी बना दिया। यह स्थिति देश के सभी आदिवासी इलाकों में एक सी थी। फल यह हुआ कि शुरू से ही छिटपुट हिंसक विद्रोहों के रूप में आदिवासियों की नाराजगी प्रकट होने लगी।

पूर्वी भारत के आदिवासी समुदायों ने लम्बा संघर्ष किया। मोआमारिया विद्रोह 1769 में शुरू होकर तीस साल तक चलता रहा। इसी प्रकार चकमा लोगों ने भी उसी दौरान विद्रोह किया। हो, खसिया, सिंगफो और अका जनजाति के लोगों ने उन्नीसवीं सदी के तीसरे दशक में ब्रिटिश शासकों की नाक में दम कर दिया। असम के वनांचल के गारों, अबोरों और लुशाइयों ने भी उन्नीसवीं सदी के मध्य में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। असम में कछार इलाके में 1882 में नागाओं ने अंग्रेजों पर आक्रमण किया। उड़ीसा में गंजम के आदिवासियों ने और कटक के पाइकों ने विद्रोह किया। 1885 में पश्चिम बंगाल, झारखण्ड और कटक के संथालों ने जबरदस्त विद्रोह किया। उसके बाद खेरवाड़ अथवा सपाहार आन्दोलन उठा जो अंग्रेजों के राजस्व बन्दोबस्त कानून के खिलाफ था।

र पूर्वी समुद्र तट में स्थित विशाखापट्टनम एजेन्सी में कोरा मल्लया नाम के व्यक्ति के नेतृत्व में लोग उठ खड़े हुए। गोदावरी एजेन्सी की पहाड़ियों में 1879-80 में रम्पा विद्रोह हुआ, जिसका केन्द्र था चोडावरम का रम्पा क्षेत्र। यहां के पहाड़ी मुखियों याने मुट्टादारों ने अपने स्वामी मनसबदार के खिलाफ विद्रोह कर दिया और बाद में यह अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में बदल गया। क्योंकि, अंग्रेजी शासन मनसबदार को सहायता दे रहा था। दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में और महाराष्ट्र के वनांचल में भी आदिवासियों ने ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध संगठित विद्रोह किये।

रांची के दक्षिणी इलाके में 1899-1900 में हुए बिरसा मुण्डा के प्रसिद्ध विद्रोह को कौन नहीं जानता। बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में मुण्डा आदिवासियों ने जो विद्रोह किया वह भारत के आदिवासी विद्रोह में सबसे प्रखर माना जाता है। मैदानों से आए व्यापारियों, साहूकारों और ठेकेदारों ने मुण्डा समुदाय में प्रचलित सामूहिक भू-स्वामित्व की पारंपरिक व्यवस्था को जिसे खूंटकट्टी भू-व्यवस्था कहा जाता था। उसे ध्वस्त कर दिया था। इन बाहरी लोगों की बेगारी से मुक्त होने के लिये मुण्डा लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। लेकिन, काम नहीं बना, उल्टे ब्रिटिश शासन ने शोषकों का ही पक्ष लिया। तब मुण्डा लोगों ने विद्रोह की शरण ली।

ध्यप्रदेश में भी गोंड और भील आदिवासियों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध शस्त्र उठाए। 1842 के बुन्देला विद्रोह के समय उन्होनें लोधियों और बुन्देला ठाकुरों का सहयोग किया। इसके पन्द्रह साल बाद जब 1857 का विद्रोह हुआ तब नर्मदांचल में शंकरशाह गोंड और उसके बेटे रघुनाथ शाह को उनकी विद्रोहात्मक गतिविधियों के कारण 1857 में जबलपुर में तोप से उड़ा दिया गया। इसके बावजूद उस इलाके में गोंडों की हिम्मत नहीं टूटी और जबलपुर जिले के मदनपुर के मालगुजार ढिल्लनशाह गोंड, भुटगांव के महिपाल सिंह गोंड, मानगढ़ के राजा गंगार गोंड, और नन्नी कोंडा के देवीसिंह गोंड ने विद्रोह किया। सागर के कुनोर गांव के भगवानसिंह गोंड ने भी ऐसा ही किया। उर मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से में बड़वानी के इलाके में खाज्या नायक, भीमा नायक, सीताराम कंवर और रघुनाथ मण्डलोई ने भी भीलों को बड़ी तादाद में एकत्र करके ब्रिटिश अधिकारियों की नाक में दम किया।

जनजातीय विद्रोहों की यह सूची सिर्फ एक बानगी है। असल में पूरे भारत में अंग्रेजी शासन की रीति-नीति के कारण आदिवासियों ने विद्रोह किया। अपने सीमित साधनों से वे लम्बे समय तक संघर्ष कर पाए। क्योंकि, वनांचल में गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का उन्होंने उपयोग किया। सामाजिक रूप से उनमें आपस में एकता थी और अपनी संस्कृति को बाहरी प्रभाव से बचाने की उन्हें चिन्ता भी थी। इन बातों ने उनमें एकजुटता पैदा की और वे शोषण तथा विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ उठ खड़े हुए। संगठन और साधनों की कमी के कारण हालांकि ये विद्रोह कामयाब नहीं हुए। लेकिन, इनका सुदूरगामी प्रभाव पड़ा और ब्रिटिश शासन को यह सोचने के लिए विवश होना पड़ा कि आदिवासियों के हितों और उनकी पारंपरिक संस्कृति की उपेक्षा करना महंगा पड़ सकता है। विदेशी ताकत के खिलाफ होने वाले भारतीय स्वाधीनता संग्राम में इन आदिवासियों की भूमिका को रेखांकित किया जाना जरूरी है जिससे आने वाली पीढ़ी उनके उत्सर्ग से प्रेरणा ले सके।

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