भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका
 

दिसंबर  2007

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पुराने तरीके में छिपा है समाधा फिर भी आर्थिक असमानता तो थी ही। इस असमानता के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए हमारे यहां धार्मिक नियम बनाए गए। जीवन मूल्यों के स्तर पर भोग के स्थान पर त्याग को स्वीकृति, मान्यता और प्रतिष्ठा दी गई। 'सौ हाथ से कमाओ और हजार हाथ से दान करो' का सूत्र कूट-कूट कर समाज में भरा गया। इस कारण प्राचीन भारतीय समाज में आर्थिक असमानता होते हुए भी अशांति और अभाव नहीं रहा। >>विस्तार

 

नंदीग्राम का सच (वेद पताप वैदिक) मई 2006 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 235 सीटें जीतने वाले बुद्धदेव भट्टाचार्य इतनी जल्दी फीके क्यों पड़ गए हैं? वे इतने असहाय और निरुपाय क्यों दिखाई पड़ रहे हैं? बुरी तरह चुनाव हारने वाली तृणमूल नेता ममता बनर्जी अचानक बंगाली जनमत पर हावी क्यों होती जा रही है? >>विस्तार

 

ये कैसी विदेश नीति (ऋतेश पाठक) भारत-रूस संबंधों में आयी इस तल्खी ने कहीं न भारत-अमेरिका संबंधों की ओर इशारा किया है। अधिकतर विश्लेषकों ने इस घटना को इन तीन देशों की सीमाओं में बां कर देखा। लेकिन हम अपने नजरिए को और विस्तार दें तो पाएंगे कि मामला सिर्फ इन महाशक्तियों से संबंधों का नहीं, बल्कि भारत की अस्पष्ट विदेश नीति का है। >>विस्तार

 
 

 गैरबराबरी का मारा हिन्दोस्तां मारा (हिमांशु शेखर ) माजिक समरसता के नाम पर राजनीतिज्ञ सियासत करते हैं, वोट बटोरते हैं और सत्ता में आने पर बदले में विषमता को गति देने वाली नीतियों पर मुहर लगाते हैं। आज भी देश में लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं, करोड़ों को भर पेट भोजन और तन ढ़कने के लिए वस्त्र नहीं मिल पाता है   >>विस्तार

 
 

आर्थिक असमानता की आग (प्रदीप सिंह) वंचितों और आदिवासियों की जनादेश यात्रा के दिन ही दिल्ली में मैराथन भी आयोजित की गई थी। इस यात्रा में शामिल हुए सत्याग्रहियों का सूखा चेहरा भारत की सत्तर फीसदी आबादी की तस्वीर पेश कर रहा था, वहीं दिल्ली मैराथन ने हमारे देश के बीस प्रतिशत नवधनाढ्यों, पूंजीपतियों और फिल्मी नायकों का प्रतिनिधित्व किया।  >>विस्तार

 
 

पृथ्वी पर जीवन का भविष्य (रमेश कुमार शर्मा)  पृथ्वी पर जीवन के भविष्य को लेकर आज के युग का निराशावाद-प्रदूषण विषाक्ताता, प्रजाति विलोप एवं आधुनिक मानव की पर्यावरण विमुखता की ओर संकेत करता है। >>विस्तार

 
 

ध्यान का वैश्विक प्रभाव (स्वामी वेद भारती) ध्यान के दर्शन पर बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन ध्यान के प्रभाव के बारे में कुछ खास नहीं मिलता। ध्यानमार्ग पर चलने और उसकी अनुभूतियों को प्रकट करने के लिए दुनिया के सभी धर्मग्रंथो में विधियों का उल्लेख है। >>विस्तार

 

लोक-कहावतों में खेती ज्ञान के स्वर  (जगन्नाथ 'विश्व') भारत के विभिन्न प्रान्तों में अपने-अपने भाव, भाषा एवं वेशभूषा के अनुरूप लोक-कहावतें जन-जन के मुख पर आती रहती हैं। इन कहावतों में मानवीय जीवन की प्रत्येक हलचल का सही चित्रण हमें देखने को मिलता है। ऐसी ही कुछ कहावतें हैं >>विस्तार

 

आदिवासी नायकों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाये  (डा.सुरेश मिश्र)  असम के वनांचल के गारों, अबोरों और लुशाइयों ने भी उन्नीसवीं सदी के मधय में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।      >>विस्तार

वनवासी छापामार:  तलक्कल चन्दू >>विस्तार

महानायक टंटया भील शीला मिश्र  >>विस्तार

 

नैतिक समाज की आवश्यकता (डा. दाउजी गुप्त) भारतीय साहित्य कहता है कि 'सुधेव कुटुम्बकम' यानी सम्पूर्ण विश्व हमारा परिवार है। इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी दूसरे देश पर आव्रफमण नहीं किया बल्कि सहड्डों आक्रमण सहने के उपरान्त भी अपनी सीमाओं में प्रवेश करने वाले विदेशियों को आत्मसात किया है। यही कारण है कि विश्व में मानवाधिकारों के हनन पर सबसे अधिक प्रतिक्रिया भारत में होती है, यद्यपि इस संबं में सबसे अधिक बहस अमेरिका और यूरोप में होती है।>>विस्तार

भीड़ की भड़ास (विजय कुमार मिश्र) देश के कुछ हिस्सों में महज चोरी की कुछ घटनाओं की प्रतिक्रिया में लोगों की भीड़ ने निर्दयता और क्रूरता से आरोपियों की पिटाई की है। यह लोगों की बढ़ती अधीरता और खोते नियंत्रण की सूचना देने के साथ-साथ भीड़ के मनोविज्ञान को समझने के कुछ सूत्र भी थमा जाता है। >>विस्तार

 कहानी

 

अपना अपना भाग्य (जैनेन्द्र कुमार) भागते, खेलते, हंसते, शरारत करते लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली-पीली आंखें फाड़े, पिता की उंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे। अंग्रेज पिता थे, जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हंस रहे थे और खेल रहे थे। उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गी को अपने चारों तरफ लपेटे धन-संपन्नता के लक्षणों का प्रर्दशन करते हुए चल रहे थे। >>विस्तार

हलचल

 नींव का काम पूरा हो रहा है (श्री के.एन. गोविन्दाचार्य) चार जनवरी से छ: जनवरी, 2008 के बीच श्री गोविन्दाचार्य की पहल पर भारत विकास संगम का त्रिदिवसीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर भारतीय पक्ष की ओर से हिमांशु शेखर ने उनसे सम्मेलन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश... >>विस्तार

इस अंक के अन्य लेख-

विविधा

 वादे हैं वादों का क्या! नारे हैं नारों का क्या!        

>>विस्तार डा. सीतेश आलोक

चलती चाकी देखके

 एकलव्य: आम आदमी के जरिए खास संदेश  

>>विस्तार सूर्यकांत बाली भारतगाथा

  आइए प्लीज पुतला जलाइए                                   

 >>विस्तार अशोक गौतम व्यंग्य

पांच साल से नहीं हुई बिजली गुल              

>>विस्तार राकेश गिरी सार्थक प्रयास

 हुसैन का विरोध,                        
 
उर्जा संयंत्र का उद्धघाटन,                   
 डॉ. अरुणा सीतेश का निध      

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