भावी भारत कैसा हो? |
-के.एन. गोविन्दाचार्य
एक-आध प्रतिशत लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो लगभग देश की पूरी आबादी यही चाहती है कि देश का भविष्य अच्छा हो। लोग समृद्ध और सुसंस्कृत हों, यहां का पर्यावरण स्वच्छ हो, सीमाएं सुरक्षित हों और लोग अमन-चैन से रहें। आज जबकि देश आजाद है, हमारे ऊपर विदेशी शासकों की जकड़न नहीं है और बहुसंख्यक लोग देश के भले की सोच रहे हैं, तो प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या बात है जिसके कारण हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। उल्टे हमारी समस्याएं ही दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। बात की तह तक पहुंचने के लिए हमें पहले समाज की रचना पर गौर करना होगा।
जो लोग देश और समाज के बारे में अच्छा सोचते हैं, उन्हें तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला समूह वंचित समाज का है जो वर्तमान व्यवस्था का शिकार है। यह समाज का वह हिस्सा है जो देश के लिए तो अच्छा सोचता है, लेकिन उसकी खुद की स्थिति अच्छी नहीं है। वह दीन-हीन है और तमाम तरह के शोषण का शिकार है। दो वक्त की रोटी जुटाने में ही उसकी सारी ऊर्जा तिरोहित हो जाती है। देश की शासन व्यवस्था समाज के इस वर्ग को बोझ मानती है। दिनों-दिन विपन्नता के भंवर में धंसता जा रहा यह समाज किसी क्रांति का ईंधन बन सकता है, लेकिन चिंगारी पैदा करने की उसकी क्षमता क्षीण हो चुकी है। दुर्भाग्यवश देश की आधी से अधिक आबादी इसी श्रेणी में है। जब हम भावी भारत की तस्वीर बनाने के लिए बैठें तो इस वंचित वर्ग को सबल और सक्षम बनाना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
समाज का दूसरा वर्ग उन लोगों का है जो देश के लिए अच्छा-अच्छा सोचते हैं। वो देश के लिए बहुत कुछ कर भी सकते हैं। कई मामलों में वे कुछ करते भी हैं। लेकिन अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए वो देशहित को पीछे छोड़ने में भी नहीं हिचकते। उनकी प्राथमिकता में हमेशा उनका अपना स्वार्थ होता है। राजसत्ता और अर्थसत्ता के शिखर पर बैठे तमाम लोगों में से अधिसंख्यक आज इसी श्रेणी में शामिल हैं। वर्तमान व्यवस्था इन लोगों का पोषण करती है, इसलिए वे इसके सबसे बड़े हिमायती हैं।
संक्षेप में कहें तो समाज का यह स्वार्थी वर्ग है जो देश का हितैषी होने का ढोंग तो करता है, लेकिन वह देश के लिए वास्तव में कुछ ठोस सकारात्मक काम नहीं करता। उल्टे वह देश हित में काम करने वाली सच्ची ताकतों को रोकने, उन्हें नुकसान पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करने में ही लगा रहता है। उदाहरण के लिए दलाली और घुसखोरी के जरिए दौलत कमाने वाला कोई धनपति तमाम तरह के सामाजिक कार्यों में अपना पैसा लगाएगा, लेकिन वह किसी भी ऐसे प्रयास को सफल नहीं होने देगा जो उसके पैसा कमाने में अड़चन पैदा करती हो। कई बार तो ऐसे लोग अपने हितों के खिलाफ काम करने वाले लोगों की एक नकली फौज भी तैयार कर लेते हैं जो उनके लिए उत्पन्न असली चुनौतियों को नाकारा बना देती है। देश के उज्ज्वल भविष्य के रास्ते में ऐसे लोगों का समूह सबसे बड़ा खतरा है।
समाज में तीसरा समूह अपेक्षाकृत रूप से सबसे छोटा है। लेकिन भावी भारत के सभी सुंदर सपने इसी समूह के कंधों पर हैं। इस समूह के लोगों को हम सज्जन शक्ति का नाम दे सकते हैं। ये वो लोग हैं जिनके व्यक्तिगत हित और देश-हित में कोई अंतर्विरोध नहीं है। वंचित समाज को ऊपर उठाने और स्वार्थी समाज की नकेल कसने में इस समूह के लोग हमेशा लगे रहते हैं। इस प्रक्रिया में इनका स्वार्थी समाज के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टकराव प्राय: चलता रहता है। स्वाभाविक रूप से वंचित समाज को सज्जन शक्ति के साथ होना चाहिए लेकिन सहज रूप से ऐसा होता नहीं है। स्वार्थी समाज ऐसा मायाजाल बुनता है कि वंचित समाज उसे अपना दोस्त मान लेता है जबकि सज्जन शक्ति को वह अपनी प्रगति में रुकावट मानने लगता है।
उपर्युक्त तीन समूहों में बंटा समाज सार्वकालिक सत्य है। किसी भी एक समूह को पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है। लेकिन तीनों समूहों की संख्या, उनकी तुलनात्मक शक्ति और समाज में उनका प्रभाव निश्चित रूप से परिवर्तनीय है। यदि हम भावी भारत को एक स्वस्थ समाज के नाते देखना चाहते हैं तो हमारे सामने एक ही विकल्प है और वह है सज्जन शक्ति को मजबूत करना।
सज्जन शक्ति के प्रयासों को तीन भागों- बौद्धिक, रचनात्मक एवं आंदोलनात्मक में बांटा जा सकता है। इन तीन प्रकार की गतिविधियों के संतुलित प्रयास से ही किसी समाज को सजाने-संवारने एवं मजबूत बनाने की मुहिम सफल बनायी जा सकती है। बौद्धिक गतिविधियों के अंतर्गत समाज अपनी ताकत और अपनी कमजोरियों को पहचान कर अपने लिए विधिनिषेध तय करता है। रचनात्मक प्रयासों के अंतर्गत सज्जन शक्ति का जोर समाज को अंदर से मजबूत बनाने पर होता है। आंदोलनात्मक प्रयासों के केन्द्र में राजसत्ता होती है। राज्य की जनविरोधी गतिविधियों का विरोध करना आंदोलनात्मक गतिविधियों की मूल प्रकृति होती है।
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में आंदोलनात्मक गतिविधियों में लगी सज्जनशक्तियों की दो श्रेणियां हैं। पहली श्रेणी उनकी है जो चुनावी राजनीति में शामिल होकर सत्ता हासिल करना चाहते हैं ताकि उसका उपयोग जनहित में किया जा सके। यह अलग बात है कि जो लोग इस रास्ते अब तक सत्ता में पहुंचे हैं, उनमें से अधिकतर अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार नहीं रह पाए। दलीय राजनीति के जरिए सत्ता तक पहुंचे लोगों ने उसी आम आदमी की जिंदगी को मुश्किल बनाया जिसकी हितरक्षा के लिए वे तथाकथित रूप से सत्ता की दौड़ में शामिल हुए थे। न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष भी जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका है। विपक्षी दलों से यह अपेक्षा थी कि वे सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करते हुए उस पर अंकुश रखेगी। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। अर्थसत्ता और राजसत्ता के अपवित्र गठजोड़ ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
भारत में इस समय जो हालात हैं उसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों अमीर परस्त और विदेश परस्त नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं। ऐसे में देश की सज्जन शक्ति के लिए जरूरी हो गया है कि वह आम आदमी के हक की लड़ाई लड़ने के लिए नया निर्माण करे। शायद यही कारण है कि देश में स्थापित राजनीतिक दलों की बहुलता होने के बावजूद नए राजनीतिक समूहों का लगातार उदय हो रहा है जो सत्ता में पहुंचकर जनसेवा की इच्छा रखते हैं। यह सच है कि बाहुबल और धनबल के अंधाधुंध इस्तेमाल के दौर में नए आदर्शवादी राजनीतिक समूहों की पहचान नहीं बन पायी है, फिर भी दीर्घकालीन संदर्भों में उन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक तरीकों के असफल होने पर वो हिंसा के रास्ते पर चल पड़ेंगे, यह आशंका अब केवल आशंका ही नहीं बल्कि हकीकत बन चुकी है।
भारत में आंदोलनात्मक गतिविधि की दूसरी श्रेणी में वो समूह आते हैं जो स्वयं सत्ता हासिल नहीं करना चाहते, लेकिन वे सत्ता के स्थापित केन्द्रों पर नैतिक दबाव बनाने का पूरा प्रयास करते हैं। चुनावी हानि लाभ का भय और लोभ दिखाकर भी वे सत्ता में बैठे लोगों को सही रास्ते पर चलाने की कोशिश करते रहते हैं।
चालीस से अधिक वर्षों के अपने सामाजिक जीवन में मैंने देश के एक-एक कोने का दौरा किया है। वहां के लोगों से मैं मिला हूं। इस दौरान मैंने महसूस किया कि अपने देश में सज्जनशक्ति की सक्रियता चारो ओर लगातार बनी हुयी है। बौद्धिक, रचनात्मक एवं आंदोलनात्मक, तीनों प्रकार की गतिविधियों के द्वारा देश की सज्जनशक्ति राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटी हुयी है। देश का आम आदमी अपनी रुचि, प्रतिभा और संसाधनों के साथ उनका सहयोग करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। इस सबके बावजूद सज्जनशक्तियों का समाज पर सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखायी नहीं दे रहा है। इसके पीछे सज्जनशक्तियों का बिखराव मुख्य कारण है। उनमें आपस में कोई तालमेल नहीं है। प्राय: उनका दृष्टिकोण एकांगी होता है। देश की समस्याओं के प्रति समग्र दृष्टिकोण न होने के कारण प्राय: वे अनजाने में ही एक-दूसरे के विपरीत काम करने लग जाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि जमीन से जुड़ी सज्जन शक्तियों को किसी अति केन्द्रित सांगठनिक ढांचे में जकड़े बिना और उनकी स्वायत्तता तथा निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित किए बिना उन्हें मजबूत और प्रभावी बनाया जाए। इसके लिए सज्जनशक्तियों के बीच संवाद, सहमति और सहकार का विशेष महत्व है। इस प्रक्रिया के द्वारा उन्हें भावी भारत के एक समग्र रूप की कल्पना करनी होगी। सभी को मिलकर एक ऐसा चित्र बनाना है जिसके सभी हिस्सों में वो बेशक रंग न भरें लेकिन उन्हें मालूम हो कि कहां कौन सा रंग भरा जाना है। कौन चित्र को बदरंग करने की ताक में हैं, यह भी उन्हें मालूम होना चाहिए। उदाहरण के लिए गौरक्षा में लगे लोगों का मालूम होना चाहिए कि देश की नदियों को जोड़ने की योजना विनाशकारी है। उन्हें विदेशपरस्त और अमीरपरस्त राजनीतिक दलों की असलियत के बारे में मालूम होना चाहिए और साथ ही भारतपरस्त और गरीबपरस्त ताकतों को पहचानकर उनका साथ देने की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए। इसी प्रकार भारतपरस्त और गरीबपरस्त राजनीतिक ताकतों को तथा जल के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को मालूम होना चाहिए कि गौरक्षा के लिए कृषि का अंधाधुंध यांत्रिकीकरण ठीक नहीं।
ऐसी ढेर सारी बातें हैं जहां सज्जन शक्ति के लोग एक-दूसरे की ताकत बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उन्हें एक-दूसरे के कामों की समझ हो। बेशक वो काम अपने ही क्षेत्र में करेंगे, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में होने वाले कामों के महत्व और उसके अच्छे-बुरे पहलुओं की समझ से मदद मिलेगी। इसके लिए संपूर्ण सज्जनशक्ति के बीच भावी भारत को लेकर एक साझा लक्ष्य निर्धारित करने की कोशिश होनी चाहिए। सभी आयामों में आदर्श स्थिति प्राप्त करने के लिए आवश्यक नीतियों को स्पष्ट करता हुआ एक दृष्टिपत्र तैयार करना बहुत जरूरी है। यह दृष्टिपत्र तभी प्रभावी होगा जब इसे तैयार करने में किसी एक व्यक्ति या किसी संगठन विशेष की बजाय संपूर्ण सज्जन शक्ति अपना योगदान दे। एक साझा दृष्टिपत्र के आलोक में जब बौद्धिक, रचनात्मक प्रयासों के साथ-साथ आंदोलनात्मक गतिविधियों (चुनावी राजनीति की परिधि के भीतर और बाहर दोनों) में लगी संपूर्ण सज्जन शक्ति राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आगे बढ़ेगी तो हमें शीघ्र ही सकारात्मक परिवर्तन दिखायी देने लगेंगे। एक ओर जहां राजनीति मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर लौटती नजर आएगी, वहीं व्यवस्था परिवर्तन के व्यापक उद्देश्यों की भी पूर्ति हो सकेगी।
साझा दृष्टिपत्र के लिए एक पहल
गत 28 सितंबर को विजयादशमी के दिन श्री के. एन. गोविन्दाचार्य की वेबसाइट पर संपूर्ण सज्जन शक्ति के विचारार्थ एक दृष्टिपत्र जारी किया गया। इस दृष्टिपत्र को अग्रेसित करते हुए श्री गोविन्दाचार्य ने लिखा है: इस समय देश के समक्ष जो चुनौतियां हैं, उनसे निपटने के लिए नए रास्ते तलाशने की जरूरत है। अन्य बातों के साथ-साथ यह भी बहुत जरूरी हो गया है कि देश की राजनीति को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर वापस लाने के लिये पहल की जाए तथा देश में भारतपरस्त और गरीबपरस्त राजनीति को उभारने के लिए जनमानस तैयार किया जाए। आजकल देश में जो हालात हैं, उसमें राजसत्ता और थैलीशाहों के बीच एक अपवित्र गठजोड़ साफ दिखता है। इस कारण आम आदमी की जिंदगी दिनोदिन मुश्किल होती जा रही है। विपक्षी दलों से यह अपेक्षा थी कि वे सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करते हुए उस पर अंकुश रखेंगी। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा।
सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों अमीर परस्त और विदेश परस्त नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं। ऐसे में देश की संपूर्ण सज्जन शक्ति के लिए जरूरी हो गया है कि वह आम आदमी के हक की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए। इस लड़ाई का वैचारिक आधार तय करने के लिए यहां एक प्रारूप सभी के विचारार्थ प्रस्तुत है। इसके परिमार्जन तथा परिवर्धन में आप सभी सहभागी हों, ऐसी विनती है। आप अधिकाधिक लोगों तक इन्हें पहुंचाने में सहायता करेंगे, ऐसा आग्रह भी है। संवाद की यह प्रक्रिया आज विजयादशमी (28 सितंबर 2009) से मकर संक्रांति (14 जनवरी 2010) तक चलेगी। प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात मनीषी दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि (11 फरवरी 2010) को संशोधित दृष्टिपत्र जारी किया जायेगा।”
वेबसाइट पर दृष्टिपत्र का जो प्रारूप डाला गया है, वह चालीस से अधिक पृष्ठों में फैला हुआ है। हम यहां अपने पाठकों की सुविधा के लिए प्रारूप के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत कर रहे हैं। जो लोग पूरा प्रारूप पढ़ना चाहते हैं, वो वेबसाइट से उसे प्राप्त कर सकते हैं। -संपादक
भारत विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। हजारों वर्ष के कालक्रम में यहां के समाज में कई परिवर्तन हुए हैं। लेकिन आज भी हम अधिकतर उन्हीं विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से अनुप्राणित हैं जो हजारों वर्ष पहले गढ़े गए थे। भावी भारत का निर्माण तभी टिकाऊ होगा जब उसकी बुनियाद में हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्वस्थ परंपराएं होंगी। समृद्ध भारत का निर्माण करने के लिए हमारे पास प्रचुर प्राकृतिक संसाधन हैं। हमारी नदियां, हमारे पहाड़, हमारी कृषि भूमि, हमारी जलवायु विश्व में अद्वितीय हैं। आज हम अपनी तकदीर के खुद मालिक हैं। हमारे ऊपर किसी विदेशी शासन का नियंत्रण नहीं है। इन सारी सकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद हम विश्व बिरादरी में तीसरी दुनिया का तमगा क्यों ढो रहे हैं? क्यों हमारे देश की आधी से अधिक आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है। इन प्रश्नों का उत्तर पिछले साठ वर्षों के इतिहास में ढूंढा जा सकता है। जब हम पीछे देखते हैं तो पता चलता है कि अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के बाद हमारे नेताओं ने विकास के पश्चिमी माडल को अपनाया।
शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, न्याय, अर्थव्यवस्था आदि तमाम मामलों में उनके द्वारा गढ़ी गयी औपनिवेशिक व्यवस्था को मामूली फेरबदल के साथ जारी रखा। विदेशी शासन व्यवस्था और देशी शासको के इस अजीब मेल ने देश में समस्याओं का अंबार लगा दिया। विदेशपरस्त राजनीतिक नेतृत्व का जब अमीरपरस्त आर्थिक ताकतों के साथ गठजोड़ हुआ तो स्थितियां और विकराल हो गयीं। ऐसे में देश की जनता ने कई बार सत्ता परिवर्तन करके इस व्यवस्था के प्रति अपना असंतोष भी व्यक्त किया। लेकिन कुछ लाभ नहीं हुआ। सभी विचारधारा के लोगों को जनता ने सरकार में जाने और उसे चलाने का मौका दिया। कुछ दल व्यवस्था सुधारने के नाम पर भी सत्ता में पहुंचे। लेकिन सभी उसी व्यवस्था में खप गए। अब यह साफ हो गया है कि केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन संभव नहीं। देश के अनुकूल व्यवस्था बनाने के लिए हमें सत्ता के भीतर और सत्ता के बाहर दोनों ओर से प्रयास करना होगा।
मौजूदा व्यवस्था यदि विदेश परस्त और अमीर परस्त है तो हमें निश्चित रूप से एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो भारत परस्त और गरीब परस्त हो। भारतपरस्त से हमारा तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण से है जिसमें भारत की तासीर और तेवर के हिसाब से उसका रास्ता तैयार हो। पिछले साठ सालों में हर तरफ इस धारणा को आगे बढ़ाया गया है कि भारत में जो कुछ होता है वह गलत है और पश्चिमी देशों में जो कुछ होता है वही सही है। स्थापित राजनीतिक दलों में भी विचारधारा के स्तर पर इस सोच की झलक स्पष्ट तौर पर देखने को मिलती है। जब हम भारतपरस्त की बात करते हैं तो हमें यह स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि अमेरिका और यूरोप या चीन में जो हो रहा है वैसा ही भारत में होने की इच्छा रखना ठीक नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि अमेरिका के विकास में वहां की परिस्थितियों का अहम योगदान है और उसका विकास पथ वहां की खूबियों को ही समेटे हुए है।
इंग्लैंड और यूरोप या चीन का विकास पथ भी वहां की विशेषताओं को समेटे हुए है। इसलिए भारत का विकास पथ यहां की खूबियों को समेटते हुए ही तय किया जा सकता है। दूसरे की अंधाधुंध नकल करने से हमारा कल्याण नहीं हो सकता। हमारी नीतियां तो भारतीय संदर्भ में स्वदेशी और विकेंद्रीकरण के साथ-साथ जल, जमीन, जंगल, जन और जानवर के परस्पर समन्वय पर आधारित होनी चाहिए। इसी तरह जब हम गरीबपरस्त की बात करते हैं तो उसमें स्वाभाविक तौर पर समाज के सबसे आखिरी पायदान पर जीवन बसर करने वालों तक लाभ पहुंचाने वाली नीतियों का निर्धारण सबसे पहले आता है। हम जिस भारतपरस्त और गरीबपरस्त व्यवस्था की बात कर रहे हैं, उसमें जीवन के सभी क्षेत्रा शामिल हैं। कुछ प्रमुख क्षेत्रों में लागू की जाने वाली नीतियों का जिक्र यहां किया जा सकता है।
देश में स्वीकृत वर्तमान लोकतांत्रिक ढांचे में विधायिका तथा कार्यपालिका का घालमेल है। उसे दूर करने के लिये प्राचीन तत्वज्ञान से प्रेरणा लेकर विधायिका और कार्यपालिका की स्वतंत्र व्यवस्था हो जो भारत के लिये कल्याणकारी तथा विश्व के लिये मार्गदर्शक होगी।
लोकतंत्र में सत्ता की प्राप्ति चुनावों के माध्यम से ही होती है। पर वर्तमान चुनाव प्रणाली में ऐसे दोष हैं कि जनमत का सही प्रतिनिधित्व हो ही नहीं पाता है। जनमत सही परिलक्षित होने के लिये न्यूनतम चार सुधारों की आवश्यकता है- (1) मतदान को अनिवार्य बनाना, (2) विजय के लिये 50 प्रतिशत से अधिक मतों की प्राप्ति का नियम (3) चुनाव में उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार तथा (4) चुनाव खर्च का यथासंभव सरकारीकरण। निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रदर्शन संतोषजनक न होने पर जनता को उन्हें वापस बुलाने का अधिकार दिया जाना चाहिए।
जिलों का प्रशासनिक मुखिया नौकरशाह नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि होना चाहिए। संविधान में केन्द्र और राज्य के साथ-साथ जिलों को भी संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए। जिलों के प्रशासन में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं की विशेष भूमिका होनी चाहिए। जिलों की योजना बनाने के लिए जिला स्तर पर योजना आयोग बनाया जाना चाहिए। जिलों के लिए संसद की तर्ज पर ऐसी संस्थाओं का निर्माण भी किया जाना चाहिए जहां जिले के बारे में जिले के लोग चर्चा कर सकें और निर्णय ले सकें।
पंचायतों के काम-काज में जनना की प्रत्यक्ष भागेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उसे और अधिक वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार दिए जाने चाहिए।
पंचायतों की तरह शहरी इलाकों में नगरसभाओं का गठन किया जाना चाहिए। स्थानीय प्रशासन में इन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
जनप्रतिनिधियों को विशेषाधिकार देना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है इसलिए उसे समाप्त किया जाना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को न्यूनतम सुविधाओं के साथ काम करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
लोकपाल की संस्था को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि उच्च पदों पर होने वाले भ्रष्टाचार को रोका जा सके।
अखंड भारत एक प्राकृतिक सत्य है। इसलिए राजनैतिक लक्ष्य भी यही होगा। सांस्कृतिक रूप से एक बहुराज्यीय राष्ट्र की संकल्पना के लिए काम करना होगा
भारत को कृषि उपज के मामले में आत्मनिर्भर बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। हमें पूंजी आधारित रासायनिक एवं यांत्रिक खेती की जगह नैसर्गिक खेती की अवधारणा को प्रोत्साहन देना होगा। इस बाबत हमें यह तय करना होगा कि यह कार्य बगैर देश के किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाए किया जाए।
नकद खेती की बजाय बहुफसली एवं मिश्रित खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाए। खेती के साथ किसानों को बागवानी, पशुपालन एवं विविध कुटीर उद्योगों के द्वारा आय बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
कारखानिया माल और खेतिया माल के मूल्य में विसंगति को दूर किया जाना चाहिए। किसानों की सहकारी समितियों को स्थापित कर उन्हें प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
उद्योगों को अपने उत्पाद के लिए अधिकतम लाभ प्राप्त करने की सीमा तय की जानी चाहिए। एकाधिकार स्थापित कर मनमाना लाभ कमाने पर अंकुश लगना चाहिए।
टर्मिनेटर बीज तकनीक को प्रतिबंधित किया जाए। बीज के मामले में किसानों को आत्मनिर्भर बनाए जाने की कोशिश होनी चाहिए।
कृषियोग्य भूमि के अधिग्रहण को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। एस.ई.जेड. जैसी अमीरपरस्त योजनाओं को तुरंत बंद किया जाना चाहिए।
अर्थव्यवस्था में उत्पादन के विकेंद्रित माडलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ऐसा करने पर ही धन के केन्द्रीकरण को रोकने में मदद मिलेगी। कम पूंजी कम लागत पर अधिक रोजगार सृजन करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने से लाभ होगा।
अर्थव्यवस्था में स्थानीय कारीगरी से जुड़े उत्पादों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कारीगरों एवं दस्तकारों के प्रशिक्षण की भी समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
मांस निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। कच्चे माल के निर्यात को भी हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
सभी देशों की मौलिक ‘तुलनात्मक श्रेष्ठता’ का लाभ उन्हीं को हो पर विश्व व्यापार से सभी को लाभ भी हो इसके लिये विश्व व्यापार की नीति होनी चाहिए- ”अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिये हां, पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये ना।” इस व्यवस्था से विश्व व्यापार में शोषण की प्रवृत्ति समाप्त होगी।
अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों जैसे- बीमा, खुदरा व्यापार, कृषि, उर्वरक एवं रक्षा आदि क्षेत्रों में विदेशी पूंजीनिवेश को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अन्य क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी निवेश पर कड़ी नजर रखी जानी चाहिए।
अर्थव्यवस्था में काले धन के फैलाव को रोकने के लिए पुख्ता उपाय किए जाएं। देश का जो पैसा स्विस बैंक एवं अन्य गुप्त विदेशी खातों में जमा है, उसे वापस लाने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय पूंजी बाजार से पूंजी जुटाने या भारतीय बैंकों एवं सरकारी वित्तीय संस्थानों से पूंजी कर्ज के रूप में लेने पर रोक लगायी जानी चाहिए।
वर्तमान अर्थतंत्र मुक्तबाजार के नाम पर जुआरी अर्थतंत्र में बदल चुका है। आज विश्व में वस्तुओं के विनिमय से कई गुना अधिक मुद्रा या वित्तीय विनिमय होता है। हमारी अर्थव्यवस्था भी इस दोष से मुक्त नहीं हैं। इस पैसे से पैसा कमाने के ‘जुआरी अर्थतंत्र’ को ध्वस्त करना होगा। भारतीय संस्कृति में जुआ खेलना पाप है, अत: यहां जुआरी अर्थतंत्र के विकल्प को स्थापित करना होगा।
आर्थिक प्रगति नापने के लिए हमें भौतिक जीडीपी की बजाए सांस्कृतिक जीडीपी की अवधारणा विकसित करनी चाहिए जिसमें गैर मौद्रिक आर्थिक गतिविधियों को भी समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।
लंबी दूरी के यातायात और परिवहन के लिये सड़क की तुलना में रेलमार्ग एवं जलमार्ग को प्रधानता मिलनी चाहिए। इससे समय और संसाधन दोनो बचेंगे।
आय के स्तर पर व्याप्त अराजकता को हर हाल में दूर किया जाए। देश के राष्ट्रपति के वेतन और न्यूनतम वेतन में दस गुना से ज्यादा का फर्क नहीं होना चाहिए।
देश की आबादी बड़ी तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रही है क्योंकि रोजगार के छोटे-बड़े सभी अवसर वहीं स्थित हैं। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए हमें गांवों, कस्बों एवं छोटे शहरों में भी रोजगार के अवसर सृजित करने होंगे।
मादक पदार्थों जैसे शराब, गुटका, बीड़ी-सिगरेट के उपयोग को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। मादक पदार्थों की बिक्री से राजस्व जुटाने की नीति देश के लिए घातक होती है।
परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिहाज से कोई उपाय नहीं है। आज भारत की जरूरत है अक्षय ऊर्जा। हमें अक्षय ऊर्जा के विकेंद्रित उत्पादन पर जोर देना होगा।
पूर्ण गोहत्या बंदी इस देश की तासीर के हिसाब से अहम जरूरत है। भारत की स्वाभाविक अर्थव्यवस्था में गौ की अहम भूमिका है। साथ ही यह एक बड़े वर्ग के लिए आस्था का केंद्र भी है। इस नाते हमें गोहत्या बंदी तो सुनिश्चित करना ही चाहिए। साथ ही गौवंश के संवर्धन के लिए भी काम करने की जरूरत है।
जल संरक्षण के स्थानिक परंपरागत उपायों पर आग्रह रखना होगा। जल के अपव्यय को बढ़ावा देने वाली जीवनशैली एवं तकनीकों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। भूजल का अंधाधुंध दोहन चिंता का विषय है। अत: उसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
नदियों के अविरल एवं निर्मल प्रवाह को कायम रखा जाए। नदियों पर बांध बनाकर उन्हें रोकने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना चाहिए।
विकास योजनाओं के नाम पर स्थानीय आबादी को बेदखल करना चिंता का विषय है। हमें ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें विस्थापन की जरूरत कम से कम हो। कोई परियोजना तब तक शुरू नहीं होनी चाहिए जब तक प्रभावित आबादी को समुचित ढंग से पुनर्स्थापित न कर दिया जाए।
हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास मानवकेन्द्रित न होकर प्रकृति केन्द्रित हो। मनुष्य की भांति प्रकृति की प्रत्येक रचना को जीवित रहने का अधिकार है।
प्रदूषण मुक्त पर्यावरण पर जोर दिया जाना चाहिए। औद्योगीकरण के नाम पर देश की नदियों, पहाड़ों एवं वनों आदि प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट-भ्रष्ट करना घातक होगा। यदि विकास का मतलब पर्यावरणीय विनाश है तो हमें उससे बचना चाहिए।
स्वास्थ्य के मामले में सभी नागरिकों को समान अवसर और सुविधाएं प्रदान की जाएं। इस मामले में धन के प्रभाव को कम से कम करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। चिकित्सा के क्षेत्र में स्थानिक और पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देना इस प्रयास का एक महत्वपूर्ण अंग होगा।
स्वास्थ्य की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी धन के महत्व को कम किया जाना चाहिए। कम से कम प्रारंभिक शिक्षा के मामले में अमीर और गरीब दोनों के बच्चों के लिए एक जैसा अवसर होना चाहिए।
नीतिमत्ता और आध्यात्मिकता सिखाने वाली बातों का समावेश शिक्षा में किया जाना अत्यंत आवश्यक है ताकि वह संस्कृति की संवाहक बन सके। प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
विदेशी मूल का कोई भी व्यक्ति भारत का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष नहीं बनना चाहिए। इससे कई तरह के खतरे स्वाभाविक तौर पर देश पर मंडराने लगते हैं।
परिवार संस्था को मजबूत बनाया जाना चाहिए। इसे औपचारिक मान्यता दी जानी चाहिए। परिवार आधारित उद्यमों एवं सहकारी समितियों को विशेष मदद दी जानी चाहिए।
भारतीय भाषाओं के प्रयोग पर जोर दिया जाना चाहिए। सभी भारतीय भाषाओं के बीच पारस्परिकता का विकास होना चाहिए। भारतीय भाषाओं के बीच शब्दों के आदान-प्रदान की विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए।
सैन्य उत्पादन एवं तकनीकी विकास के मामले में हमें आत्मनिर्भरता की नीति पर चलना चाहिए। लेकिन साथ ही तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात का विकल्प भी खुला रखा जाना चाहिए। रक्षा संबधी सौदों में भ्रष्टाचार रोकने के विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसके कारण सेनाओं को आवश्यक साजो-सामान मिलने में देरी भी न हो।
देश में आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए आक्रामक नीति अपनायी जानी चाहिए। सीमापार स्थित आतंकी अड्डों को नष्ट करने के लिए बलप्रयोग करने में संकोच नहीं होना चाहिए। इसी के साथ आतंकी घटनाओं में लिप्त लोगों को दंडित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
भारत की जो जमीन चीन और पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है, उसे वापस लेने के गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।
परमाणु हथियारों को विकसित करने और उन्हें तैनात करने के अपने अधिकार से भारत को कोई समझौता नहीं करना चाहिए। इस संबंध में परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने के किसी भी दबाव को नजरंदाज कर देना चाहिए।
पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए। उन्हें आधुनिक साजो सामान के साथ-साथ बेहतर वेतन एवं अन्य सुविधाएं भी दी जानी चाहिए। देश में आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से उनका विशेष महत्व है।
देश में नक्सलवाद एक गंभीर समस्या ले चुका है। उसे कानून व्यवस्था की समस्या मानकर खत्म करने के उपाय निरर्थक साबित होंगे। अत्यधिक बल प्रयोग से भारी संख्या में निर्दोष लोग मारे जाएंगे। इससे समस्या और गंभीर हो जाएगी। नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में रहने वाले आदिवासी एवं स्थानीय लोगों की समस्याओं का ईमानदारी से समाधान करने और उन्हें अपने साथ मिलाने के विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश में ऐसी नीतियां थोपी जा रही हैं जिनसे लगता है कि दिव्यरूप धारण करने की जगह हिंदू धर्म का दम ही घुट जायेगा। अत: हम धर्म निरपेक्षता का समर्थन तो अवश्य करें पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दू धर्म का मार्ग अवरुद्ध न करें।



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