समाज बना अक्षय पात्र

Akshya Patra-संतोष कुमार द्विवेदी

   केन्द्र प्रवर्तित मध्यान्ह भोजन के बारे में चारों ओर से आ रही निराश करने वाली खबरों के बीच एक आशा जगाने वाली खबर यह है कि मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में इस योजना को सफल बनाने के लिए नागरिक सहयोग से ‘अक्षय-पात्र’ नामक अभियान शुरू किया गया है। ‘अक्षय-पात्र’ अर्थात् एक ऐसा बर्तन जिसमें से चाहे जितना निकालो वह खाली नहीं होता। गौरतलब है कि ऐसा बर्तन किसी सरकार के पास नहीं बल्कि समाज के पास होता है। वैसे भी सरकार के पास जो है वह उसका अपना नहीं समाज का ही दिया हुआ है।

मध्यप्रदेश के सुदूर आदिवासी अंचल के एक छोटे से जिले उमरिया में सरकार और समाज के इस रिश्ते को पहचानने, सशक्त बनाने और उसका रचनात्मक उपयोग करने की जो कोशिश की जा रही है उसे नाम दिया गया है, ‘अक्षय-पात्र’। जिला पंचायत उमरिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी राजीव शर्मा के दिमाग की उपज इस अभियान के अंतर्गत मध्यान्ह भोजन-योजन से समाज को जोड़ने की अभिनव पहल की जा रही है। श्री शर्मा का कहना है, ”खजाना चाहे कितना ही बड़ा हो और सरकार का ही क्यों न हो वह कभी भी अक्षय नहीं होता। अक्षय होता है समाज का प्रयास। समाज यदि संकल्पपूर्वक किसी प्रयास से जुड़ जाये तो वह चीज स्वनियंत्रण में स्वसंचालित होने लगती है, होती रहती है।” राजीव जी ने आगे बताया कि उमरिया मध्यप्रदेश का सबसे गरीब और अत्यन्त कुपोषित जिला है।

यहां पर मध्यान्ह भोजन योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए हमने सभी संभव प्रयत्न किये हैं। पैसा समय पर रिलीज हो, खाद्यान्न समय पर पहुंचे और मध्यान्ह भोजन ठीक तरह से बने व बंटे इसकी मुकम्मल व्यवस्था की। बावजूद इसके यह महत्वाकांक्षी योजना अन्य दूसरी योजनाओं की तरह ही चलती रही, क्योंकि यह समाजोन्मुखी योजना भी अंतत: एक सरकारी योजना बन कर रह गई है। इसके साथ भी सत्ता व शासन के चतुर तबकों के स्वार्थ इससे जुड़ गये हैं और वे अपनी तरह से इसके दोहन में लगे हुए हैं। हम इस दुष्चक्र को तोड़कर मध्यान्ह भोजन को व्यवस्थित करने और उसे सामाजिक निगरानी के दायरे में लाने का उपाय तलाश रहे थे। तभी हमें यह सूझा कि मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़ाव व निगरानी उन्हीं की प्रभावी हो सकेगी जो उसमें कुछ योगदान करें।

पालक शिक्षक संघ का प्रयोग बहुत हद तक मध्यान्ह भोजन के संचालन में कारगर साबित नहीं हुआ, क्योंकि इसमें पालक सिर्फ अधिकार वृत्ति से जुड़े और उन्होंने अपने अधिकारों का उपयोग भी स्वयं के हित साधने में ज्यादा किया। इस तजुर्बे से यह ध्यान में आया कि जो व्यक्ति या संस्था इस योजना में अपना कुछ लगाएगी, उसकी बात, उसकी भूमिका का असर होगा और उससे एक प्रकार का नैतिक वातावरण बनेगा जो मध्यान्ह भोजन योजना को ही नहीं, वरन गड़बड़ी करने वालों को भी बदलेगा।

बस इसी सिद्धांत के तहत शुरू किया गया ‘अक्षय-पात्र अभियान’। इस अभियान के अंतर्गत प्रत्येक विद्यालय से ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं व समूहों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जो हर सप्ताह, पखवाडे, माह या वर्ष में एक या एक से अधिक दिन अपनी ओर से छात्रों को विशेष भोजन कराएंगे। ऐसे व्यक्ति, संस्था, समूह संबंधित विद्यालय जिसके मध्यान्ह भोजन से वे जुडेंग़े वे वहां के ‘अक्षय-पात्र’ कहलाएंगे।

जिला मुख्यालय में एक माह पूर्व शुरू किये गए इस अभियान की उत्साहजनक प्रतिक्रिया देखने को मिली। देखते ही देखते लगभग 10 स्कूलों में सप्ताह में एक दिन के विशेष भोजन की एक सशक्त स्वैच्छिक व्यवस्था खड़ी हो गई। सिंधीी समाज ने तो प्रारंभिक विद्यालय में एक माह तक प्रतिदिन मध्यान्ह भोजन कराया और सभी स्कूली छात्रों को खाने के बर्तन भी वितरित किये। अमृता अस्पताल के चिकित्सक डा. विनय जैन ने सिंगलटोला प्राथमिक स्कूल के छात्रों में व्याप्त कुपोषण के मद्देनजर अंकुरित अनाज व हरी सब्जियों को मिलाकर सप्ताह में एक दिन विशेष पौष्टिक खिचड़ी खिलानी शुरू की। जो अब ‘विनय खिचड़ी’ के नाम से जिले में मशहूर है।

जिला मुख्यालय में अभियान की सफलता को देखते हुए इसे जनपद के अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित किया जा रहा है। पाली ब्लाक में इस हेतु बुलाई गई पहली बैठक में ही 7 माध्यमिक और 14 प्राथमिक स्कूलों के लिए 20 लोगों ने ‘अक्षय पात्र’ बनने की पेशकश की और शीघ्र ही 4 स्कूलों में इसकी विधिवत शुरूआत भी हो गई। पाली नगर के मुस्लिम समाज एवं व्यापारियों और पत्रकारों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की है। अक्षय पात्र अभियान के महत्व को जानने के बाद अब गैर सरकारी संगठन भी पीछे नहीं रहना चाहते। पीपुल कम्बाइन्ड और शारदा योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा शोध संस्थान ने ग्रामीण क्षेत्र के क्रमश: टोलबा एवं महरोई स्कूलों में सप्ताह में एक दिन विशेष भोजन देना शुरू किया गया है। ‘अक्षय अभियान’ की सफलता ने तमाम अपवादों के बावजूद समाज की आंतरिक ताकत को फिर से प्रमाणित किया है।

बकौल श्री शर्मा उन्हें भारतीय समाज की गहराई का पूरा अंदाजा है। यह वही समाज है जो कभी पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था को संभालता था जो बिना सरकारी संरक्षण व सहयोग के कुशलता पूर्वक चलता भी था। आज यदि समाज उदासीन है तो इसलिए नहीं कि उसकी वह आंतरिक क्षमता चुक गई है। वह उदासीन इसलिए है कि सरकारों ने स्वयं ही समाज से परहेज करके चलने वाली व्यवस्थाएं खड़ी करने की कोशिश की और समाज को सरकारी प्रयासों से पूरी तरह काट दिया।

काबिलेगौर है कि श्री शर्मा एवं उनकी पत्नी श्रीमती रजनी शर्मा ने पहले स्वयं एक प्राथमिक विद्यालय गोद लिया और वे वहां की मध्यान्ह भोजन योजना से जुड़े। चिकित्सक एवं समाजसेवी डा. विनय जैन जो प्राथमिक विद्यालय सिंगलटोला के ‘अक्षय-पात्र’ हैं, का कहना है कि इस अभियान ने हम जैसे लोगों को मध्यान्ह भोजन योजना और उसके बहाने एक विद्यालय से जुड़ने का अवसर दिया है। इस जुड़ाव के बाद हमारे मन में बार-बार ये बात आती है कि हम और क्या ऐसा क्या करें कि विद्यालय की व्यवस्था में उत्तरोत्तर सुधार हो सके।

निवृत्तमान शिक्षक एवं आयोग मित्र (मानव अधिकार आयोग, मध्यप्रदेश) श्री चन्द्रभद्र का कहना है कि मध्यान्ह भोजन योजना या इस जैसी तमाम योजनाओं के लिए जो भी औपचारिक व्यवस्था खड़ी की जाती है, वह सब की सब वर्तमान की सर्वग्रासी समस्या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। ऐसे में ‘अक्षय पात्र’ जैसे अनौपचारिक अभियान का संभवत: अच्छा असर होगा। रंगकर्मी पंकज दुबे कहते हैं कि कई तरह के अभावों एवं समस्याओं से जूझ रही मध्यान्ह भोजन योजना ‘अक्षय-पात्र’ जैसे अभियान से सशक्त बनेगी और मध्यान्ह भोजन की प्रक्रिया में सामाजिक सहयोग जुड़ने से जो खुराक बचेगी उससे अन्य दिनों की व्यवस्था को भी बेहतर बनाया जा सकेगा।

नि:संदेह अपने प्रारंभिक प्रयत्नों से ‘अक्षय पात्र अभियान’ ने मध्यान्ह भोजन योजना में ‘अक्षय’ योगदान किया है और अन्य जिलों के सामने सीखने सुधारने एवं कुछ नया करने का एक उदाहरण पेश किया है। लेकिन सवाल है क्या व्यक्ति केंद्रित यह अभियान पहल करने वाले अधिकारी के स्थानान्तरित होने के बाद भी इसी तीव्रता के साथ चल सकेगा?

This entry was posted on Tuesday, November 10th, 2009 and is filed under सार्थक प्रयास. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

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