पंचायती राज के समक्ष चुनौतियां

Panchayat-रमेश कुमार शर्मा

पंचायती राज से तात्पर्य सत्ता का विकेन्द्रीकरण है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले सत्ता के विकेन्द्रीकरण बनाम केन्द्रीकरण के मुद्दे पर व्यापक बहस छिड़ चुकी थी। सत्ता का विकेन्द्रीकरण कांग्रेस पार्टी या गांधीवाद के आधारभूत सिद्धांतों में से एक है जिसके अनुसार जन-जन तक वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिये ग्राम स्तर पर सत्ता केन्द्र अर्थात पंचायत की स्थापना आवश्यक है।

जबकि आजाद हिन्द सेना या नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के मतानुसार देश में बड़ी संख्या में सूबों (राज्यों) का होना, जो उस समय लगभग 600 की संख्या में थे, देश के लिये एक अभिशाप था। सुभाष बाबू के मत में देश में सत्ता के अनेक केन्द्र बनने से अधिक वैमनस्य फैलता है, गुटबाजी बढ़ती है और बिचौलियों का समूह तैयार होता है जो जनता तक विशेषकर निर्धन जन तक वास्तविक लाभ नहीं पहुंचने देता।

स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात शासन-सूत्र संभालने का अवसर कांग्रेस पार्टी को मिला। स्वाभाविक रूप से देश में पंचायती राज व्यवस्था स्थापित हुई। परन्तु नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का कथन आज भी प्रासंगिक है। जैसा कि 10 फरवरी 2009 को राजस्थान के टोंक नगर में तत्कालीन केन्द्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा कि पंचायती राज का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्गठन जरूरी है। तभी केन्द्र सरकार का पैसा आम जनता तक पहुंच पायेगा। उन्होंने कहा कि गांव की विकास योजनाएं गांव में ही बनें तथा उनका अमल भी पंचायत स्तर पर हो।

संयोगवश राजस्थान राज्य पंचायती राज की स्थापना में अग्रणी रहा है। पंचायतों के संगठन की दिशा में पहला कदम था, संयुक्त राजस्थान द्वारा पंचायत राज अध्यादेश, 1948 लागू करना। 1949 में राजस्थान निर्माण के बाद मुख्य पंचायत अधिकारी के अधीन एक पृथक पंचायत विभाग स्थापित किया गया। राजस्थान पंचायत अधिनियम, 1953 पारित हुआ और 1 जनवरी, 1954 से लागू किया गया। इस अधिनियम के अधीन पंचायतें पुनर्गठित की गईं और जहां पहले से पंचायतें नहीं थीं, वहां स्थापित की गईं।

किन्तु इस योजना के परिणाम आशाजनक नहीं निकले। अत: विकास कार्यक्रमों में जनता को निर्णायक अधिकार देने की दृष्टि से दिसम्बर, 1957 में स्वर्गीय बलवंत राय मेहता की नियुक्ति की गई। इनकी सिफारिशों के अनुसार लोकतांत्रिक केन्द्रीकरण हेतु ग्राम, खण्ड और जिला स्तर पर प्रतिनिधि संस्थाएं स्थापित कर स्थानीय प्रशासन एवं विकास हेतु उन्हें अधिकार हस्तान्तरित करना तय किया गया। इस बीच 1958 के अन्त में राजस्थान सरकार ने राज्य में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया।

साथ ही बलवंतराय मेहता समिति द्वारा पंचायती राज संस्थानों को शक्तियां, कार्य तथा संसाधन एवं विकास कार्यक्रम सौंपने के लिये त्रिस्तरीय तंत्र सहित पंचायती राज प्रारूप तैयार किया गया। इसके आधार पर 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा पंचायती राज अवधारणा प्रस्तुत की गई। फलस्वरूप 9 सितम्बर 1958 को राजस्थान विधानसभा ने राजस्थान पंचायत समिति तथा जिला परिषद् बिल पारित कर विकेन्द्रित प्रशासन की व्यवस्था की। 2 अक्टूबर 1959 को 232 पंचायत समितियों तथा 26 जिला परिषदों को राजस्थान सरकार ने उत्तरदायित्व सौंप दिया।

उल्लेखनीय होगा कि सर्वप्रथम राजस्थान राज्य ने 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज की स्थापना की। तदुपरांत आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, केरल, जम्मू कश्मीर आदि राज्य क्रमानुसार पंचायती राज की कड़ी में जुड़े।

वर्तमान में राजस्थान में त्रिस्तरीय तंत्र के रूप में ग्राम स्तर पर 9189 ग्राम पंचायतें, विकास खण्ड स्तर पर 237 पंचायत समितियां तथा जिला स्तर पर 33 जिला परिषदें हैं। इनके गठन का मुख्य उद्देश्य गांवों के प्रशासन और उनके विकास में वहीं के लोगों को भागीदार बनाना है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन (1993) के अनुपालन में राज्य सरकार ने राज्य की पंचायती राज संस्थाओं के पुनर्गठन हेतु राजस्थान पंचायत अधिनियम 1994 भी बनाया। इसे पारित कर 23 अप्रैल, 1994 से लागू किया गया। इस नये अधिनियम, के अनुसार दिसम्बर 1994 एवं जनवरी 1995 में पंचायती राज संस्थाओं के तीनों स्तरों के चुनाव करा दिये गये और वर्तमान में सभी संस्थाएं कार्यरत हैं।

आगे चलकर ऐसा अनुभव किया गया कि प्रशासनिक तंत्र की जड़ता पंचायती राज व्यवस्था को प्रमाणिकता से चलने नहीं देती। अत: 11 मई, 1999 को राजस्थान सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय शिवचरण माथुर की अध्यक्षता में ‘प्रशासनिक सुधार आयोग’ का गठन किया। इस आयोग की तत्कालीन सचिव किरण सोनी गुप्ता के अनुसार राज्य में लोक प्रशासन की पड़ताल करने, सुधारों, पुन: अनुस्थापन तथा पुनर्व्यवस्था की सिफारिशें करने के लिये यह आयोग बना। गुप्ता के मुताबिक प्रस्तावित पंचायती राज सुधारों में प्रमुख हैं:-

1. चुनाव प्रक्रिया को सुधारने के लिये संविधान में संशोधन करना।

2. जिला परिषदों और पंचायत समितियों को निचले वर्गों के कार्यों में गुणवत्ता सुधार सुनिश्चित करने के लिये उनकी गतिविधियों के निरीक्षण हेतु अधिकार सम्पन्न बनाना।

3.पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिये सबसे बड़े विरोधी दल के नेता के नेतृत्व में जिला सभा और पंचायत सभा गठित करना।

4. गांवों में विवादों के निपटारे के लिये न्याय पंचायतों का पुन: प्रवर्तन करना।

वर्तमान में पंचायती राज संस्थाओं के गठन की प्रक्रिया और उनके कार्य का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-

ग्राम सभा

यह पंचायती राज व्यवस्था की मूलभूत प्राथमिक इकाई है। एक पंचायत क्षेत्र के लिये एक ग्राम सभा होती है। ग्राम के समस्त वयस्क व्यक्ति जिनकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक है (कोढ़ी, सजा याफ्ता या पागल व्यक्ति को छोड़कर) इसके सदस्य होते हैं। ग्राम सभा की बैठक एक वर्ष में दो बार होनी आवश्यक है। ग्राम सभा का सरपंच व उप सरपंच ही ग्राम सभा के प्रधान व उप-प्रधान होते हैं। ग्राम सभा की बैठक में 10 प्रतिशत सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है।

ग्राम सभा के कार्यों में शामिल है, पंचायत क्षेत्र की विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहयोग देना। सामुदायिक कल्याण कार्यों के लिये स्वैच्छिक श्रम, वस्तु एवं नकद धन राशि जुटाना आदि।

ग्राम पंचायत

ग्राम सभा की बैठक सामान्यत: वर्ष में दो बार होती है। ग्राम के दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये एक कार्यकारिणी की व्यवस्था की गई जिसे ग्राम पंचायत कहा जाता है।

तीन हजार तक की जनसंख्या वाली पंचायत में एक सरपंच व 9 पंच होते हैं। तीन हजार से अधिक जनसंख्या पर प्रत्येक एक हजार अथवा उसके अंश पर 2 अतिरिक्त सदस्य होते हैं। उदाहरणार्थ किसी ग्राम पंचायत की जनसंख्या 4500 है तो इसमें 13 पंच व 1 सरपंच होंगे। इन्हें सीधे जनता द्वारा चुना जाता है।

ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव ग्राम के सभी मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। सरपंच के लिये शिक्षित होना आवश्यक है। किन्तु यदि वह महिला है तो उसे इस अनिवार्यता में छूट दी गई है।

ग्राम पंचायतों के कुल पदों में से एक-तिहाई पद महिलाओं के लिये आरक्षित होते हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिये जो स्थान आरक्षित हैं उनमें भी कम-से-कम एक-तिहाई पद इन जातियों की महिलाओं के लिये होते हैं।

पंचायत समिति

तहसील या खण्ड स्तर पर एक पंचायत समिति की स्थापना की गई है जो अपने क्षेत्र में विकास कार्यों का संचालन करती है। एक लाख तक की जनसंख्या वाली पंचायत समितियों के लिये 15 सदस्य होते हैं। हर पन्द्रह हजार अथवा उसके अंश की अतिरिक्त जनसंख्या के लिये 2 सदस्य चुने जाते हैं। प्रत्येक पंचायत समिति में एक प्रधान और एक उप-प्रधान पद होता है।

जिला परिषद

ग्राम एवं खण्ड स्तर के समान ही जिला स्तर पर जिला परिषद की स्थापना की गई है। जिला परिषदों में चालीस हजार तक की ग्रामीण जनसंख्या हेतु 17 सदस्य होते हैं। एक लाख अथवा उससे कम संख्या होने पर दो अतिरिक्त सदस्य और होते हैं। जिले के विधायक, लोकसभा सदस्य एवं राज्यसभा के सदस्य भी जिला परिषद के सदस्य होते हैं।

प्रत्येक जिला परिषद में एक जिला प्रमुख व एक उप-प्रमुख की व्यवस्था की गई है। जिलाधीश को यह अधिकार है कि वह उस निर्णय पर रोक लगा सकता है जिससे किसी जनकल्याण या सुरक्षा कार्य में अवरोध पहुंचता हो।

विश्लेषण एवं निष्कर्ष

यदि वर्तमान विकेन्द्रित पंचायती राज व्यवस्था में सुचारू रूप से कार्य करना सम्भव है तो तीनों स्तरों पर पंचायती राज संस्थाएं बहुत चुस्त-दुरूस्त होनी चाहिये। परन्तु केन्द्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री डा. सी.पी. जोशी इससे सहमत नहीं है। उन्होंने कहा है कि जिस तरह शिक्षा और उद्योग जगत में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी प्रकार सामाजिक स्तर पर भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा देकर भी पंचायती राज स्थापित किया जा सकता है।

यह विचार 20 जून 2009 को केन्द्रीय मंत्री बनने के बाद पहली बार उदयपुर पहुंचने पर जोशी जी ने उनके सम्मान में आयोजित पेसिफिक इन्स्टीटयूट आफ मैनेजमेंट कालेज में स्वागत अभिनन्दन में व्यक्त किया। जोशी जी ने कहा कि पंचायती राज का मतलब ही यह है कि हर गरीब को उसका हक मिले, रोजगार मिले, उच्च शिक्षा मिले, पेयजल, स्वास्थ्य तथा सड़क की सुविधा मिले।

पंचायती राज व्यवस्था में सार्वजनिक निजी भागीदारी में बढ़ावा देने की बात कर जोशी जी ने लगता है मानो चरम विकेन्द्रीकरण की स्थिति से केन्द्रीकरण की ओर लौटने का संकेत दिया है। किसी मंत्री ने भले ही पहली बार ऐसा कहा हो किन्तु पिछले दो दशकों में कतिपय शोधकर्ताओं ने चरम विकेन्द्रीकरण के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लगाया है।

उदाहरण के लिये 1993 में प्रकाशित ‘भारत में स्थानीय सरकार का विकेन्द्रीकरण- राजस्थान का प्रकरण अध्ययन’ नामक शोधालेख में सर्वेक्षणकर्ता ऐला घोष लिखती हैं, ‘केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण परिदृश्य के दो अप्राप्य, आदर्श प्रकार के विपरीत सिरे हैं। किसी भी तंत्र में वास्तविक स्थिति इन दो चरम बिन्दुओं के बीच में होती है।”

केन्द्र और प्रदेश के स्थानीय सम्बन्धों के बहुत से सूचकों जैसे प्रशासन, आर्थिक स्वायत्तता, जनसेवा सम्बन्धी निर्णय, दलगत राजनीति आदि के आधार पर ऐला घोष ने विश्लेषण  किया है। इस विश्लेषण से उन्होंने यह जानना चाहा है कि अत्यधिक केन्द्रीकृत केन्द्र सरकार किस प्रकार स्थानीय संस्थानों को शक्ति सम्पन्न करने की राज्य सरकार की इच्छा शक्ति को प्रभावित कर पाती है।

ऐला घोष सहित बहुत से शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि पंचायती राज व्यवस्था लागू हो जाने से चुनावों में जातिवाद तथा राजनैतिक दलबन्दी का जोर बढ़ गया। जैसे-जैसे शहरी भू-माफियाओं ने वन, गोचर, कृषिभूमि पर कब्जे किये, पंचायती राज संस्थाओं की आय के साधन सीमित होते चले गये और इस कारण इन्हें अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये सरकार पर निर्भर रहना पड़ा।

इन्हें वित्तीय सहायता प्राप्त होने के बाद इन पर राज्य सरकार का हस्तक्षेप बढ़ने लगा। इन संस्थाओं में राजनैतिक दलों के प्रवेश के कारण स्थानीय लोगों में आपसी द्वेष व मनमुटाव की भावना उत्पन्न हो गई। राजनैतिक दलों के नेता ग्रामीण लोगों की समस्याओं को सुलझाने के स्थान पर व्यक्तिगत स्वार्थ साधते हैं और शहरी भू-माफियाओं को प्रश्रय देकर गोचर और कृषि भूमि का आवासीय- औद्योगिक रूपान्तरण कराते रहते हैं।

इससे होने वाले पर्यावरण असन्तुलन विशेषकर जलवायु परिवर्तन, मानसून अनियमितता और भू-जल स्तर में गिरावट से कृषि व्यवसाय पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

कुल मिलाकर भू-माफिया प्रवृत्ति, जातिवाद और राजनैतिक दलबन्दी पंचायती राज के लिये सबसे बड़ी चुनौती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि चुनौती का सामना कर इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को अधिक अच्छा बनाया जाये। इनकी उपेक्षा करके केन्द्रीयकरण को बढ़ावा देना देश के लिए घातक होगा।

This entry was posted on Saturday, August 22nd, 2009 and is filed under पंचायती राज, विशेष रिपोर्ट. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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