भारतीय साहित्य का धर्मयुग

Ajit Kumar-अजित कुमार

   भारत के अद्भुत अपूर्व होने और आर्थिक महाशक्ति बनने का जो ख्याल आज लुभाने लगा है, वो भले ही हमारे व्यापक पिछड़ेपन पर सुहाना पर्दा डाल देना चाहे, पर उस अस्तित्व मूलक सच्चाई को भुलाया नहीं जा सकता जिसमें नवस्वाधीन किन्तु, विभाजित राष्ट्र के स्वर्णिम स्वप्न बनने के क्रम में खंडित होने लगे थे।

हिन्दी साहित्य के तत्कालीन परिवेश में धर्मवीर भारती और उनके साहित्यपन में इसकी अच्छी झलक देखी जा सकती है। महायुद्धोत्तर शीतयुद्ध को भी उससे अलगाया नहीं जा सकता और मानव मन में गहरी बैठी हताशा-निराशा की भी परछाईं उसमें पहचानी जा सकती है।

सच तो यह है कि जिस तरह बटलोई में पक रहे प्रत्येक चावल को टटोलने की जरूरत नहीं पड़ती, एक-दो से काम चलाया जा सकता है। उसी तरह धर्मवीर भारती, परिमल और धर्मयुग के जरिये हम उन दिनों के इलाहाबाद हिन्दी परिदृश्य और पत्रकारिता के आगामी स्वरूप की एक तस्वीर का खाका जरूर तैयार कर सकते हैं।

जहां तक मुझे याद आता है कि धर्मवीर भारती का हिन्दी साहित्य में उदय लगभग उसी समय हुआ जब हमारा देश स्वाधीन हुआ। भारती की ‘परिमल’ में भूमिका से उनके साहित्यिक गतिविधि को समझा जा सकता है। यहां परिमल और प्रगतिशील लेखक की तनातनी के दिन थे और करीब-करीब इसी समय भारती को धर्मयुग के  संपादन का प्रस्ताव मिला और भारती जी  अपने तमाम दोस्तों की अनिच्छा के बावजूद इलाहाबाद छोड़ बंबई चले गए।

वहां उन्होंने संपादन में अपनी कुशलता का वही परिचय दिया जैसा कि एक समय अध्यापक या एक युवा होनहार लेखक के रूप में हिन्दी जगत को दे चुके थे। यह भूला नहीं जा सकता कि अब तक भारती की कई साहित्यिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी थी।

भारती जब अपने श्रेष्ठ संपादकीय काल में पहुंचे, तब उन्हें न केवल अपने परिमलिय बंधु की अवज्ञा का सामना करना पड़ा बल्कि, तमाम प्रगतिशील लेखकों की जमात ने भी उनके साथ असहयोग किया। लेकिन, ऐसे समय में भारती ने धर्मयुग के माध्यम से हिन्दी के लिए जो कार्य किया वह बहुत महत्वपूर्ण और सराहनीय है।

एक ओर स्वयं परिमली लेखकों की ओर से कहा जा रहा था कि भारती बिक गए हैं। इलाहाबाद छोड़ व्यापारिक शहर में बस गए हैं। लेकिन, दूसरी तरफ धर्मवीर भारती ने धर्मयुग को एक ऐसा स्वरूप दिया जो सचमुच उसे एक बहुत बड़े समुदाय की पत्रिका बना सका। उस समय हिन्दी को जिस घर में जरा भी समझा जा सकता था या हिन्दी से तनिक भी प्यार था,  वहां धर्मयुग का आना अनिवार्य हो गया था।

यानी भारती जी ने धर्मयुग के माध्यम से हिन्दी के पाठकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ाई। दूसरी ओर उनके नेतृत्व में धर्मयुग केवल हिन्दी की ही पत्रिका नहीं रही बल्कि, यहां सारी भारतीय भाषाओं के लेखकों की रचनाएं  भी आग्रह पूर्वक मंगाई और छापी गईं।

इस तरह भारतीय भाषाओं का उत्तम लेखन पाठकों की आंखों तले गुजरने और उनकी चेतना से जुड़ने में समर्थ हुआ। भारती जी केवल उन्हीं रचनाओं से संतोष नहीं करते थे, जो स्वत: उन तक पहुंचती  थी बल्कि, वो बकायदा योजनावार रूप देकर रचना मंगवाते और बड़ी रुचि और पूरे मनोयोग के साथ छापते थे।

आज हिन्दी की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में अशुद्धियां दिखती हैं। धर्मयुग से ऐसी शिकायतें पाठकों को नहीं थी। छपाई के इतने आधुनिक साधन भी नहीं थे। आज काम में जो नफासत है, उस समय ऐसा नहीं था। फिर भी हिन्दी और अन्य भारतीय साहित्य धर्मयुग पत्रिका में प्रकाशित होते थे, जिसे देश के बहुत बड़े वर्ग में पढ़ा और सराहा जाता था।

प्रगतिशील लेखक संघ, धर्मयुग का न केवल बहिष्कार करते थे वरन इसमें छपने वाली रचनाओं के लेखकों को भी घटिया और व्यावसायिक मानकर अपने दायरों से बाहर रखना उचित समझते थे। कई अन्य लोगों के अनुभवों के साथ यह मेरा भी अनुभव था। जबकि, मैं प्रगतिशील पत्रिकाओं में भी लिखना पसंद करता था।

धर्मयुग में अधिक लिखने की एक वजह वहां से मिलने वाली पारिश्रमिक राशि भी थी। इससे हमारी कई आर्थिक जरूरतें तब पूरी हो जाया करती थीं। जबकि, लघु या पक्षधर पत्रिकाओं के पास परिश्रमिक देने की स्थिति नहीं होती थी। वैसे इन पत्रिकाओं में लिखने और गोष्ठियों में जाने की मेरी रुचि और गति लगातार रही किन्तु, धर्मयुग का लेखक कहकर लोग अपमानित करने से बाज नहीं आते थे।

आगे ऐसी प्रवृत्ति का विकास ही हुआ, जब प्रगतिशील लेखकों की जगह अधिक क्रांतिकारी जनवादी लेखक संघ का उदय हुआ। मैं मानता हूं कि यह एक नकली विभाजन था, जिससे हिन्दी को क्षति हुई। ऐसे में संभवत: हिन्दी पत्रकारिता को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

This entry was posted on Saturday, March 3rd, 2007 and is filed under विविधा. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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