विस्थापन पर समग्रता से विचार हो।

subhash-gatade-सुभाष गताड़े (वरिष्ठ पत्रकार)

जब भी विस्थापन की बात होती है, लोग समझते हैं कि किसी बांध परियोजना से विस्थापन की बात हो रही है। विस्थापन को देखने का यह बेहद संकुचित दृष्टिकोण है।

आज के दौर में लाखों-करोड़ों लोग अपना घर छोड़कर पलायन कर गए हैं, एक जगह से दूसरी जगह जाकर उन्होंने अपना घर बना लिया है। इन सभी लोगों को विस्थापितों की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। एक सवाल अब खुद से, हम भविष्य का कैसा नक्शा देखते हैं?

16वीं शताब्दी वाला बिना रेल, बिना बिजली, बिना टेलीफोन का या 21वीं शताब्दी का। आज जंगल में जो आदिवासी रह रहे हैं, उनकी तस्वीर समाज के सामने रूमानी तौर पर पेश की जा रही है। गौरतलब है कि इस तरह की तस्वीर आदिवासी पेश नहीं करते, यह पेश करते हैं वे लोग जो उनके खुद ही खैरख्वाह बन बैठे हैं।

आदिवासी वर्ग में जो पढ़ा लिखा तबका है, वह कहता है, यहां दवा नहीं, शिक्षा नहीं, रोजगार नहीं, भविष्य नहीं, फिर क्यों यहां रहना? वह शहर की तरफ पलायन कर रहा है। आदिवासियों की नुमाइन्दगी करने वाले जो लोग हैं, क्या कभी उन्होंने उन आदिवासियों से पूछा कि उन्हें क्या पसंद है?

किंतु मेरी बात से यह न समझा जाए कि मैं विस्थापन और सरकारी नीतियों का समर्थक हूं। मैं मानता हूं कि सबसे पहले विस्थापन की स्थिति से ही बचने का प्रयास होना चाहिए। यदि बहुत जरूरी हो तो न्यूनतम विस्थापन की बात सोची जानी चाहिए। जिनका विस्थापन हो, उनके लिए मुआवजे की समुचित व्यवस्था हो। विकास यदि किसी के विनाश का कारण बने तो उसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।

This entry was posted on Friday, November 9th, 2007 and is filed under चर्चा में. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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