विज्ञापन का मायाजाल

childhood-हिमांशु शेखर

विज्ञापन की दुनिया काफी मायावी है। बाजारीकरण के मौजूदा दौर में इसकी महत्ता में दिनोंदिन इजाफा ही होता जा रहा है। एक दौर वह भी था जब सूचना और विज्ञापन में कोई खास अन्तर नहीं था।

यह भी कहा जा सकता है कि विज्ञापन को सूचना देने का जरिया माना जाता था। पर, यह अवधारणा काफी पहले ही खंडित हो चुकी है। आज तो हालात ऐसे है कि विज्ञापन का पूरा करोबार ‘जो दिखता है वही बिकता है’ के तर्ज पर चल रहा है। मांग और आपूर्ति की अवधारणा को तोड़ते हुए अब मांग पैदा करने पर जोर है। आज विज्ञापन का मूल उद्देश्य सूचना प्रदान करने की बजाए उत्पाद विशेष के लिए बाजार तैयार करना बन कर रह गया है।

विज्ञापन का इतिहास भी काफी पुराना है। मौजूदा रूप तक पहुंचने के लिए इसने लंबा सफर तय किया है। वैश्विक स्तर पर अगर देखा जाए तो विज्ञापन की शुरूआत के साक्ष्य 550 ईसा पूर्व से ही मिलते हैं। भारत में भी विज्ञापन की शुरुआत सदियों पहले हुई है। यह बात और है कि समय के साथ इसके तौर-तरीके बदलते गए।

बहरहाल, अगर ऐतिहासिक साक्ष्यों को खंगाला जाए तो पता चलता है कि शुरूआती दौर में विज्ञापन, मिश्र, यूनान और रोम में प्रचलित रहा है। मिश्र में विज्ञापन कार्य के लिए पपाईरस का प्रयोग किया जाता था। उल्लेखनीय है पपाईरस पेड़ के तने में एक खास तरह की वस्तु होती थी, जिस पर कुछ लिखा जा सकता था। वहां इस पर संदेश अंकित करके इसका प्रयोग पोस्टर के रूप में किया जाता था। इसे दीवार पर चिपका दिया जाता था। वहीं प्राचीन यूनान और रोम में इसका प्रयोग खोया-पाया विज्ञापनों के लिए किया जाता था। दीवारों और पत्थरों पर पेंटिंग के जरिए भी उस दौर में विज्ञापन किया जाता था। अगर वाल पेंटिंग को भी विज्ञापन के प्रेषण का माध्यम मान लिया जाए तो इसका इतिहास तो और भी पुराना है। ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनके आधार पर इसकी शुरुआत चार हजार वर्ष ईसा पूर्व मानी जा सकती है।

खैर! ये उस दौर की बात है जब नई तकनीकों का ईजाद नहीं हो पाया था। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, विज्ञान ने पूरे परिदृश्य में ही क्रांतिकारी बदलाव ला दिया। इस वजह से कई कार्यों में सुगमता तो आयी ही, साथ ही साथ अनेक मोर्चों पर काम करने का ढंग भी बदल गया। जाहिर है, तकनीक के प्रभाव से विज्ञापन भी नहीं बच पाया।

पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के दौरान मुद्रण के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन हुआ। प्रिंटिंग मशीनों का चलन बढ़ने लगा। इस वजह से विज्ञापन के लिए छपे हुए पर्चों का प्रयोग होने लगा। वर्तमान युग में विज्ञापनों के बिना किसी अखबार का चलना असंभव सरीखा ही लगता है। पर, शुरूआती दौर में लंबे समय तक अखबारों ने विज्ञापन से दूरी बनाए रखी थी। वैसे कई जानकार ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि उस वक्त लोग यह सोच ही नहीं पाते थे कि विज्ञापन का जरिया अखबार भी बन सकता है। इस तर्क को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता है।

समाचार पत्रों में विज्ञापन की शुरुआत सत्रहवीं शताब्दी में हुई। इसकी शुरूआत इंग्लैंड के साप्ताहिक अखबारों से हुई थी। उस समय पुस्तक और दवाओं के विज्ञापन प्रकाशित किए जाते थे। अठारवीं शताब्दी में भी इस क्षेत्र में काफी प्रगति हुई। इस सदी में अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी। इस वजह से विज्ञापन को भी मजबूती मिल रही थी। इसी दौर में वर्गीकृत विज्ञापनों का चलन शुरू हुआ जो अभी भी काफी लोकप्रिय है। इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई, जहां अखबारों में खबर लगाने के बाद बीच-बीच में बचे हुए छोटे-छोटे स्थानों पर सूचनात्मक विज्ञापनों का प्रयोग फिलर के तौर पर होता था। आज विज्ञापनों का महत्व कितना बढ़ गया है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कई अखबारों में विज्ञापन देने के बाद बची जगह में ही खबर लगाई जाती है।

कहा जा सकता है कि खबरों का प्रयोग ही विज्ञापनों के लिए फिलर के तौर पर किया जा रहा है। विज्ञापनों की ताकत में साफ तौर पर काफी ईजाफा हुआ है। विज्ञापन के इतिहास का एक अहम मोड़ वर्गीकृत विज्ञापनों को कहा जा सकता है। दुनिया की पहली विज्ञापन एजेंसी 1841 में बोस्टन में खुली। इसका नाम वालनी पामर था। इसी एजेंसी ने अखबारों से विज्ञापन के एवज में कमीशन लेने की शुरूआत की। उस वक्त यह एजेंसी पच्चीस प्रतिशत कमीशन लेती थी।

मौजूदा दौर में विज्ञापन में महिलाओं के बढ़ते प्रयोग पर काफी चिंता जताई जा रही है। आज महिलाओं के जरिए विज्ञापन में कामुक पुट डालना आम बात है। शायद ही कोई ऐसा विज्ञापन दिखता है जिसमें प्रदर्शन के रूप में नारी देह का प्रयोग नहीं किया गया हो। विज्ञापन निर्माताओं के लिए यह बात कोई खास मायने नहीं रखती है कि विज्ञापित वस्तु महिलाओं के प्रयोग की है या नहीं। कई विज्ञापन तो ऐसे भी होते हैं जिनमें महिलाओं की कोई आवश्यकता नहीं है। पर यह बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का ही असर है कि नारी की काया को बिकने वाले उत्पाद में परिवर्तित कर दिया गया है। इसके सहारे पूंजी उगाहने का भरसक प्रयास किया जाता है।

वैसे बीसवीं सदी की शुरुआत से ही विज्ञापनों में औरतों का प्रयोग होने लगा था। उस वक्त विज्ञापन बनाने वालों ने यह तर्क दिया कि महिलाएं घर की खरीददारी में अहम भूमिका निभाती हैं। इस लिहाज से उनका विज्ञापनों में प्रयोग किया जाना फायदे का सौदा है। विज्ञापन के क्षेत्र में पहले पुरुष ही होते थे, किंतु बाद में इस काम से महिलाएं भी जुड़ने लगीं। वस्तुत: नारी को सेक्सुअल रूप में पेश करने वाला दुनिया का पहला विज्ञापन भी एक अमेरिकी महिला ने ही बनाया था। उसके बाद तो इस चलन को अद्भुत सफलता मिली। अब तो बगैर सेक्सी लड़की को दिखाए विज्ञापन पूरा ही नहीं होता है। ब्लेड से लेकर ट्रक तक के विज्ञापन में नारी काया की माया का सहारा लिया जा रहा है। उस वक्त तो विज्ञापनों के लिए प्रिंट ही एकमात्र माध्यम था। इलैक्ट्रानिक माध्यम के आने के बाद नारी को और विकृत रूप में दिखाने की होड़ लग गई।

बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक से रेडियो का प्रसारण आरम्भ हुआ। उस समय कार्यक्रमों का प्रसारण बगैर विज्ञापन के किया जाता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि पहला रेडियो स्टेशन स्वयं रेडियो की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए स्थापित किया गया था। जब रेडियो स्टेशनों की संख्या बढ़ी तो बाद में चलकर इसमें विज्ञापनों की शुरुआत प्रायोजित कार्यक्रमों के जरिए हुई। उस वक्त विज्ञापन देने वालों के व्यवसाय से संबंधित जानकारी कार्यक्रम की शुरुआत और आखिरी में दी जाती थी।

उसके बाद रेडियो स्टेशन चलाने वालों ने अधिक पैसा कमाने के लिए नया रास्ता निकाला। पूरा कार्यक्रम प्रायोजित करने के बजाए एक ही कार्यक्रम में छोटे-छोटे टाइम स्लाट के लिए विज्ञापन ढूंढे गए। यह प्रयोग काफी सफल रहा। आज भी सामान्य तौर पर विज्ञापन के इसी फारमेट का प्रयोग रेडियो पर होता है। इसी ट्रेंड को टेलीविजन ने भी अपनाया। इंग्लैंड में इस बात को लेकर विवाद भी हुआ कि रेडियो एक जनमाध्यम है और इसका प्रयोग व्यावसायिक हितों के लिए नहीं होना चाहिए। पर समय के साथ रेडियो की ताकत और पहुंच बढ़ती गई। साथ ही साथ विज्ञापन के लिए भी यह सशक्त माध्यम बनता गया।

पचास के दशक में टेलीविजन पर भी छोटे-छोटे टाइम स्लाटों पर विज्ञापन दिखाया जाने लगा। टीवी की दुनिया में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, पूरे कार्यक्रम का एक प्रायोजक नहीं मिल रहा था। हालांकि, बाद में टेलीविजन पर भी प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित होते रहे। उस समय कार्यक्रम के कंटेंट में प्रायोजक का काफी दखल होता था। कई कार्यक्रम तो ऐसे भी थे जिनका पूरा स्क्रिप्ट विज्ञापन एजेंसी वाले ही लिखते थे।

विज्ञापन के क्षेत्र में साठ के दशक में व्यापक बदलाव आया। रचनात्मकता पर जोर बढ़ने लगा। ऐसे विज्ञापन बनाए गए जो लोगों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर सकें। लोगों को सोचने पर विवश करने वाले विज्ञापन उस दौर में बनाए गए। साठ के दशक में वोक्सवैगन कार के विज्ञापन से विज्ञापन की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लाने का श्रेय बिल बर्नबैय को जाता है। दरअसल, उस दौर को अमेरिका के विज्ञापन इतिहास में रचनात्मक क्रांति का दौर कहा जाता है।

अस्सी और नब्बे के दशक में दुनिया सूचना क्रांति के दौर से गुजर रही थी। इसी दौरान केबल टेलीविजन का आगमन हुआ। इसका असर विज्ञापन के बाजार पर भी पड़ा। माध्यम के बढ़ जाने की वजह से प्रतिस्पर्धा बढ़ी और विज्ञापन के नए-नए तरीके ईजाद होने लगे। इन्हीं में से एक था म्यूजिक विडियो का चलन में आना। दरअसल, ये विज्ञापन होते हुए भी दर्शकों का मनोरंजन करते थे। इसलिए, यह काफी लोकप्रिय हो गया। इसी समय टेलीविजन चैनलों पर टाइम स्लाट खरीद कर विज्ञापन दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ।

बाद में तो कई देशों में शापिंग नेटवर्क वालों ने तो बकायदा विज्ञापन चैनल ही खोल लिया। भारत में भी टाटा स्काई के डीटीएच पर ऐसा चैनल है जो सेवा से संबंधित जानकारियां ही देता रहता है। यह विज्ञापन का बढ़ता प्रभाव है कि कई उद्योगपति खुद टेलीविजन चैनल खोल रहे है। रिलायंस और विडियोकान  द्वारा लाए जाने वाले समाचार चैनलों को भी इसी कवायद से जोड़ कर देखा जा रहा है।

टेलीविजन विज्ञापनों के परिदृश्य में भी व्यापक बदलाव हुए हैं। इस जनमाध्यम के जरिए लोगों को लुभाने की कोशिश जारी है। यहां रचनात्मकता पर अश्लीलता हावी है। उल्लेखनीय है कि पहला टेलीविजन विज्ञापन अमेरिका में पहली जुलाई 1941 को प्रसारित किया गया था। बीस सेकेंड के उस विज्ञापन के लिए बुलोवा वाच कंपनी ने डब्ल्युएनबीटी टीवी को नौ डालर का भुगतान किया था। इसे बेसबाल के चल रहे एक मैच के पहले दिखाया गया था। इस विज्ञापन में बुलोवा की घड़ी को अमेरिका के नक्शे पर रखा हुआ दिखाया गया। जिसके पीछे से वायस ओवर के जरिए कहा गया ‘अमेरिका बुलोवा के समय से चलता है।’ उस वक्त से अब तक टेलीविजन विज्ञापन काफी लोकप्रिय रहे हैं।

कुछ समय बाद राजनैतिक विज्ञापनों के लिए भी टेलीविजन का प्रयोग किया जाने लगा। भारत में इसकी शुरूआत दूरदर्शन पर पार्टी को समय आवंटित करने से हुई। यह विज्ञापन के बढ़ते असर का ही परिणाम है कि विज्ञापन विमर्श अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। विज्ञापन एजेंसियों के बड़े कारोबार को  जानना-समझना अपने आप में विशेषज्ञता का एक क्षेत्र बन चुका है।

इस संदर्भ में प्रख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री एडवर्ड चैंबरलिन ने 1933 में ही बाजार के सच को उजागर करती हुई महत्वपूर्ण व्याख्या की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ए थियरी आफ मोनोपोलिस्टिक कंपीटिशन’ में लिखा था, ”वह युग खत्म हो गया जब हर उत्पाद के ढेरों निर्माता होते थे। और उनके बीच घोर प्रतिद्वंद्विता होती थी। इसकी वजह से प्रत्येक उत्पाद अपनी गुणवत्ता को सुधारने के लिए सक्रिय होता था, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर सके।” आज से सात दशक पहले की गई यह व्याख्या विज्ञापन के मौजूदा परिदृश्य पर बिलकुल सटीक बैठती है। आज गुणवत्ता की बजाए जोर किसी भी तरह से ग्राहक को उत्पाद के मायाजाल में फांसने का है। इसके लिए पहले पैकिंग को आकर्षक बनाया गया।

इसके बाद विज्ञापन के जरिए सपने दिखाए गए। इनके माध्यम से साख उत्पाद के प्रयोग को सामाजिक स्टेटस से जोड़ दिया गया। समाज में बहुतायत मध्यम वर्ग वालों की ही है। इसी वर्ग को लक्षित करके इनके मन में यह बात विज्ञापनों के सहारे बैठायी गयी कि उच्च वर्ग की जीवनशैली और उनके द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं को अपनाया जाए। इस मोहजाल में मध्यम वर्ग फंसता ही चला गया और विज्ञापनों की बहार आ गई आज विज्ञापन के जरिए बचपन को भंजाने की हरसंभव कोशिश की जा रही है।

पूंजीवाद की मार से बच्चे भी नहीं बच पाए हैं। विज्ञापनों में महिलाओं के बाद सर्वाधिक प्रयोग बच्चों का ही हो रहा है। इन्हें जान-बुझ कर लक्ष्य बनाया जा रहा है। इसके पीछे की वजहें साफ हैं। पहला तो यह कि इससे बाल मस्तिष्क पर आसानी से प्रभाव छोड़ना संभव हो पाता है।

दूसरी वजह यह है कि अगर बच्चे किसी खास ब्रांड के उत्पाद के उपभोक्ता बन जाएं तो वे उस ब्रांड के साथ लंबे समय तक जुड़े रह सकते हैं। कुछ विज्ञापन तो बच्चों के अंदर हीनभावना भी पैदा कर रहे हैं। बच्चों के मन में यह बात बैठाई जा रही है कि विज्ञापित वस्तु का प्रयोग करना ही आधुनिकता है। अगर वे उसका प्रयोग नहीं करेंगे तो पिछडे समझे जाएंगे। कुछ विज्ञापनों के जरिए बच्चों की मानसिकता को भी बड़ों के समान बनाने की कुचेष्टा की जा रही है। जान-बूझ कर बच्चों से जुड़े विज्ञापनों में सेक्सुअल पुट डाला जा रहा है।

यानी बचपन को छीने जाने की पूरी तैयारी हो गई है। ऐसा लगता है। आज हालत यह है कि बच्चे किसी उत्पाद के लिए नहीं बल्कि खास ब्रांड के उत्पाद के लिए अपने अभिभावकों से जिद्द कर रहे हैं। इस वजह से अभिभावकों को परेशानी उठानी पड़ रही है। यह विज्ञापनों का बढ़ता प्रभाव ही है कि बच्चों में विज्ञापनों में काम करने की ललक भी बढ़ती जा रही है। इसका नकारात्मक प्रभाव उनकी पढ़ाई-लिखाई पर पड़ता है। आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कई अभिभावक भी अपने बच्चे को विज्ञापन फिल्मों में देखना चाह रहे हैं। इसके लिए वे बाकायदा बच्चों को अभिनय का प्रशिक्षण भी दिलवा रहे हैं। इस बुरे चलन से कम उम्र में ही बच्चों के मन में पैसे के प्रति तीव्र आकर्षण पैदा हो रहा है। यह विज्ञापन का एक बड़ा दुष्परिणाम है।

आखिर में यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि लाख खामियों के बावजूद विज्ञापन आज बाजार का अभिन्न अंग बन चुका है। इस विज्ञापन बाजार ने नए युग के नए नायकों का निर्माण किया है। साथ ही साथ नई पीढ़ी के आदर्श भी विज्ञापन ही तय कर रहे हैं।  भूमि घोटाले में फंसे रहने के बावजूद अभिताभ बच्चन के विज्ञापन  का भाव सबसे ज्यादा है, इस तथ्य से आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे।

विज्ञापनों की दुनिया सीधे तौर पर लोगों की पसंद से जुड़ी हुई है। यानी, कहा जा सकता है कि लोगों की सोच विज्ञापन तय करने लगे  हैं। विज्ञापन के लिए यह सबसे बड़ी सफलता है। किंतु समाज के लिए यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

This entry was posted on Monday, October 15th, 2007 and is filed under विज्ञापन का प्रभाव, विशेष रिपोर्ट, हिमांशु शेखर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

2 Responses to “विज्ञापन का मायाजाल”

  1. अंकुर गुप्ता on May 20th, 2009 at 7:45 pm

    बढिया लेख.

  2. xyz on June 18th, 2010 at 11:46 am

    uttam lekh
    gud 4 my projet

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