महाभारत में धर्म किसके पास था?

-सूर्यकांत बाली

चूंकि पाण्डव जीते और धर्म की जीत होनी ही है, इसलिए पाण्डवों का पक्ष धर्म मान लिया गया। पाण्डव इसलिए जीते कि वे सही और धर्मात्मा थे, इस बात को खुद व्यास और उनकी टीम ने भी अतिरिक्त महत्व कभी नहीं दिया। महाभारत परवर्ती संस्कृत साहित्य में तो पासा ही पलटा हुआ नजर आता है।

 

संस्कृत में एक कहावत है- यतो धर्मस्ततो जय:, जहां धर्म है, वहां विजय निश्चित है। महाभारत पढ़ जाएं तो आपको इन्हीं या ऐसे शब्दों में यह कहावत कई बार पढ़ने को मिल जाएगी। यह कथन कोई आसमान से नहीं टपका। देखने को मिल ही जाता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति जीवन में एक बार विजयी अवश्य होता है। अन्यायी को बार-बार विजयी होता देखकर भी सत्य के पथिक को एक उम्मीद सत्य के मार्ग से बांधे रखती है कि कभी तो जीत होगी और जब होती है तो वह ऐतिहासिक मान और बना दी जाती है। उसी में से यह कहावत चल पड़ी है।

पर खुद इस कहावत से एक अन्याय भी हुआ है कि कई बार विजयी पक्ष को सत्य और धर्म का पक्ष मान लिया गया है, क्योंकि धर्म की विजय होनी ही है। पाण्डवों के साथ कुछ-कुछ ऐसा ही हो गया है। चूंकि पाण्डव जीते और धर्म की जीत होनी ही है, इसलिए पाण्डवों का पक्ष धर्म मान लिया गया। तात्पर्य यह नहीं कि कौरव धर्मात्मा और पुण्यात्मा थे और पाण्डव नहीं। दोनों में अंतर था और बहुत था। पर पाण्डव इसलिए जीते कि वे सही और धर्मात्मा थे, इस बात को खुद व्यास और उनकी टीम ने भी अतिरिक्त महत्व कभी नहीं दिया। महाभारत परवर्ती संस्कृत साहित्य में तो पासा ही पलटा हुआ नजर आता है।

एक नायक के रूप में युधिष्ठिर ने संस्कृत साहित्यकारों को कभी आकृष्ट नहीं किया। जबकि भास के एक नाटक उरूभंग के तो नायक ही दुर्योधन हैं और नाटककार की सहानुभूति भी उन्हीं के साथ है। भारवि के महाकाव्य किरातार्जुनीयम् में नायक तो अर्जुन ही है, पर काव्य में जहां युधिष्ठिर की अच्छी भद पिटी है, वहां दुर्योधन को अति लोकप्रिय और कुशल प्रशासक दिखाया गया है। भीम को नायक बनाकर नाटक लिखे गए। मसलन भास का एक नाटक है मध्यम व्यायोग और भट्टनारायण का नाटक है वेणीसंहार। पर युधिष्ठिर का खाता संस्कृत साहित्य में नहीं खुला। क्या ऐसे विजेता पर हैरानी नहीं होती कि जिसे न तो क्लासिकल साहित्य में और न ही लोकसाहित्य मे वह स्थान मिल पाया जो पराजित दुर्योधन को मिला?

पर जैसे पाण्डवों की जीत उनके पक्ष को आवश्यक रूप से धर्म का पक्ष सिध्द नहीं करती, वैसे ही दुर्योधन को परवर्ती साहित्य में मिली सहानुभूति उसके पक्ष को बलवान नहीं बनाती। महाभारत काल से ही इस पर बहस जारी है कि कौन सही था। यहां सही का एक ही मतलब है कि हस्तिनापुर के राजसिंहासन के असली वारिस कौन थे, दुर्योधन या युधिष्ठिर? वह दुर्योधन जिनके पिता धृतराष्ट्र अन्धे होने के कारण राज्य से पहले वंचित कर दिए गए थे और पाण्डु की मृत्यु के बाद राजा बना दिए गए या वह युधिष्ठिर जो राजा पाण्डु के और इस परिवार के ज्येष्ठ पुत्र थे? इसमें कई उपप्रश्न भी फंसे पड़े है।

क्या असली राजा धृतराष्ट्र थे, जो नेत्रहीन होने के कारण राजा नहीं बन सके और पाण्डु को उनके प्रतिनिधि के रूप मे राजा बनाया गया या कि पाण्डु ही अभिषिक्त होने के कारण असली राजा थे जिनका प्रतिनिधित्व बाद में धृतराष्ट्र ने किया? उपप्रश्न यह भी है कि अगर पाण्डु के मरने के बाद राजा बनाए जाने पर नेत्रहीनता धृतराष्ट्र के आड़े नहीं आई तो उन्हें शुरू में ही राजा बनाने के सवाल पर क्यों आड़े आई? इन प्रश्नों का उत्तर अगर मिल जाता तो फिर महाभारत का युध्द ही क्यों होता तो फिर यह बहस आज तक क्यों चलती रहती? महाभारत का प्रगंधकाव्यत्व इसी में है कि वह हमारे सामने सवाल तो खड़े कर देता है, पर हमें अपने उत्तरों को बंधुआ नहीं बनाता और ढूंढ़ने के लिए खुला छोड़ देता है।

फिर आमतौर पर युधिष्ठिर को धर्मराज और दुर्योधन को खलनायक की छवि क्यों मिली? यह तो दुर्योधन के निन्दक भी मानेंगे कि वह अहंकारी बेशक थे, पर मूर्ख नहीं थे। हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर उन्होंने अगर अपना दावा मरते दम तक नहीं छोड़ा तो इसका कारण मिथ्या अहंकार नहीं, कहीं न कहीं दावे के सही होने के प्रति पूरा यकीन था। महाभारत में युधिष्ठिर ने अपने दावे को कभी यकीन और तीव्रता के साथ नहीं रखा, जैसे दुर्योधन ने रखा। संस्कृत साहित्य में दुर्योधन की छवि राज्यवंचक और युधिष्ठिर की छवि राज्यवंचित की कभी नहीं उभरी। लोगों के बीच दोनों नायकों के प्रति रागद्वेष का आधार वंचक-वंचित होना प्राय: नहीं रहा। अगर युधिष्ठिर राज्य के प्रति इतने ही दावेदार थे, तो सत्य से कभी न डिगने वाले इस व्यक्ति को पांच गांवों से संतोष की पेशकश कभी नहीं करना चाहिए थी। यानी कुल मिलाकर मामला इतना उलझा हुआ है कि एक लम्बी बहस भी आपको कहीं पहुंचाती नहीं।

यही हाल महाभारत युध्द का है। कुरुक्षेत्र में अठारह अक्षौहिणी सेना मर गई, पर उल्लेखनीय मृत्यु सिर्फ पांच लोगों की रही -भीष्म, अभिमन्यु, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन। अर्जुन और भीम के अलावा अभिमन्यु ही पाण्डव पक्ष के उल्लेखनीय योध्दा थे और वे मारे गए। दिलचस्प यह है कि ये पांचों छल से मारे गए। बल्कि पहले चार योध्दा तो तब मारे गए जब वे निहत्थे थे। शिखंडी को सामने देखकर भीष्म ने हथियार रख दिया और अर्जुन ने उन्हें धोखे से बींधकर रख दिया। धोखा भी क्या। भीष्म जानते थे कि बाण शिंखडी के नहीं, अर्जुन के हैं- अर्जुनस्य इसे बाणा: नेमे बाणा: शिखण्डिन:। पर वे अपने आदर्श की आन पर हथियार फेंककर खड़े रहे और अर्जुन ने उन्हें बाणों की सेज पर लिटा दिया।

अभिमन्यु को तो छह-छह महारथियों ने घेरकर निहत्था करके बर्बरतापूर्वक मारा। द्रोण को भी मारने से पहले निहत्था कर दिया गया और उन्हें निहत्था करने में युधिष्ठिर ने अपने जीवन भर की सत्य की पूंजी एक धीमे से बोले गए झूठ पर कुर्बान कर दी। कर्ण तो निहायत नियमविरुध्द छल से मार दिए गए। दुर्योधन को वहां गदा मारी गई, जहां मारने का विधान गदायुध्द में नहीं होता। अर्थात मामला धर्म या अधर्म का नहीं था। युध्द जीतना खालिस लक्ष्य था। इसलिए हर उस योध्दा को, जैसे भी हो मार डाला गया जिसका न मरना शत्रु को दिन के तारे दिखा सकता था।

पाण्डवों को यह कुकर्म कई बार करना पड़ा, क्योंकि कौरवों की ओर अजेय किस्म के योध्दा ज्यादा थे। अगर कोई दुर्योधन को समय पर सुझा देता तो वह भी भीम को वर्जित स्थान पर गदा मारकर लिटा देते जैसे भीम ने उन्हें लिटा दिया। कर्ण का बस चलता तो वह अर्जुन को छोड़ते नहीं। उन्हें तो बस मौका ही नहीं मिला। तो कैसे फैसला करें कि किस पक्ष ने धर्मयुध्द किया? जब महान योध्दाओं को छल से मारा गया तो दूसरे, तीसरे, चौथे दर्जे के लोग कैसे मारे गए होंगे, इसकी कल्पना कर सकते हैं। इसलिए कहने का साहस नहीं होता कि दुर्योधन के पक्ष में अधर्म था और धर्म का पलड़ा पाण्डवों की ओर झुका था।

राजसिंहासन पर दावा स्पष्ट नहीं। युध्द में सहारा छल का लिया गया। फिर क्या इसलिए पाण्डवों का पक्ष धर्म का मान लें कि वे जीत गए और इसलिए उन्हें जीता हुआ मान लें कि वे राजा बनने के लिए बचे रह गए? सचमुच व्यास को एक बड़ा रैफरी मानना होगा। जिन्होंने ऐसा करतब भरा मैच खेलाया कि पांच हजार साल बाद भी फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि जीत- हार की परवाह किए बिना कौन धर्ममार्ग पर चला।

This entry was posted on Saturday, July 5th, 2008 and is filed under अतीत, वेद-पुराण, सूर्यकान्त बाली. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

2 Responses to “महाभारत में धर्म किसके पास था?”

  1. naresh on August 26th, 2009 at 2:42 pm

    ahahhaahaahah mitra main aapaki bhavnao or is lekh ka samman karata hun…………………prantu ek prashn bhi karata hun ki kya kichad saf karane wale upkaran ko aap rasoi main rakh sakate hai ………….kadachit nahi yahi baat hai ……………yaha dharm rasoi hai upkaran pandav or kichad korav ………….or saf karane wale hain shree bhagbaan krishna prabhu……………………..aap ka yah lekh
    paschchatya soch ki tarah bato ki amurtata main ulajha hua hai………………….ek udaharan lijie ki hum nadio, pedho, or pathharo ko puzate hain…………….jise agar mansik soch se dekhe to azeeb aviswasniy lagata hai parantu yadi tatwa se dekhe to bo bhi jivit hai kyoki aadi shakti to tatwa hai hum manavo ne ise jivit or nirjiv main bhivakt kar dia hai parantu bastav main har kan hi gatimaan hai…………..ye murkh samaz sirf 4 tatwo par hi nirbhar karata hai panchave tatwa ke bare main nahi janata atah kuch bhi nahi janata…………………jai ho param pita parmatma bhagbaan shree krishna chandra ji maharaj……………………..

  2. Dr.Adhura on September 8th, 2009 at 11:05 am

    sahi bilkul sahi .

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