पवित्र जैन परम्परा संथारा |
-अमित राय जैन
कुछ वर्ष पहले एक जैन महिला ने संथारा प्रक्रिया के अंतर्गत मृत्यु को वरण किया। इसे लेकर उस समय प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बड़ा हो हल्ला मचा। उस समय जैन परंपरा ‘संथारा’ के सम्बन्ध में जो टिप्पणियां मीडिया में आयीं, वे इतनी सतही थीं कि ताज्जुब होता है। पत्रकारों की आचार संहिता में एक नियम अवश्य सम्मिलित किया जाना चाहिए कि धार्मिक मामलों में वही पत्रकार लिखे जो विषय की अच्छी जानकारी रखता हो।
जिस तरह सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के फैसलों के सम्बन्ध में विधि विशेषज्ञ पत्रकार ही टिप्पणी करते हैं या अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के ज्ञाता। उसी तरह धार्मिक मामलों में भी विशेषज्ञ पत्रकार को ही बोलना चाहिए। मीडिया द्वारा बिना विषय की समझ के धार्मिक मामलों में बोलने का ही परिणाम है कि पवित्र जैन परंपरा ‘संथारा’ की आत्महत्या के रूप में चर्चा होने लगी।
सर्वप्रथम यह समझ लेना जरूरी है कि जैन धर्म में आत्महत्या को बुरा कृत्य माना गया है। आत्महत्या करने का विचार भी जैन धर्म में वर्जित है। इसके लिए प्रयास करना तो बहुत ही अधिक निन्दनीय माना गया है। उत्तराध्ययन सूत्र के 36 वें अध्ययन की 268 वीं गाथा में लिखा है, ‘शस्त्र प्रयोग, विष भक्षण, अग्निप्रवेश, जल प्रवेश आदि अनाचरणीय साधनों का सेवन करते हुए जो व्यक्ति अपनी जीवन-लीला का समापन करते हैं वे जन्म और मरण के बंधनों को सदा के लिए बांध लेते हैं। जैन धर्म में उस प्रत्येक कार्य को पाप कहा गया है जिसके पीछे तीव्र वैर-भाव, भय शोक, आसक्ति, क्रोध, लोभ आदि भाव छिपे होते हैं। आत्महत्या के पीछे भी यही कुछ भाव प्रेरक रूप में छिपे रहते हैं।
अत: आत्महत्या को जैन धर्म में सामान्य पाप न कहकर महापाप कहा गया है। किसी भी नवागन्तुक या बालक को जब जैन साधु-साध्वी धर्म का पहला पाठ (गुरु धारणा या सम्यक्त्व) पढ़ाते हैं तो मांसाहार, मदिरापान और द्यूतक्रीड़ा जैसे बड़े पापों के साथ आत्महत्या को भी प्रतिबंधित करते हैं। जैन धर्म में त्याग और तपस्या के लिए सदैव प्रेरणा दी जाती है। संसार से, परिवार से, शरीर से मोह, आकर्षण तथा लगाव कम करना ऊंचा धर्म माना जाता है। क्योंकि, इसी मोह के कारण मनुष्य रागद्वेषमय प्रवृत्ति करता है। आज संसार में जितनी भी विषमताएं दृष्टिगोचर हो रही हैं उनका मुख्य कारण मोह है। चाहे वह मोह परिवार से हो या अपने शरीर से । जैन साधना पद्धति में इसी मोह को कम करने या खत्म करने की विधियां बताई गई हैं। गृहस्थ जीवन में इस मोह को कम करने का प्रयत्न किया जाता है तथा साधु जीवन में इसे खत्म करने का संकल्प लिया जाता है।
जब कोई साधक संन्यास धर्म में प्रवेश करता है तब वह नाना प्रकार के नियमों का पालन करने की प्रतिज्ञा करता है। जैन साधना में ब्रह्मचर्य पालन, रात्रि भोजन का त्याग, नंगे पैरों से विहार, केश लोच, अल्प वस्त्र या अवस्त्र अवस्था आदि आवश्यक नियम होते हैं। इन सब का मुख्य उद्देश्य यही है कि शरीर से अत्यधिक आसक्ति न रहे और यह मन निर्द्वन्द्व और निश्चिन्त रहे। इस निर्मोह अवस्था को पुष्ट करने के लिए नाना प्रकार के विधि-विधान जैन शास्त्रों में निर्धारित किए गए हैं। तीन मनोरथ इसी निर्मोहता के लिए विहित किए गए हैं। प्रत्येक गृहस्थ प्रतिदिन प्रात: उठते ही भावना भाता है कि-1. मैं आरंभ परिग्रह न्यून करूं 2. मैं गृहस्थ जीवन छोड़कर साधु बनूं 3. मैं अन्तिम समय में शरीर की ममता छोड़कर ‘सलेखना संथारा’ करूं। इसी तरह प्रत्येक साधु यह भावना भाता है कि 1. मैं अधिकाधिक शास्त्रों का अध्ययन करूं 2. मैं सभी आश्रयों को छोड़कर एकाकी विचरण करूं 3. मैं अंतिम समय में शरीर की ममता छोड़ ‘संलेखना संथारा’ करूं।
संलेखना संथारा श्रावक और साधु का अन्तिम लक्ष्य तो है पर उसके लिये वह जीवन की उपेक्षा नहीं करता। जैन धर्म में संयमी जीवन को ही अधिमान दिया जाता है। ऐसा कोई विधान नहीं है कि मुनि दीक्षा लेते ही संथारा ग्रहण कर ले। साधक का अधिकाधिक यह प्रयास होता है कि जहां तक संभव हो वहां तक जीवन की रक्षा की जाए। मनुष्य जन्म की उपलब्धि को अन्य सभी धर्म ग्रन्थों की तरह जैन आगमों ने भी अति दुर्लभ माना है। इसी कारण रोगादि की स्थिति में मुनियों को चिकित्सा करवाने की अनुमति है। स्वयं तीर्थंकर महावीर स्वामी ने भी मुनियों की भावना का सम्मान रखने के लिए प्रासुक निर्दोष औषधि का सेवन किया था।
यह एक नि:संदिग्ध तथ्य है कि जैन धर्म जीवन का समर्थक है, मृत्यु का पुजारी नहीं है। ये ठीक है कि यहां सामान्य जीवन की बजाय संयमी जीवन की पूजा की गई है। कुछ लोगों के मस्तिष्क में यह भ्रान्ति घर कर गई है कि जैन धर्म जीवन-रक्षा के प्रति सावधान न होकर मरणोन्मुखता को प्रश्रय देता है। उनकी यह धारणा नितान्त निर्मूल है। क्योंकि, जैन धर्म तो सदा ही ‘जीओ और जीने दो’ का नारा देता रहता है। हां, यदि कभी देश, धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए जीवन की आहुति देने का प्रसंग आया है तो उसमें भी जैनों ने अपनी वीरता का प्रदर्शन किया है।
जैन धर्म की मान्यता रही है कि जीवन को शान से जीओ। संयम साधना और तपस्या से इसे चमकाओ और जब इससे विदा होने का अवसर आए तब भी हंसते-हंसते इस दुनिया से कूच कर जाओ। जीवन के साथ मृत्यु का अटूट सम्बन्ध है। मृत्यु को भी जीवन्त बनाने की कला जैन धर्म में बताई गई है। जीते-जी मुनि तपस्या का अभ्यास करता रहता है। रात्रि को आहार जल ग्रहण न करने का उसका आजीवन नियम होता है। वह यथा-शक्ति उपवास – दो उपवास, तीन उपवास तथा बढ़ते-बढ़ते छह मास तक के उपवास रूपी तप का भी अभ्यास कर लेता है।
हर तपस्या के बाद पारना करने की अनुमति या इच्छा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जैन धर्म जीवन की डोर को एक झटके से तोड़ने की आज्ञा नहीं देता। वह तो जीवन को अधिकाधिक लम्बा करने की प्रेरणा देता है। लेकिन, कोई भी साधक इस सच्चाई से भी अपनी आंखे नहीं मूंद सकता कि अन्तत: जीवन का भी अन्त आएगा ही। उस अन्तिम समय को जल्दी तो नहीं बुलाना पर वह आए, इससे पूर्व उसकी तैयारी अवश्य कर लेनी चाहिए। ऐसा नहीं हो कि जीवन का आखिरी वक्त आ जाए और हम उस क्षण का आनन्द भी न ले सकें।
हर धार्मिक व्यक्ति की दिली तमन्ना होती है कि जब वह अपनी आखिरी सांस ले तब प्रभु के चरणों में उसका ध्यान बना रहे। जैन धर्म में इस समय के लिए एक पूरी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्यवस्था प्रदान की गई है। जीवन का अधिकांश भाग संयमपूर्वक व्यतीत हो जाने के बाद साधक एक निर्णय लेता है कि मुझे इस शरीर से कुछ-कुछ मोह घटाना चाहिए। और वह 12 वर्ष की संलेखना प्रारंभ कर देता है। उत्तराध्ययन सूत्र के 36 वें अध्ययन की 251 से 256 वीं गाथा तक इस प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। सब से बड़ी संलेखना 12 वर्ष की, मध्यम संलेखना एक वर्ष की तथा सबसे छोटी संलेखना 6 महीने की होती है।
12 वर्ष की संलेखना में भी एकदम आहार त्याग नहीं किया जाता है, केवल शरीर की आवश्यकताएं घटाई जाती है। जैसे, पहले चार साल तक दूध, दही, घी आदि गरिष्ठ वस्तुओं का सेवन नहीं किया जाता। अगले चार वर्ष तक व्रत, बेले, तेले आदि की विचित्र तपस्या की जाती है, फिर दो वर्ष तक एक-एक दिन के अन्तराल से आयम्बिल (रूक्षाहार) किया जाता है। शुरुआती छ: महीने कोई विशेष तप करने का पूर्ण निषेध है। अगले छ: महीने कठोर तप का विधान है। फिर अंतिम वर्ष में श्रृंखलाबद्ध आयम्बिल तप करने का प्रावधान है और जब ये प्रतीत होने लगे कि शरीर बिल्कुल अंतिम छोर से गुजरने जा रहा है तब 15 दिन या एक महीने के लिए पूर्णत: आहार का त्याग कर देने का नियम है। यदि 12 वर्ष के मध्य में भी यह अहसास हो जाए कि मृत्यु निकट है तो पूर्ण आहार त्याग किया जा सकता है। क्या संथारे की इतनी विस्तृत भूमिका के बाद कोई संदेह शेष रहता है कि जैन धर्म में आत्महत्या को क्यों निन्दनीय तथा संथारे को क्यों अतिवन्दनीय माना गया है।
इतिहासकारों ने जैन मान्यता की पुष्टि की है कि प्रथम भारत सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने धर्मगुरु भद्रबाहु स्वामी के सानिध्य में संलेखना व्रत स्वीकार किया था। पुस्तकीय साक्ष्यों के अतिरिक्त शिलालेखीय प्रमाणों की विशाल संख्या यह सिद्ध करती है कि संलेखना संथारा बहुत प्राचीन काल से जैन धर्म में की जाती रही है। प्राचीनकाल से आज तक लाखों करोड़ों बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री, विधि-विशेषज्ञ, शासक एवं धर्म पुरुष जिस संथारे को बड़ी पवित्र भावना से देखते आए हैं, उसी संथारे की यदि कुछ छुटभैये पत्रकार आत्म हत्या से तुलना करें तो हैरत ही होती है। आत्महत्या तथा संथारे में यदि कोई समानता है तो केवल इतनी कि दोनों का परिणाम या उत्तरकाल मृत्यु है। अन्यथा ये दोनों किसी भी अर्थ में समान नहीं हैं।



आत्महत्या के समय या तो आप अन्यंत दुखी होते हैं या आवेश में होते हैं. जबकि संथारे के समय आप प्रसन्नचीत होते हैं तथा शांत भाव से सोच कर निर्णय लेते है.
संधारा जैसी पवित्र जैन परम्परा को आत्महत्या का नाम देना किसी मूर्खता से कम नहीं है. अगर देखा जाए तो इस से बढकर कठोर तप शायद किसी भी धर्म/सम्प्रदाय में मिलना दुर्लभ है.
santhara galt khna dimag ki chhoti soch hai.ise jain dharm ke anusar hi. nahi ise hae aadmi ko apne jiwan me apnana chahiye .jb aadmi bda ya lachar ho jata hai marne ke intjar me roj marta rhta hai .us se achha hai ki vh santhara kar apne jiwan ko sukhi bnale. midiya khabar nahi masala becheti hai.
AAj ke daur me media bahut bada madyam hai aur Santhare ko galat manna internet ke buddhijiviyo ki soch hai. Inhe byline story se matlab hai aur kisi vishay vishesh ke goodh me nahi jate hai.Santhara ek Dharmik vishay hai aur bina sastro ko samjhe iter logo ke samajh se pare hai. Santhara healty logo ke liye nahi hai. ye to nikatvarti mrityu ko mahotsav banane ki kala hai.
santhare jaisi pavitra prakriya ko badnam karna sarvatha anuchit hai. me hath jod kar patrakaro se vinti chahunga ki vishv ke sarvadhik prachin mat/darshan/dharm ki kriyao ko matra apni trp ke liye badnam na kare