औषधीय पौधों का संरक्षण

Agriculture-आर. के. उपाध्याय

   भारत भूमि प्राचीन काल से ही विश्व में अपनी सांस्कतिक धरोहर और उपजाऊ भूमि के लिए प्रसिद्ध रही है। यहां की भूमि विभिन्न औषधीय पौधों की जननी है। इसी कारण यहां विभिन्न चिकित्सा पद्धतियां जैसे आयुर्वेद, यूनानी, सिद्धा, प्राकृतिक चिकित्सा आदि पल्लवित एवं पुष्पित हुईं। इन सभी पद्धतियों के औषधीय विनिर्माण में लगभग 90 प्रतिशत जड़ी-बूटियों का उपयोग होता है जो मुख्यत: वनों से आती हैं। अत्यधिक उपयोग के कारण प्राकृतिक रूप में औषधीय पौधों को बचाना मुश्किल हो गया है और उनकी संख्या में भी कमी आ गई है। सामान्य जनता को इसकी पहचान न होने के कारण हमारे आस-पास, बगीचों तथा खेतों में पाए जाने के बावजूद इन पौधों को खरपतवार समझकर लोग इन्हें नष्ट कर देते हैं।

   भारतवर्ष में जड़ी-बूटियों की खेती का इतिहास काफी पुराना है। प्राचीन समय में भी चिकित्सकीय उपयोग हेतु वैद्य एवं हकीम अपनी गृहवाटिका में कुछ उपयोगी पौधे अवश्य लगाते थे। तथापि औषधीय पौधों की व्यापक एवं व्यावसायिक खेती की तरफ जनसामान्य में जितनी रुचि वर्तमान समय में जागृत हुई है, उतनी संभवतया पहले कभी नहीं हुई थी। इस वस्तुस्थिति के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें प्रमुख हैं – देशी तथा अन्तरराष्ट्रीय बाजार में इनकी बढ़ती मांग प्राकृतिक स्रोतों से इनकी उपलब्धता में कमी तथा लुप्त होती जा रही प्रजातियों की संख्या में निरंतर वृद्धि, परम्परागत फसलों की अपेक्षा जड़ी-बूटियों की खेती से मिलने वाला अच्छा लाभ, जड़ी-बूटियों की खेती हेतु उचित मार्गदर्शन तथा प्रशिक्षण की उपलब्धता तथा इस को बढ़ावा देने हेतु शासकीय स्तर पर अभूतपूर्व प्रयास, विशेषतया राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्डों का गठन आदि। इन समस्त कारकों के फलस्वरूप देशभर में औषधीय फसलों की खेती के प्रति अभूतपूर्व रुचि जागृत हुई है।

   इससे एक तरफ जहां परम्परागत कृषि को छोड़कर किसान औषधीय पौधों की खेती की ओर आकृष्ट होने लगे हैं, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे युवक भी, जो अभी तक खेती-किसानी के कार्य को केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का व्यवसाय मानते थे, औषधीय पौधों की खेती अपनाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं।

   यहां हम उदाहरण के लिए सफेद मूसली की चर्चा करेंगे। सफेद मूसली जिसे आयुर्वेद में दिव्य औषधि और आज के युग में हर्बल वियाग्रा के नाम से जाना जाता है, वर्षा ऋतु की फसल होने के कारण मानसून आते ही जंगलों में अपने आप उगने लगती है। यदि इसका जीवन चक्र देखा जाए तो उगने से 20-25 दिन के अंदर ही इसमें नई जड़ें (टयूबर्स) विकसित होने लगती हैं तथा इसी बीच इन पर फूल तथा बीज आ जाते हैं। सितम्बर का महीना आते-आते इसके सारे पत्ते झड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में जंगल में मूसली को ढूंढ़ पाना सम्भव नहीं हो पाता। जंगल से इसे तभी तक (उखाड़ा) प्राप्त किया जा सकता है जब तक इसके पत्ते दिख रहे हों। फलत: इनकी खुदाई अगस्त- सितम्बर माह में ही करनी पड़ती है। इस समय जो मूसली उखाड़ी जाती है वह न तो पूरी तरह तैयार हो पाती है, और न ही उसमें समस्त औषधीय गुण विकसित हो पाते हैं।

   इसके विपरीत यदि मूसली खेत में तैयार की जाए तो उसे अपनी सुविधानुसार उखाड़ा जा सकता है क्योंकि उसके पत्ते झड़ जाने के उपरांत भी इसके औषधीय गुणों के विकास हेतु इसे खेत में ही रहने दिया जा सकता है। सर्दी का मौसम निकल जाने के उपरांत जब मार्च-अप्रैल माह में यह पूर्णतया तैयार हो जाती है तो इसे खेत से निकाल लिया जाता है। परीक्षणों से भी यह सिद्ध हो चुका है कि सैपोनिन्स की मात्रा में सितम्बर के बाद निरंतर वृद्धि होती जाती है। फलत: मार्च-अप्रैल माह में निकाली गई मूसली न केवल औषधीय गुणों की दृष्टि से अपेक्षाकृत ज्यादा परिपूर्ण होती है बल्कि इसका आकार भी बड़ा होता है तथा देखने में भी यह ज्यादा आकर्षक लगती है। इस प्रकार जंगलों से प्राप्त मूसली की अपेक्षा खेत में तैयार की गई मूसली व्यावसायिकता, उपयोगिता तथा पर्यावरण की दृष्टि से ज्यादा उपयोगी होती है।

   सफेद मूसली में कार्बोहाईड्रेट्स 42 प्रतिशत, प्रोटीन 8 से 9 प्रतिशत, सैपोजिन्स/सैपोनिन्स 2 से 17 प्रतिशत, रेशा 3 से 4 प्रतिशत, एल्कलोंयड्स 25, विटामिन ए, बी, डी तथा ई, ग्लूकोसइड्स, अमीनो अम्ल स्टरयोरड्स आदि और खनिज लवण 7 से 15 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। सैपोजिन्स की मात्रा के आधार पर ही इसका मूल्य निर्धारण होता है। सफेद मूसली के औषधीय उपयोग व लाभ अनेकानेक हैं यथा आयुर्वेदिक, यूनानी एवं एलोपैथिक दवाओं के निर्माण में, शारीरिक बीमारी एवं दुर्बलता को दूर करने में और शुक्राणुओं को बढ़ाने एवं नपुंसकता को दूर करने में अति लाभप्रद, मधुमेह एवं जोड़ों के दर्द में गर्भावस्था एवं बच्चे के जन्म के बाद होने वाले रोगों को दूर करने में यह अत्यंत प्रभावी है।

   मात्र 6 से 8 माह में प्रति एकड़ एक से दो लाख रूपए का शुद्ध लाभ देने वाली और कोई फसल नहीं है। इसकी किसी प्रकार की प्रोसेसिंग करने की आवश्यकता नहीं – कोई मशीन लगाने की जरूरत नहीं। इसे किसान सीधे उखाड़ कर, छील कर तथा सुखा कर बेच सकते हैं। सफेद मूसली के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध है। इसलिए इसकी खेती रोजगार एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराती है। मौसम में परिवर्तन से इस पर कोई असर नहीं पड़ता। सफेद मूसली की खेती पूरे भारत में की जा सकती है।

   औषधीय खेती में देसी पद्धति भारतीय संस्कृति की पारंपरिक पद्धति है जिसे आधुनिक विज्ञान के समन्वय से पूर्ण प्रतिपादित किया गया है। वर्मी कम्पोस्ट अन्य खादों की अपेक्षा कई दृष्टियों से ज्यादा लाभकारी है।

   सफेद मुसली की भांति कई और औषधीय पौधे भी हैं, जिनकी सफल व्यावसायिक खेती की जा सकती है। ऐसे कुछ पौधों के नाम इस प्रकार हैं: गिलोय (Tinospora cordifolia Miers), कलिहारी (Gloriosa superba linn), भूमि आमलकी (Phyllanthus amarus) ब्राह्मी (Bacopa monnieri), चंदन (Santalum album), चिरायता (Swertiachirata) गुगुल (Commiphora wightii), पिप्पली (Piper longum), पत्थर चूर (Coleus forskholi), सर्पगंधा (Rauvolfia Serpantina) आदि।

   विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत लोग आज भी मुख्य रूप से पारंपरिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति पर निर्भर हैं जिसमें औषधीय पौधों का उपयोग किया जाता है। इसीलिए विकासशील देशों के साथ-साथ विकसित देशों में भी औषधीय पौधों से संबंधित उत्पादों की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। परंतु इसके साथ ही यह दुर्भाग्य की बात है कि हमें इनमें से अधिकांश पौधों की व्यावसायिक महत्ता तथा उनके औषधीय गुणों की पहचान नहीं है। आज अनेक जड़ी-बूटियां लुप्त होने की कगार पर हैं। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि इन जड़ी-बूटियों की विधिवत खेती की जाए। इससे एक तरफ मांग के अनुसार गुणवत्तापूर्वक उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे और दूसरी और इनके खरीददारों को इनकी निरंतर पूर्ति भी मिलती रहेगी।

This entry was posted on Saturday, May 7th, 2005 and is filed under विविधा. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

4 Responses to “औषधीय पौधों का संरक्षण”

  1. संगीता पुरी on February 18th, 2009 at 11:34 pm

    औषधीय पौधों का संरक्षण आवश्‍यक है……बिल्‍कुल सही।

  2. javed shah khajrana on January 23rd, 2010 at 11:58 pm

    itani pyari janakari ke liye shukriya…………….

  3. praveen on October 25th, 2010 at 6:18 pm

    respected sir
    I am intrested in safed musali ki kheti plesae tell me all about this.

  4. jitendra jadav on November 26th, 2010 at 1:07 pm

    me safed musli ki kheti jaroor karunga

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