जगदगुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय

Jagadguru Rambhadrachary-शुभ्रा

भारत में लगभग 9 करोड़ लोग विकलांग है। हताशा एवं निराशा में जी रहे इनके बारे में सोचने की फुर्सत किसके पास है। सरकारी योजनाएं तो केवल कागजों तक ही सिमटी है। संसद में न जाने कितनी बातों पर बहस होती है और संबंधित विधेयक लाया जाता है। पर इस ओर ध्यान नहीं जाता किसी का। सरकारी कागजों में विकलांगों के लिए प्रयोग किया गया ‘नि:शक्त’ शब्द मानसिक रूप से इन्हें चोट पहुंचाता है। वही समाज भी इनसे उपेक्षा पूर्ण व्यवहार करता है। जिससे ये मानसिक कुंठा के शिकार हो जाते हैं।

इनकी व्यक्तिगत प्रतिभा का हनन होता है। इन्हें भी सम्मानपूर्ण जीवन जीने का हक है। इनकी प्रतिभा को निखारने एवं संवारने में जुटा है चित्रकूट (उत्तरप्रदेश) में स्थित जगदगुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय। इसकी स्थापना 27 सितम्बर 2001 में की गई थी। श्री आचार्य जी (रामभद्राचार्य) जो यहां के चांसलर हैं स्वयं दृष्टिहीन हैं। उन्होंने न जाने कितने युवाओं को जीवन के प्रति एक उमंग और ऊर्जा से भरपूर सोच एवं नजरिया प्रदान किया है। इनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन का ही परिणाम है कि आज कई युवा जिनकी जिंदगी अंधेरों में गुम हो गई थी शिक्षा पूरी कर रोजगार कर रहे हैं।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य का जन्म 14 जनवरी 1952 को उत्तर प्रदेश जौनपुर जिला के एक गांव शीखुर्द में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका प्रारंभिक नाम गिरिधर मिश्र था। इनकी माता का नाम श्रीमती शचि देवी तथा पिता का नाम पंडित श्री राजदेव मिश्र था। जन्म के मात्र दो माह बाद एक बीमारी से इनकी आंखों की रौशनी जाती रही। परिवार के लोग चिंतित हो उठे। उनके जीवन, उनकी शिक्षा पर इसका प्रभाव पड़ेगा, ये जान उनके आने वाले भविष्य को लेकर आशंकित थे। ज्यों-ज्यों बालक बड़ा हुआ लोगों ने पाया कि उनमें सुनने एवं ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता है।

बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने कठिन श्लोकों एवं कविताओं के अर्थ को बताना शुरू कर दिया था। उन्होंने मात्र 5 साल की आयु में श्रीमद्भगवदगीता, मात्र 8 वर्ष की आयु में तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ को याद कर लिया था। उन्होने संस्कृत एवं हिन्दी में अनेक साहित्य रचनाये की हैं। उनके द्वारा लिखित प्रमुख पुस्तके हैं- मुकुन्दस्मरण, भारत महिमा, मानस में तापस प्रसंग, तुलसी साहित्य में कृष्ण कथा, ब्रह्मसूत्र भाष्य इत्यादि। इन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान है जिनमें प्रमुख है- संस्कृत, हिन्दी, इंग्लिश, फ्रेंच, भोजपुरी, मैथिली, ओरिया, गुजराती, ब्रज आदि।

उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए चित्रकूट ही क्यू चुना तो उनका जबाब होता है। कि चित्रकूट श्रीराम की कर्मस्थली है जो प्रत्येक से प्रेम करते थे। 5 एकड़ में फैले इस विश्वविद्यालय का एकमात्र उद्देश्य है शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को इस योग्य बनाना कि वे किसी और पर आश्रित रहकर अपना जीवन न गुजारें। वरन् अपनी प्रतिभा एवं योग्यता से अपने आप को समाज में बेहतर साबित करे और एक अच्छा सम्मानपूर्ण जीवन बिताये।

संस्कृत एवं कम्प्यूटर का सामान्य ज्ञान होना यहां के पाठयक्रम का आवश्यक हिस्सा है। संस्कृत इसलिए क्योंकि वे मानते हैं कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसे जाने बगैर हम भारत की गौरवशाली संस्कृति को नहीं समझ सकते हैं। कम्प्यूटर ज्ञान आज की आवश्यकता है। फ्री बोर्डिंग के साथ विशेष प्रकार के खेलों के विशेषज्ञ की व्यवस्था है। जो देख नहीं सकते उनके लिए ब्रेल लिपि के विद्वान के द्वारा लेक्चर की व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं मूक बधिर विद्यार्थियों की वीडियो (चलचित्र) के माध्यम से संपूर्ण पाठयक्रम बताया एवं पढ़ाया जाता है।

व्यवस्था इतनी उत्तम एवं प्रत्येक व्यक्ति के अनुसार बनाई गई है कि विद्यार्थी सहज अनुभव करता है कि यहां के विभिन्न पाठयक्रमों में समाहित है- कानून, कला, बायोटेकनिकल, विज्ञान, पैरामेडिकल, कृषि, वाणिज्य, प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य विज्ञान, मेडिकल साइंस, आयुर्वेद, होम्योपैथी, दूरवर्ती शिक्षण, पुस्तकालय, जंतु विज्ञान इत्यादि।

विभिन्न पाठयक्रमों में ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन एवं डाक्टरेट की उपाधि प्रदान की जाती है। जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनसे शुल्क नहीं लिया जाता। छात्र एवं छात्राओं के लिए कैंपस में छात्रावास भी हैं, जो उनकी आवश्यकतानुसार अनेक सुविधाओं से युक्त है। एक लाइब्रेरी और कम्प्यूटर लैब है। इनके अलावा यंत्रचालित उपकरण इन्हें प्रदान किया जाता है जिससे इनका कार्य आसान बन जाता है। दूरवर्ती शिक्षण की भी व्यवस्था है जिससे वो लोग भी शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं जो दूरी की वजह से मन मसोस कर रह जाते थे। शिक्षा के अलावा अन्य गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा संगीत, खेल, हस्तशिल्प से संबंधित समय-समय पर अनेक कार्यक्रमों एवं गतिविधियों का आयोजन कर इनकी प्रतिभा को विस्तारित रूप प्रदान किया जाता है। यहां के बच्चों ने अपनी प्रतिभा के बलबूते अनेक स्तरों पर कई पुरूस्कार भी जीते हैं।

यह शायद विश्व का पहला विश्वविद्यालय है जिसने विकलांगता के दर्द को समझा। उस दर्द का सार्थक उपचार कर रहा है। अभिशाप मानकर जीवन जीने वाले व्यक्तियों में नई चेतना को जागृत करने का अनूठा प्रयास कर रहा है।

This entry was posted on Friday, February 12th, 2010 and is filed under सार्थक प्रयास. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

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