व्यंग्य : भर भंडोलाजी

-पवन श्रीवास्तव

   एक मसल है ‘सौ राजा की बुद्धि बराबर एक चोर की बुद्धि। सौ चोर के बराबर एक गणिका की बुद्धि। सौ गणिकाओं की बुद्धि के बराबर एक भांड की बुद्धि और अंत में सौ भांड की बुद्धी के बराबर एक भरभंडी की बुद्धी।‘ अब मसल है तो ऐसे तो बन नहीं होगी, किसी ने बनायी होगी। तो मतलब यह है कि सौ भरभंडी की बुद्धि के बराबर एक उसकी बुद्धि जिसने ये मसल बनायी।

खैर, छोड़िये इस अन्तहीन पचड़े को। मूल बात यह है कि भरभंडी मुनि सोचते-सोचते अपनी अप्रासंगिकता पर खिन्न हो गए हैं। उदास हैं कि वो अपनी भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहे हैं। भरभंडी माने होता क्या है और कौन है ये भरभंडी मुनि? भरभंडी को समझने के लिये भोजपुरी की एक और मसल को देखें। मसल है कि ‘ना खेलब ना खेले देब, खेलि बिगाड़ब’ (न खेलेंगे न खेलने देंगे, खेल को ही बिगाड़ देंगे) इस मसल के लिए एक शब्द, ‘भंडोल’ या ‘भरभंड’ है। किसी भी खेल को भंडोल या भरभंड कर देने में माहिर लोगों को भरभंडी कहते हैं और इस पूरे दर्शन के दार्शनिक हैं भरभंडी मुनि।

तो भरभंडी मुनि खिन्न हैं, उदास हैं, अप्रासंगिकता बोध से ग्रसित हैं, उनको महसूस हो रहा है कि न तो वे अपने धर्म का पालन कर पा रहे हैं, न ही प्रदत्त कर्तव्य का। दुनिया में एक से बढ़कर एक खेल चल रहे हैं और मुनि जी के चेले कुछ नहीं कर पा रहे हैं। सत्ता का खेल, शासन का खेल, सरकार का खेल, प्रशासन का खेल, संचार का खेल, धन का खेल, भरम का खेल, प्रचार का खेल, संचार का खेल और सबसे बड़ी बात यह है कि ये सब खेल, खेल कम खुर-खेल ज्यादा हैं। ऐसा इसलिए कि खेल की भी एक खेल भावना होती है और जिस खेल में कोई भावना ना हो, उसको ही खुर-खेल कहते हैं।

दुनिया को बचाना है तो जो खुर-खेल चल रहे हैं और जो एक महाविनाशक खेल का रूप ले चुके हैं, उनको ‘भंडोल’ करना ही होगा। इसके लिए भरभंडी मुनि को अपने शिष्यों के लिए रिफ्रेसर कोर्स चलाना होगा। भंडोल टेक्नोलाजी की पढ़ाई की अत्याधुनिक व्यवस्था करनी होगी। भगवान कृष्ण और नारद मुनि जैसे महाभरभंडियों के चरित्रों को नए संदर्भों में परिभाषित कर उनको इन्टरनेट पर डालना होगा। दुनिया भर के भरभंडियों का एक ग्लोबल सम्मेलन कराना होगा। उन्हें अपनी ऐतिहासिक भूमिका को याद करना होगा।

भारी मात्रा में भरभंडी साहित्य का निर्माण कराना होगा। जो खेल चल रहे हैं उसका पक्ष या विपक्ष का खिलाड़ी, रेफरी, आयोजक या दर्शक बनने के बदले भरभंडी बनकर इस खेल को भंडोल करना आज के समय की मांग है। हे दुनिया के भरभंडियो उठो, जागो और तब तक सोओ नहीं जब तक ये सारा खेल भंडोल न हो जाए। भरभंडी मुनि का आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। दुनिया के हर सज्जन व्यक्ति के लिये उनका संदेश है, ”भरभंडी भव:, भंडोलम् कुरू।”

अब मुनि जी का आशीर्वचन जिस पर फलित होने वाला है और जो इस दर्शन से प्रभावित होकर भरभंडी बिरादरी में शामिल होना चाहते हैं, उन्हें कोई कठिनाई न हो और वे आराम से इस बिरादरी में शामिल हो सकें, इस बात को ध्यान में रखकर कुछ आवश्यक सूचनाएं देना मुनि जी अपना कर्तव्य मानते हैं।

पहली सूचना अर्हता या पात्रता के बारे में :-

1. कोई उम्र सीमा नहीं

2. कोई आरक्षण नहीं

3. जाति, धर्म, संप्रदाय, राष्ट्रीयता, क्षेत्रीयता, रंग, लिंग आदि का कोई भेद नहीं।

4. पात्र के भीतर बात-बात पर कुछ कर गुजरने के भाव का नितान्त अभाव होना चाहिए।

5. संचार और प्रचार माध्यमों के प्रति आर्कषण-भाव का नितान्त अभाव।

6. अपनी बौद्धिक संपदा व्यय करने के मामलों में मक्खीचूस होना चाहिए।

7. जिसके व्यक्तित्व रूपी अंगूठी में आलस्य नगीने की तरह जड़ा हो अर्थात जिसकी ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय और कर्मेन्द्रियां निष्क्रिय हों।

उपरोक्त में से किन्ही चार गुणों को धारण करने वाले भरभंडी बिरादरी में आसानी से प्रवेश पा सकते हैं।

This entry was posted on Friday, December 4th, 2009 and is filed under व्यंग्य, साहित्य. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

Comments are closed.