वैकल्पिक ऊर्जा की आवश्यकता

Pawan chakki-हिमांशु शेखर

   कोई भी अर्थव्यवस्था अपनी विकास की रफ्तार को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किए बगैर बनाए नहीं रख सकती। भारत को भी इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। जिस तेजी से भारत  की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं, उस तेजी से इसका उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। इस बात को स्वीकारने में भी किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि उपलब्ध संसाधनों और हाल ही में अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते से मिलने वाली परमाणु ऊर्जा के जरिए भी बात बनने वाली नहीं है। ऐसे में आज वक्त की जरूरत यह है कि वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को तलाशा जाए और बढ़ती जरूरतों की पूर्ति की जाए।

   एक अनुमान के मुताबिक देश में सालाना तकरीबन पांच हजार करोड़ रुपए का नुकसान बिजली आपूर्ति व्यवस्था के दुरुस्त नहीं होने और बिजली की चोरी की वजह से होता है। एक जानकार ने कुछ साल पहले अपने अध्ययन के आधार पर यह हिसाब लगाया था कि दुनिया को जितनी सूर्य की रोशनी उपलब्ध है, अगर उसका प्रयोग बिजली बनाने में कर लिया जाए तो अभी जितनी बिजली की खपत दुनिया में है उससे बीस हजार गुना ज्यादा बिजली बनाई जा सकती है। इससे मिलती-जुलती बातें कई और अध्ययनों से उभर कर सामने आई हैं। उपलब्ध गैरपारंपिक ऊर्जा स्रोतों के प्रयोग को गति दिए जाने की दरकार है। इस मामले में भारत की हालत  उत्साहजनक नहीं है। भारत में अभी गैरपारंपिक ऊर्जा स्रोतों के महज डेढ़ फीसदी का ही प्रयोग हो पा रहा है। ऐसे में इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि अगर उपलब्ध संसाधनों का अच्छी तरह दोहन हो तो देश की ऊर्जा की समस्या से पार पाना एक ख्वाब नहीं रह पाएगा, बल्कि हकीकत में तब्दील हो जाएगा। पर विडंबना यह है कि इन ऊर्जा स्रोतों और इनके प्रयोग को लेकर आज भी देश का एक बड़ा तबका गाफिल ही है। अभी हालत यह है कि भारत में वैकल्पिक स्रोतों से बनाई जाने वाली बिजली में दो तिहाई हिस्सेदारी तमिलनाडु की ही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वहां सरकारी स्तर पर इन ऊर्जा स्रोतों के बारे में जागरूकता फैलाने का काम किया गया। देश भर में गैरपारंपरिक स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन के प्रति लोगों को जागरूक बनाए जाने की जरूरत है।

   बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए कुछ दशक पहले विश्व ने आणविक ऊर्जा के उत्पादन की ओर भी कदम बढ़ाया। लेकिन यह प्रयोग बेहद उत्साहजनक नहीं रहा और मामला फिर वैकल्पिक ऊर्जा की तलाश पर पहुंच गया। वैकल्पिक ऊर्जा के प्रति दुनिया की बढ़ती रुचि के लिए तेल की बढ़ती कीमतें भी जिम्मेदार हैं। इसके अलावा सब को इस बात का अहसास हो गया कि जिस तेजी से तेल की मांग बढ़ रही है उस तेजी से इसकी आपूर्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि तेल के भंडार भी सीमित हैं और इसकी एक अलग अंतरराष्ट्रीय सियासत है। इसके अलावा ऊर्जा के एक अहम स्रोत के रूप में शुमार किए जाने वाले प्राकृतिक गैस की कीमत भी बढ़ते ही जा रही है और कोयला भी महंगाई के इस दौर में अपवाद नहीं है। इससे एक बात तो साफ है कि देर-सबेर न चाहते हुए भी ऊर्जा के नए रास्तों को तलाशना ही होगा।

   यह सच है कि कोयला आधारित बिजली घर बनाने की तुलना में सौर और पवन ऊर्जा पर आधारित बिजली उत्पादन संयंत्र लगाने में खर्च अधिक आता है। पर उत्पादन लागत के मामले में ये संयंत्र कोयला आधारित संयंत्र को मात देने वाले हैं। इसलिए कुल मिला जुला कर दीर्घकालिक तौर पर ये फायदे का सौदा साबित होने जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के बाजार का आकार काफी बड़ा है।

   ऊर्जा के इस बड़े बाजार पर कब्जा जमाने के लिए दुनिया की कई नामी गिरामी कंपनियों ने इस क्षेत्र में भारी-भरकम निवेश भी किया है जिसमें जनरल इलेक्ट्रिक्स प्रमुख है। साथ ही बीपी और शेल कंपनी ने भी वैकल्पिक ऊर्जा के बाजार में दखल देने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में होने वाले निवेश की सालाना विकास दर साठ फीसदी है। 2006 की तुलना में 2007 में 148 बिलियन डालर का निवेश इस क्षेत्र में किया गया। इसमें सबसे ज्यादा पैसा पवन ऊर्जा में लगाया गया। अकेले इस क्षेत्र में 50.2 बिलियन डालर का निवेश हुआ। जबकि तेजी से बढ़ रहा सौर ऊर्जा का क्षेत्र 28.6 बिलियन डालर की पूंजी आकर्षित कर पाया। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौर ऊर्जा का बाजार 2004 से सालाना 254 फीसदी की दर से विकास कर रहा है।

   कार्बन क्रेडिट की अवधारणा आ जाने से बड़े से बड़े देश और कंपनी के लिए इस नई राह को अख्तियार करने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचा है। गौरतलब है कि कार्बन क्रेडिट वह व्यवस्था है जिसके तहत प्रदूषण के स्तर के आधार पर हर देश को अंक मिलते हैं। प्रदूषण की मात्रा एक निश्चित सीमा से अधिक होने पर उस देश को जुर्माना भरना पड़ता है या फिर दूसरे देश से कार्बन क्रेडिट खरीदना पड़ता है। जिस देश में हरियाली ज्यादा होगी और प्रदूषण कम होगा, उसे ज्यादा अंक मिलने की व्यवस्था है और उसके पास ज्यादा कार्बन क्रेडिट संचित होता है। जिसे वह दूसरे देश को बेच भी सकता है। इसलिए अब पारंपरिक तरीकों को छोड़कर बदली हालत के हिसाब से भी रास्ते तलाशे जा रहे हैं। वैसे तो ऊर्जा उत्पादन के लिए सबसे सस्ता जरिया अभी भी कोयला ही बना हुआ है। पर कार्बन क्रेडिट की पेंच ने कोयला के प्रयोग को हतोत्साहित करना शुरू कर दिया है। क्योंकि कोयला से भारी मात्रा में कार्बन डाय आक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसके निस्तारण के लिए अभी तक कोई सस्ता और सुलभ तरीका नहीं ढूंढा जा सका है। जो तरीके अभी जानकार बता रहे हैं, वे काफी महंगे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब प्रदूषण सीधे तौर पर नोटों की गड्डियों से जुड़ गया है। इस वजह से बाजार के बड़े खिलाड़ियों के माथे पर बल पड़ गए हैं। पर यह निश्चय ही पर्यावरण के लिहाज से एक सुखद स्थिति है। क्योंकि इसी बहाने सही, ऊर्जा उत्पादन के प्रदूषणकारी माध्यमों पर लगाम तो लग रही है।

   अमेरिका में तो वैकल्पिक ऊर्जा का कारोबार किसानों के लिए भी फायदे का सौदा साबित हो रहा है। वहां पवन ऊर्जा के उत्पादन के लिए संयंत्र लगाने के लिए बड़ी कंपनियां किसानों से उनकी जमीन किराए पर ले रही हैं। इसके एवज में जमीन के स्वामी को उसकी जमीन पर लगे संयंत्र से उत्पादन होने वाली बिजली से होने वाली आमदनी का तीन फीसदी हिस्सा दिया जा रहा है। जानकारों ने अनुमान लगाया है कि एक हेक्टेयर जमीन देने वाले को हर साल औसतन दस हजार डालर मिलेंगे। जबकि इसी जमीन पर वह मक्के की खेती करता है तो उसे महज तीन सौ डालर की ही आमदनी होगी।

   यह ऊर्जा के क्षेत्र में बहती बदलाव की बयार ही है कि कोयले से बनने वाले बिजली पर काफी हद तक निर्भर रहने वाला चीन पवन ऊर्जा के उत्पादन के मामले में काफी तेजी से प्रगति कर रहा है। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में चीन सालाना 66 फीसदी की दर से विकास कर रहा है। सौर ऊर्जा के मामले में भी चीन दूसरे देशों की तुलना में काफी आगे है। सौर प्लेट के निर्माण के मामले में चीन दुनिया भर में अव्वल है।  पवन ऊर्जा के मामले में स्पेन ने भी दुनिया के लिए एक उदाहरण पेश किया है। पवन ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ाने के लिए वहां की सरकार ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है और यह कार्य पूरी तरह से योजना बनाकर किया गया है। अमेरिका में कुल बिजली उत्पादन में पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी महज एक फीसदी है। पर वहां के नीति निर्माताओं ने 2020 तक इसे बढ़ाकर पंद्रह फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पवन ऊर्जा के उत्पादन में काम आने वाले टरबाइन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अमेरिकी इंजीनियर शोध कर  रहे हैं।

   अलबर्ट बेंज नामक वैज्ञानिक ने बीसवीं सदी की शुरूआत में ही अपने शोध के आधार पर बता दिया था कि पवन ऊर्जा के लिए प्रयुक्त टरबाइन की कार्यकुशलता 59.3 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती है। अभी जिन टरबाइनों का उपयोग हो रहा है उनकी कार्यकुशलता पचास फीसदी तक है और ऐसी अपेक्षा की जा रही है कि आने वाले दिनों में इसमें और ईजाफा होगा। इसकी वजह से पवन ऊर्जा की उत्पादन लागत भी स्वभाविक तौर पर घटी है और इसमें कमी आने का सिलसिला अभी थमा नहीं है। पवन ऊर्जा संयंत्र लगाने से पहले अब स्थान का खास तौर पर ध्यान रखा जा रहा है। कहने का तात्पर्य यह कि वैसी जगहों पर ही टरबाइन लगाए जा रहे हैं जहां बिजली उत्पादन के लिए माकूल परिस्थितियां हों। कहना न होगा कि हवा के दबाव की पवन ऊर्जा के उत्पादन में अहम भूमिका है। इसलिए उन्हीं जगहों को चुना जा रहा है जहां वायु का बहाव शक्तिशाली हो। क्योंकि बहाव में औसतन दो किलोमीटर प्रति घंटे का अंतर भी बिजली उत्पादन की क्षमता पर प्रभाव डाल देता है। वैसी जगहों पर जहां हवा की गति अपेक्षाकृत तेज होती है वहां आमतौर पर लोग नहीं रहते हैं। इस वजह से जहां पवन ऊर्जा का उत्पादन होता है वहां इसकी खपत नहीं होती। इसलिए इसकी आपूर्ति के दौरान बिजली का अच्छा-खासा नुकसान होता है। इस नुकसान को कम से कम करने के लिए भी इस क्षेत्र में काम करने वाले प्रयासरत हैं और बीते कुछ सालों में तो इसे कुछ कम किया भी गया है।

   पवन ऊर्जा के उत्पादन के मामले में ब्रिटेन अभी शीर्ष पर है। अभी वहां 404 मेगावाट बिजली का उत्पादन हवा के झोंकों से किया जा रहा है। जिससे तकरीबन तीन लाख घरों की ऊर्जा जरूरतों की पूर्ण रूप से पूर्ति की जा रही है। उल्लेखनीय है कि विंड फार्म की अवधारणा भी सबसे पहले ब्रिटेन में ही 1991 में आई थी। विंड फार्म से तात्पर्य यह है कि एक खास जगह पर बड़ी संख्या में टरबाइन लगाकर बड़े पैमाने पर पवन ऊर्जा का उत्पादन। वहां के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अभी ब्रिटेन में ऐसी 155 परियोजनाओं के तहत उन्नीस सौ टरबाइन पवन ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं जिसका लाभ तकरीबन तेरह लाख घरों को मिल रहा है। इसका सकारात्मक असर  पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन में तकरीबन बावन लाख टन की कमी आई है।

   खैर, पवन ऊर्जा के साथ-साथ सौर ऊर्जा के उत्पादन की राह भी आसान होती जा रही है। सूरज की किरणों को बिजली में तब्दील करके उसके उपयोग की हर संभावना को मूर्त रूप देने की कोशिश इसलिए भी की जा रही है क्योंकि इनकी उपलब्धता को लेकर कम से कम अभी तो कोई संकट नजर नहीं आ रहा है। वैज्ञानिक इस योजना पर काम कर रहे हैं कि हर घर के छत पर सौर प्लेट लगे और वह इतनी ऊर्जा का उत्पादन कर सके कि उस घर की ज्यादातर जरूरतें पूरी हो जाएं।  नैनो तकनीक के आ जाने से सौर प्लेटों की कार्यकुशलता बढ़ी है। अब जो नए सौर प्लेट बन रहे हैं, उसमें यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि सौर किरणों का हर फोटोन बिजली में तब्दील हो जाए। सौर प्लेटों का बाजार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

   वैश्विक स्तर पर अभी फोटोवोल्टेयिक सेल की धूम है। इसके व्यवसाय की सालाना विकास दर पचास फीसदी है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे बनने वाली बिजली की उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम है और इसमें निरंतर कमी आ रही है। ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका में काम कर रही कैंब्रिज एनर्जी रिसर्च एसोशिएट्स की एक रपट में बताया गया है कि 1995 में फोटोवोल्टेयिक सेल से एक किलोवाट बिजली उत्पादन करने में जो लागत आती थी वह 2005 में साठ फीसदी घट गई। जाहिर है कि जब उत्पादन लागत घटेगी तो इस ओर लोगों का स्वभाविक तौर पर रूझान बढ़ेगा और ऐसा वहां हुआ भी है।

   पारंपरिक सौर प्लेट सिलिकान से बने होते हैं। इसी से कंप्यूटर चिप का निर्माण भी किया जाता है। सौर प्लेटों की लागत को कम करने के लिए अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने स्ट्रिंग रिबन तकनीक ईजाद की है। इसके जरिए सौर प्लेट में लगने वाले सिलिकान की मात्रा घटकर आधी हो गई। इसके अलावा सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम कर रहे जानकार सौर प्लेटों की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए भी प्रयासरत हैं। इस कड़ी में सौर प्लेट के अंदर मौजूद चांदी के तारों को अधिक से अधिक पतला बनाया जा रहा है। इसके जरिए यह संभव हो पा रहा है कि ये तार कम से कम बिजली की मात्रा को रोक कर रख रहे हैं और इससे सौर प्लेटों की कार्यकुशलता बढ़ रही है। अध्ययन बता रहे हैं कि आने वाले दिनों में सौर किरणों से बनाई जाने वाली बिजली और कोयला से बनाई जाने वाली बिजली की उत्पादन लागत समान हो जाएगी। इस क्षेत्र में नई-नई तकनीक तलाश कर लिए जाने की वजह से सौर प्लेटों की कीमतों में भी काफी कमी आई है। कीमत को और कम करने के मकसद से वैज्ञानिक अब ऐसी तरकीब भी खोज रहे हैं कि सौर प्लेट बनाने में सिलिकान की जरूरत ही नहीं पड़े। अमेरिका में कुछ वैज्ञानिकों ने कैडमियम टेलुराइड से सौर प्लेट का निर्माण भी किया है। इसके अलावा कापर, इंडियम, गैलियम और सेलेनियम के मिश्रण से सौर प्लेट की फिल्म बनाने में भी इस क्षेत्र में काम कर रहे धुरंधरों ने सफलता हासिल की है। इस मिश्रण से बना प्लेट कैडमियम टेलुराइड से बनी प्लेट की अपेक्षा अधिक कार्यकुशल है और सस्ती भी।

   सोलर प्लेट के सेल सीधे सूर्य की किरणों को बिजली में बदल देते हैं। पर सौर किरणों से बिजली बनाने की दूसरी तकनीक भी अब अपनाई जा रही है। दुनिया में कई स्थानों पर सूरज की किरणों की मदद से पानी को खौलाया जाता है। इसके बाद इसके जरिए टरबाइन चलाई जाती है। जिससे बिजली का उत्पादन होता है। पर सौर ऊर्जा के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि अगर एक जगह पर आवश्यकता से अधिक बिजली का उत्पादन हो भी जाता है तो उसका वितरण आसान नहीं है। हालांकि, इस दिशा में भी ऊर्जा विशेषज्ञ काम कर रहे हैं और आने वालों दिनों में इस समस्या से निजात पाने की तरकीब तलाश लिये जाने की संभावना है।

   रेगिस्तानी क्षेत्र सौर ऊर्जा के लिए काफी अनुकूल हैं। ऐसे इलाकों में एक ही जगह लगे अनेक सौर प्लेटों से उत्पन्न ऊर्जा से पहले टरबाइन चलाया जाता है जिससे बिजली का उत्पादन होता है और फिर उसे दूर-दूर तक भेजा जाता है। इस प्रक्रिया को मिरर फार्मिंग कहा जाता है।

   दुनिया के कुछ हिस्सों में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए ऐसे-ऐसे तरकीब अपनाए जा रहे हैं जो एक बड़े तबके के लिए विस्मय का सबब बने हुए हैं। इसी में एक है भूतापीय ऊर्जा। इस बात से तो हर कोई वाकिफ है कि जमीन के अंदर निरंतर होने वाली हलचलों से उष्मा का उत्सर्जन होता रहता है। इसी को तकनीक के महारथियों ने प्रयोग में लाने की ठानी है। फिलीपींस में ऐसे प्रयोग हुए भी और सफल भी रहे। जमीन के अंदर की ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए वहां दो गड्ढ़े खोदे गए। जब जमीन के अंदर दो सौ डिग्री सेल्सियस तापमान वाले पत्थर मिल गए तो खुदाई रोक दी गई। फिर दोनों गड्ढ़ों में पाइप लगाया गया। पहले पाइप से ठंढा पानी प्रवाहित किया गया जो दूसरे पाइप से जमीन के अंदर की उष्मा को ग्रहण करने के बाद बेहद गर्म होकर निकला। इस गर्म पानी की धार का इस्तेमाल जेनरेटर चलाकर बिजली के उत्पादन में किया गया।

   यह प्रयोग वहां बेहद सफल रहा और अब वहां की सरकार इस विधि से बिजली के उत्पादन को बड़े स्तर पर अपनाने की सोच रही है। इससे मिलते-जुलते प्रयोग दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों में भी हुए हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में इस विधि से ऊर्जा बनाने की राह अपनाते हुए विश्व के कई देश दिखेंगे।

   तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए अख्तियार किए जाने वाले रास्तों में एक यह भी है कि कार चलाने के लिए तेल की जरूरत ही नहीं पड़े। अब ऐसी कार के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है जो बैट्री से चले। बिजली से चलने वाली कार फायदे का सौदा साबित होने जा रही हैं। पहली बात तो यह कि पेट्रोल की अपेक्षा बिजली पर कार मालिकों को कम पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसके अलावा ऐसी कारों से कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी। इसके अतिरिक्त इन कारों का एक फायदा यह भी होगा कि आपूर्ति के दरम्यान होने वाले बिजली के क्षय पर भी लगाम लग सकेगी। चौबीस घंटे में कुछ समय ऐसे होते हैं जिस वक्त सामान्य तौर पर बिजली की मांग कम होती है लेकिन बिजली की आपूर्ति जारी रहती है। ऐसे समय पर अगर इन कारों को चार्ज किया जाएगा तो निश्चय ही बिजली का सदुपयोग हो पाएगा और आपूर्ति के दौरान होने वाले नुकसान पर भी लगाम लग सकेगी। दुनिया की कार बनाने वाली कई बड़ी कंपनियां बिजली से चलने वाली कारों के निर्माण की दिशा में शोध करवा रही हैं। अभी बिजली से चलने वाली जो कारें मौजूद हैं उनकी कीमत अपेक्षाकृत ज्यादा है, इसलिए वे चलन में उस तरह से नहीं आ पाई हैं जिससे बहुत ज्यादा फर्क पड़े। अधिक कीमत की वजह से ये सामान्य कार उपभोक्ता की पहुंच से बाहर हैं। पर आने वाले दिनों में कम कीमत में ऐसी कार उपलब्ध कराने के लिए कई कार कंपनियां प्रयासरत हैं।

   अब तो शोधकर्ताओं ने यहां तक दावा कर दिया है कि बर्बाद हो जाने वाले खाद्य पदार्थ से भी बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों ने बैक्टिरिया के दो खास प्रजातियों का पता लगाने का दावा किया है जो एक बायो रिएक्टर में हाइड्रोजन का निर्माण कर सकेंगे। माइक्रोबायलाजी टुडे के अगस्त अंक में छपे एक लेख में बताया गया है कि इस प्रक्रिया से बने हाइड्रोजन से आसानी से ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि हाइड्रोजन में पेट्रोल की अपेक्षा तीन गुना ज्यादा ऊर्जा उत्पादन की क्षमता होती है। ऐसे में अगर नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों से हाइड्रोजन बनाने की तकनीक बड़े पैमाने पर सफल हो जाती है तो इससे खास तौर पर पश्चिमी देशों को बहुत फायदा होगा। क्योंकि वहां खाना ज्यादा नष्ट होता है। एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल तकरीबन सत्तर लाख टन खाना फेंक दिया जाता है। इसमें से भी ज्यादातर हिस्सा ऐसे स्थानों पर चला जाता है जहां वह सड़-गल कर मिथेन का उत्सर्जन करता है। गौरतलब है कि मिथेन एक ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइआक्साइड से भी पचीस फीसदी ज्यादा खतरनाक है। इस तरह से यह कहना गलत नहीं होगा कि यह खोज दोहरे फायदे का सौदा साबित होने जा रही है। इनसे ऊर्जा उत्पादन होने के साथ-साथ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आएगी।

This entry was posted on Tuesday, February 24th, 2009 and is filed under विशेष रिपोर्ट, वैकल्पिक ऊर्जा का लेखा जोखा, हिमांशु शेखर. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. Responses are currently closed, but you can trackback from your own site.

2 Responses to “वैकल्पिक ऊर्जा की आवश्यकता”

  1. umeshawa on February 9th, 2009 at 7:18 pm

    वैकल्पिक उर्जा के क्षेत्र मे अनगिनीत सम्भावनाए है। देश मे आयात होने वाले पेट्रोलियम पर “वैकल्पिक उर्जा अनुसंधान सरचार्ज” लगा कर सरकार को धन उठाना चाहिए। इस धन को देश के इंजीनीयरींग कालेजो को अनुसंधान करने के लिए दिया जाना चाहिए।

  2. सर्वेश्वर सिंह् on February 6th, 2010 at 8:32 pm

    एक दम सही बात है, सरकार के अलावा प्राइवेट संस्थानों को भी इस काम मे शामिल किया जाना चाहिये ताकि सस्ते और सर्व सुलभ साधनों का विकास हो सके साथ ही जनता को वैकल्पिक ऊर्जा साधनों के प्रयोग के प्रति जागरूक करना जरूरी है!