![]() - डा. आनंदवर्धन बिहार की पृष्ठभूमि से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सन 1912 उसके बंगाल से पृथक होने का काल अवश्य है, पर यह उसके भूसांस्कृतिक पहचान के निर्माण का वर्ष नहीं है। फिर भी शताब्दी समारोह की अपनी महत्ता है।
भारतीय संघीय लोकतंत्र में बिहार एक बहुचर्चित राज्य है। इसके कारण अनेकानेक हैं। इसका अद्वितीय एवं गौरवशाली इतिहास तथा स्वतंत्रता के पहले और बाद के आंदोलनों में इसकी सर्वतोमुखी भूमिका इसे भारत के राजनीतिक इतिहास का महाबिंदु बना डालती है। विगत दो-तीन दशकों में तो बिहार भ्रष्ट राजनीति, आर्थिक पिछड़ेपन एवं अपराधिक गतिविधियों की अनियंत्रित वृद्धि के कारण सभी जगह आलोचना का विषय भी बना। अपने गौरवमयी अतीत एवं संघर्षों से भरे वर्तमान के मध्य झूलता बिहार फिर भी प्रगति के पथ पर है। बिहार की राजनीतिक दुरावस्था के कट्टर आलोचक भी यह अब मानने लगे हैं कि वहां के क्षितिज पर आशावाद की नवज्योति फैलने लगी है। आज देश के कई नगरों में बिहार की स्थापना के सौवें वर्ष के महोत्सव मनाये जा रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली एवं बिहारियों पर अकारण एवं आकस्मिक राजनीतिक … |
सौ साल से पुराना है बिहार
- डा. आनंदवर्धन बिहार की पृष्ठभूमि से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सन 1912 उसके बंगाल से पृथक होने का काल अवश्य है, पर यह उसके भूसांस्कृतिक पहचान के निर्माण का वर्ष नहीं है। फिर भी शताब्दी समारोह की अपनी महत्ता है। भारतीय संघीय लोकतंत्र में बिहार एक बहुचर्चित राज्य है। इसके कारण [...]
आदिवासी अधिकारों के लिए संकल्पित ‘आस्था’
- प्रतिनिधि सन 1986 की बात है। उस समय राजस्थान अकाल का भयंकर दंश झेल रहा था। दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्र कोटड़ा में तो और भी कई तरह के संकट पहले से ही मौजूद थे। ऐसे में सात सामाजिक कार्यकताओं ने मानव कल्याण की भावना दिल में संजोए एक सफर की शुरूआत की, [...]
बेहोशी के मसीहा
- राकेश श्रीवास्तव आस्था के चरम में पत्थर से लेकर इडली-समोसा-बरफी-चटनी तक से राहत मिलती है और उपचार होता है, पर इडली-समोसा-बरफी-चटनी को चरम धार्मिक अनुभव और ऐसे गुरु को अपना भगवान मान लेना अपने स्व और अपनी धार्मिकता का क्षरण है। जब एक अखबार और एक टीवी चैनल ने निर्मल बाबा के दावों [...]
प्रदीप रोशनः एक सूरज जो समय से पहले ढल गया
वोटतंत्र की बुनियाद पर काम कर रही मौजूदा व्यवस्था की पोल खोलने में जो जमात लगी है, उसी के प्रतिनिधि कवि थे- प्रदीप रोशन। उनकी कविताएं दिल्ली, मुंबई के साहित्यिक गलियारों में बेशक न सुनी गई हों, लेकिन जिन लोगों में व्यवस्था परिवर्तन की अकुलाहट है, उनके बीच प्रदीप जी की कविताएं लगातार सुनी गईं। [...]
लातूर में समग्र विकास पर चर्चा
पाटिल जी ने कहा कि सृष्टि बहुत विशाल और मानव जीवन मर्यादित है। कोई एक व्यक्ति, संस्था, राजा या तानाशाह विश्व के वर्तमान हर क्षेत्र में अधोगति की ओर अग्रसर ढांचे को सुधार नहीं सकता। इसके लिए सामूहिक प्रयत्न ही काम आयेगा। इसी परिप्रेक्ष में भारत विकास संगम कार्य कर रहा है। 18 मार्च, [...]
एस्बेस्टस के सवाल पर बिहार सरकार का जनविरोधी चेहरा
- रामबहादुर राय कायदे से होना यह चाहिए कि जब तक इस बारे में पक्का न हो जाए कि एस्बेस्टस मनुष्य के स्वाथ्य के लिए कितना हानिकारक है, तब तक कारखानों का काम नीतीश सरकार रोक दे, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। मरवन के लोगों ने लड़ाई जीत ली है। उन्हें निरंतर बिना [...]
जय महाराष्ट्र!
- विमल कुमार सिंह जब किसी धौंस या धमकी के चलते जय महाराष्ट्र बोला जाता है तो उसमें न तो महाराष्ट्र की जय होती है और न ही देश की। ऐसे में तो सबकी पराजय ही होती है। बिहार शताब्दी समारोहों के सिलसिले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मार्च में दिल्ली का दौरा किया। [...]
पगली की वापसी
- डा. अपर्णा शर्मा विश्रुत समय ने विमला की घर की याद को धुंधला कर दिया और कब और कैसे वह पागलखाने को ही अपना घर समझने लगी, यह एहसास उसे स्वयं भी न हो पाया। बिमला मात्र 15 वर्ष की थी, जब वह दुल्हन बनकर सुसराल आई। उसकी सुसराल में बहुत छोटा सा [...]

