गंगा बचेगी, तभी हम बचेंगे

- के. एन. गोविन्दाचार्य

गंगा की समस्याएं अनगिनत हैं लेकिन उन सभी के मूल में मनुष्य है, जिसका उद्धार करने के लिए वह पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। मनुष्य ने पिछले दो सौ वर्षों से अपनी तथाकथित तरक्की के लिए जो उपभोगवादी रास्ता चुना है, वह अभी तो बहुत हरा-भरा और लुभावना दिख रहा है, लेकिन अंततः वह उस रेगिस्तान की ओर जाता है, जहां विनाश के सिवाय कुछ भी नहीं है।

 

भारत के पौराणिक साहित्य से लेकर यहां की लोककथाओं तक में ऐसे कई प्रसंग मिल जाएंगे, जिसमें गंगा की अविरल धारा को उसी तरह त्रिकाल सत्य माना गया है, जैसे सूर्य और चंद्रमा को। लोग गंगा की धारा को अटूट सत्य मानकर कसमें खाते थे, आशीर्वाद देते थे। विवाह के समय मांगलिक गीतों में गाया जाता था, ‘जब तक गंग जमुन की धारा अविचल रहे सुहाग तुम्हारा।’ क्या आज इस गीत का कोई औचित्य रह गया है?

अतीत का विश्वास आज टूट चुका है। गंगा की अविरल धारा खंडित हो चुकी है। भागीरथी, धौलीगंगा, ऋषिगंगा, बाणगंगा, भिलंगना, टोंस, नंदाकिनी, मंदाकिनी, अलकनंदा, केदारगंगा, दुग्धगंगा, हेमगंगा, हनुमानगंगा, कंचनगंगा, धेनुगंगा आदि वो …

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विशेष रिपोर्ट

गंगा बचेगी, तभी हम बचेंगे

गंगा बचेगी, तभी हम बचेंगे

- के. एन. गोविन्दाचार्य गंगा की समस्याएं अनगिनत हैं लेकिन उन सभी के मूल में मनुष्य है, जिसका उद्धार करने के लिए वह पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। मनुष्य ने पिछले दो सौ वर्षों से अपनी तथाकथित तरक्की के लिए जो उपभोगवादी रास्ता चुना है, वह अभी तो बहुत हरा-भरा और लुभावना दिख रहा है, [...]

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  • दम तोड़ते गंगा रक्षा के दावे
  • गंगा के पास समय कम बचा है
  • सार्थक प्रयास

    बिना जुताई की खेती संभव है

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    - बाबा मायाराम मध्यप्रदेश के होशंगाबाद शहर से भोपाल की ओर मात्र 3 किलोमीटर दूर है- टाईटस फार्म। यहां पिछले 25 साल से कुदरती खेती का अनोखा प्रयोग किया जा रहा है। राजू टाईटस जो स्वयं पहले रासायनिक खेती करते थे, अब कुदरती खेती के लिए विख्यात हो गए हैं। उनके फार्म को देखने देश-विदेश [...]

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    बुनियादी बदलाव से दूर है मिश्र

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    - अमिताभ त्रिपाठी सरसरी तौर पर मिश्र के पूरे घटनाक्रम को यदि देखा जाये तो यही लगता है कि वहां काफी कुछ बदल गया है और अब किसी न किसी रूप में यह देश अंतरराष्ट्रीय पटल पर नया स्वरूप अवश्य ग्रहण करेगा, लेकिन यदि बारीक नजर से देखा जाये तो तहरीर चैक की भावना के [...]

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  • बेलगाम न रहें गूगल और फेसबुक
  • रियो + 20 और आगे की यात्रा
  • अतीत

    प्रदीप रोशनः एक सूरज जो समय से पहले ढल गया

    वोटतंत्र की बुनियाद पर काम कर रही मौजूदा व्यवस्था की पोल खोलने में जो जमात लगी है, उसी के प्रतिनिधि कवि थे- प्रदीप रोशन। उनकी कविताएं दिल्ली, मुंबई के साहित्यिक गलियारों में बेशक न सुनी गई हों, लेकिन जिन लोगों में व्यवस्था परिवर्तन की अकुलाहट है, उनके बीच प्रदीप जी की कविताएं लगातार सुनी गईं। [...]

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  • अंदर से हो बदलाव
  • चला गया अदब की दुनिया का कबीर
  • गतिविधियाँ

    राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का आठवां स्थापना दिवस

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    17 मई,  2012 को कोटा (राजस्थान) के घोड़े वाले बाबा चैराहा स्थित टीलेश्वर महादेव मंदिर के सभागार में राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का आठवां स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया गया। दो दिन चले इस कार्यक्रम में आंदोलन के संस्थापक- संरक्षक श्री के.एन. गोविंदाचार्य मुख्य वक्ता थे।   17 मई का दिन राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के लिए [...]

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  • लातूर में समग्र विकास पर चर्चा
  • अपने स्वभाव के अधिष्ठान पर रहकर ही विश्वगुरु बन सकता है भारत
  • चर्चा में

    नई राह दिखाएं साधु-संत

    - रामबहादुर राय अब साधु-संत गौ रक्षा को भूल गए हैं। उन्हें गंगा रक्षा की चिंता है। उनमें से कुछ साधु-संत पिछले दिनों दिल्ली आए। जंतर-मंतर पर धरना दिया। वे अखबारों में छपे और चैनलों पर दिखाए भी गए। लोग उन्हें अखबारों और चैनलों में देख-सुनकर विस्मित हैं कि जो काम जहां राजनीतिक संगठन करते [...]

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    शहीद भगत सिंह का विवाह गीत

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    - डा. गौतम सचदेव कवि ‘ताहिर’ ने लोकगीत जैसी अपनी इस रचना में यह रूपक बांधा था कि भगत सिंह मौत रूपी दुल्हन को ब्याहने जा रहा है, भारत के 35 करोड़ लोग बाराती हैं और मातमी बाजे बज रहे हैं। गीत बड़ा ही मार्मिक था, जिसे सुनकर मंच पर बैठे भगत सिंह के पिता [...]

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  • दक्षिण भारत का जलियांवाला बागः गोरटा ‘बी’ गांव
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    नरक का मार्ग

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