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- उमाशंकर मिश्रा
मनरेगा के बाद यूपीए की दूसरी सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना खाद्य सुरक्षा कानून को भले ही कैबिनेट की मंजूरी मिल गई हो, लेकिन अभी भी इसमें कई पेंच हैं, जो इस कानून की सफलता पर सवाल खडे क़रते हैं।
खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाने के बारे में अब खुद सरकार के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए हैं, तो इसे समझा जा सकता है। सरकार के नीति-नियंता इस परियोजना को चाहे जितना बढ़ा-चढ़ाकर आंकें और संसद के इसी सत्र में इसे पारित करवाने की प्रतिबध्दता जताएं, हकीकत में यह विरोधाभासों से भरा है। मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। बावजूद इसके सरकार इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले पारित कराना चाहती है। यही कारण है कि अमूमन कल्याणकारी योजनाओं को खारिज करने वाले वित्ता मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने में देर नहीं लगाई। जबकि इस योजना की विसंगतियों की सूची लंबी है। मसलन, इसमें ग्रामीण क्षेत्र की 75 फीसदी और शहरी इलाके की 50 फीसदी आबादी को रियायती दर पर … |
कानून जरूर, खाद्य सुरक्षा दूर
– उमाशंकर मिश्रा मनरेगा के बाद यूपीए की दूसरी सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना खाद्य सुरक्षा कानून को भले ही कैबिनेट की मंजूरी मिल गई हो, लेकिन अभी भी इसमें कई पेंच हैं, जो इस कानून की सफलता पर सवाल खडे क़रते हैं। खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाने के बारे में अब खुद [...]
गांव वालों के प्रयास से जंगलों को मिला नव जीवन
- नौशाद आलम वनों के संरक्षण के लिए इच्छा शक्ति के साथ वनों के प्रति गहरा लगाव और आस्था भी जरूरी है। सरकार चाहे लाख वन समितियां बना ले, पर समितियों में शामिल लोगों में अगर वनों के प्रति प्रेम न हो तो फिर उसका कोई फायदा नहीं है। वनों के आसपास रहने वालों [...]
जलवायु परिवर्तन की उलझी वर्तनी
- सोपान जोशी वायुमंडल अमीर और गरीब देशों का फर्क नहीं करता। जरूरत और भोग-विलास का भी नहीं। हम लोगों के पास कभी भी सांस लेने का बिल नहीं आता। पर अमीर देशों के भोग-विलास से हुए जलवायु परिवर्तन का बिल गरीब देश चुका रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के सबसे भीषण परिणाम उष्णकटिबंध के [...]
चला गया अदब की दुनिया का कबीर
– सन्त समीर 18 दिसंबर की सुबह खबर मिली कि अदम गोंडवी नहीं रहे, तो लगा कि जैसे हमारे दौर की अदबी दुनिया का कबीर नहीं रहा। अदम थे ही ऐसे। दोटूक बयानी का वैसा अंदाज मैंने किसी और शायर का नहीं देखा। आचरण में भी वे कबीर से गलबहियां करते दिखाई देते थे। [...]
दिल्ली में हुई गंगा चेतना पदयात्रा
दिल्ली के राजघाट से जंतर-मंतर तक 18 दिसंबर को स्वामी आनंद स्वरूप जी के नेतृत्व में ऐतिहासिक गंगा चेतना पदयात्रा निकाली गई। इसमें दिल्ली, हरियाणा समेत कई राज्यों के हजारों गंगा सेवकों ने भाग लिया। पदयात्रा में शामिल गंगाभक्त जोश से गंगा को बचाने का संकल्प लेते हुए नारे लगाते चल रहे थे। गंगा भक्तों [...]
वोट सुरक्षा कानून
– रामबहादुर राय खाद्य सुरक्षा कानून पर राजनीति यूं ही नहीं शुरू हुई है। इसके गहरे कारण हैं। यूपीए में इस कानून पर जितना मतभेद है, उससे ज्यादा राज्य सरकारों की उचित आपत्तियां हैं। बिहार, तमिलनाडु और ओडिसा ने वे नुक्ते निकाले हैं, जिनके आधार पर वहां से मुख्यमंत्री की ओर से एतराज [...]
सुरक्षा की सच्चाई
– विमल कुमार सिंह सबसे बड़ा सवाल है कि राजधानी में पाल्थी मारकर बैठी सरकार क्या जरूरतमंद लोगों को पहचानकर उन्हें वास्तविक अर्थों में खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करा पाएगी? सड़े-गले सरकारी ढांचे और लचर नेतृत्व को देखते हुए ऐसा हो पाना मुश्किल ही लग रहा है। [...]
मां का दिल
- ख्वाजा अहमद अब्बास कमला ने बेटे को गोद में लिया। उसका बदन जल रहा था। रोये ही जा रहा था। कमला ने बच्चे को प्यार किया, ”न रो मेरे लाल। चल, मैं तुझे फिल्म कम्पनी में ले चलती हूं। मेरा बेटा फिल्म का हीरो बनेगा। फिर तुझे बड़े डाक्टर के पास ले जाऊंगी। न [...]

